राष्ट्रीय
05-Feb-2026
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नई दिल्ली(ईएमएस)। भारतीय संसद में इन दिनों पूर्व सेना प्रमुख जनरल एमएम नरवणे की अप्रकाशित आत्मकथा ‘फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी’को लेकर जबरदस्त राजनीतिक घमासान मचा हुआ है। इस विवाद ने रक्षा अधिकारियों के लेखन, अभिव्यक्ति की आजादी और ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट (ओएसए) के कड़े प्रावधानों पर एक नई बहस छेड़ दी है। मामला तब और गरमा गया जब लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने जनरल नरवणे की किताब की एक प्रति सदन में दिखाई, जबकि सरकार का तर्क है कि यह किताब अभी प्रकाशित ही नहीं हुई है। इस घटनाक्रम ने एक पुराने और चर्चित मामले को फिर से सुर्खियों में ला दिया है वह मामला है मेजर जनरल (रिटायर्ड) वीके सिंह का, जो पिछले 18 वर्षों से कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं। मेजर जनरल वीके सिंह ने साल 2007 में ‘इंडियाज एक्सटर्नल इंटेलिजेंस: सीक्रेट्स ऑफ रिसर्च एंड एनालिसिस विंग’शीर्षक से एक किताब लिखी थी। इस किताब के प्रकाशन के तुरंत बाद सीबीआई ने उनके खिलाफ ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट के तहत मामला दर्ज कर लिया था। आज 81 वर्ष की आयु में भी जनरल सिंह जमानत पर हैं और विडंबना यह है कि करीब दो दशक बीत जाने के बाद भी इस मामले का ट्रायल (मुकदमा) अभी तक शुरू नहीं हो सका है। उनके गुरुग्राम स्थित आवास पर छापेमारी की गई थी और उनका कंप्यूटर, पासपोर्ट व डायरियां जब्त कर ली गई थीं। हाल ही में यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है, जहां उन्होंने उन दस्तावेजों की प्रतियां मांगी हैं जिनके आधार पर उन पर मुकदमा चलाया जा रहा है। दिल्ली हाईकोर्ट ने इससे पहले उन्हें केवल सुबह 9 से रात 9 बजे के बीच दस्तावेजों के निरीक्षण की अनुमति दी थी, क्योंकि अदालत का मानना था कि इन दस्तावेजों के कुछ हिस्से देश की संप्रभुता और अखंडता को प्रभावित कर सकते हैं। मेजर जनरल सिंह का तर्क है कि सेवानिवृत्त सैन्य अधिकारियों पर किताब लिखने से पहले पांडुलिपि (मैनुस्क्रिप्ट) की समीक्षा कराने का कोई लिखित कानूनी निर्देश नहीं है। उनके अनुसार, 1954 के सेना नियमों की धारा 21 केवल सेवारत कर्मियों पर लागू होती है। उन्होंने अपनी किताब में इंटेलिजेंस एजेंसी रॉ के भीतर भ्रष्टाचार के संभावित क्षेत्रों को एक व्हिसलब्लोअर की तरह उजागर किया था, लेकिन जांच एजेंसियों ने इसे सरकारी रहस्यों का खुलासा करार दिया। दूसरी ओर, जनरल एमएम नरवणे की किताब का मामला भी प्रशासनिक पेचदगियों में फंसा हुआ है। रक्षा मंत्रालय की प्रशासनिक शाखा पिछले एक साल से इस किताब की समीक्षा कर रही है, जिसके कारण इसका प्रकाशन रुका हुआ है। इस देरी से क्षुब्ध होकर जनरल नरवणे ने अब फिक्शन (काल्पनिक कहानियों) की ओर रुख कर लिया है। संसद में राहुल गांधी द्वारा इस किताब की प्रति दिखाए जाने के बाद सरकार और विपक्ष के बीच टकराव बढ़ गया है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार जानबूझकर पूर्व सेना प्रमुख की बातों को दबा रही है, जबकि सरकार इसे नियमों का हवाला देकर टाल रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि मेजर जनरल वीके सिंह जैसे मामलों ने सेवानिवृत्त रक्षा कर्मियों के भीतर एक डर का माहौल पैदा कर दिया है। अब कई अधिकारी संवेदनशील विषयों या रणनीतिक अनुभवों पर लिखने से बच रहे हैं। यह बहस अब इस बिंदु पर आकर टिक गई है कि देश की सुरक्षा और एक सैन्य अधिकारी के अपने अनुभव साझा करने के अधिकार के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। वीरेंद्र/ईएमएस/05फरवरी2026