राष्ट्रीय
04-Feb-2026
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नई दिल्ली (ईएमएस)। कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने बीते महीने स्विट्जरलैंड के दावोस में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (डब्ल्यूईएफ) के मंच से कहा था कि दुनिया की पुरानी व्यवस्था ‘टूट’ रही है। अब मध्यम ताकत वाले देशों को साथ लाकर काम करना होगा। दावोस में अपने भाषण में कार्नी ने न ट्रम्प प्रशासन का नाम लिया और न ही उन अमेरिकी टैरिफ का जिक्र किया, जिसके कारण पुराना ग्लोबल सिस्टम हिल गया। अपने भाषण में उन्होंने सीधे तौर पर भले ही भारत का नाम न लिया हो, लेकिन इशारा साफतौर पर भारत की ओर ही था। दरअसल भारत इस वक्त दो बड़े दबावों के बीच खड़ा है। एक तरफ अमेरिका की बदलती नीतियां हैं। वहीं दूसरी ओर चीन की बढ़ती आक्रामकता। इसके परेशानी भरे हालात में भी भारत अब पारंपरिक साझेदारों से आगे बढ़कर दुनिया के दूसरे हिस्सों में नए दोस्त तलाश रहा है। इस घटना के ठीक एक हफ्ते बाद, भारतीय पीएम मोदी नई दिल्ली में यूरोपियन (ईयू) की प्रमुख उर्सुला वॉन डेर लेयेन के साथ खड़े थे। दोनों ने करीब 18 साल से अटके पड़े बड़े व्यापार समझौते की घोषणा की, जिसे उन्होंने ‘मदर ऑफ ऑल डील्स’ कहा। इस डील से करीब 2 अरब लोगों का बाजार तैयार होगा। यह सिर्फ व्यापार नहीं, बल्कि उस नए अंतरराष्ट्रीय सिस्टम का हिस्सा है, जिसमें अमेरिका की भूमिका कमजोर होने के बाद बाकी देश मिलकर नया ढांचा खड़ा करने की कोशिश कर रहे हैं। आज भारत उन देशों में शामिल है जिनकी राय और फैसले वैश्विक राजनीति को प्रभावित करते हैं। 140 करोड़ की आबादी के साथ यह दुनिया की सबसे ज्यादा जनसंख्या वाला देश है। भारत की इकोनॉमी भी जापान और जर्मनी के साथ दुनिया की टॉप-5 में शामिल हो चुकी है, हालांकि प्रति व्यक्ति आय अब भी इन देशों से बहुत कम है। प्रधानमंत्री मोदी की आत्मनिर्भर भारत वाली सोच अब थोड़ी नरम पड़ती दिख रही है। भारत में यह धारणा लंबे समय से रही है कि खुद को सुरक्षित रखने के लिए दूसरे देशों से ज्यादा आर्थिक जुड़ाव नहीं होना चाहिए। लेकिन यूरोप, कनाडा और दूसरे देश यह तर्क देते रहे हैं कि मिलकर व्यापार करने से ही देश मजबूत बनते हैं। आशीष/ईएमएस 04 फरवरी 2026