राष्ट्रीय
04-Feb-2026
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:: नर्मदा तट पर सरसंघचालक का आह्वान - सेवा उपकार नहीं धर्म है, भीतर की खोज से ही संभव है राष्ट्र निर्माण :: खरगोन/इंदौर (ईएमएस)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने कहा है कि भारत की पहचान महज एक भौगोलिक मानचित्र से नहीं, बल्कि इसके उस विशिष्ट स्वभाव से है जो संपूर्ण विश्व को अपना परिवार मानता है। बुधवार को मध्य प्रदेश के इंदौर संभाग के खरगोन जिले में नर्मदा तट स्थित ग्राम लेपा में आयोजित विचार-प्रेरक कार्यक्रम को संबोधित करते हुए उन्होंने मनुष्य निर्माण से राष्ट्र निर्माण का विजन प्रस्तुत किया। डॉ. भागवत ने जोर देकर कहा कि परतंत्रता के लंबे कालखंड में भी भारत का यह मूल स्वभाव कभी नहीं बदला। डॉ. भागवत ने अपने संबोधन में सेवा के भारतीय और पाश्चात्य दृष्टिकोण के अंतर को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि पाश्चात्य संस्कृति में चैरिटी का भाव प्रमुख है, जबकि भारत में सेवा को धर्म माना गया है। हमारे दर्शन के अनुसार हर जीव में परमेश्वर का अंश है, अतः किसी की मदद करना उस पर उपकार नहीं, बल्कि स्वयं की अंतरात्मा को शुद्ध करने का मार्ग है। उन्होंने आह्वान किया कि जिसके पास जो भी सामर्थ्य हो, उसे समाज के वंचित वर्ग की सेवा में अर्पण कर देना चाहिए, क्योंकि सेवा से ही आत्मिक शुद्धि संभव है। शाश्वत सुख की व्याख्या करते हुए सरसंघचालक ने कहा कि भारत की सदियों पुरानी ज्ञान यात्रा इस सत्य पर टिकी है कि सुख भौतिक वस्तुओं में नहीं, अपितु मनुष्य के भीतर विद्यमान है। उन्होंने कहा कि माया का आधार हमेशा अध्यात्म होना चाहिए। ईश्वर ने मनुष्य को संवेदना इसलिए दी है ताकि वह दूसरे के दुख को अपना समझ सके। किसी की उपेक्षा कर सुख भोगना भारतीय संवेदना का हिस्सा नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत में ही अंदर की खोज की यात्रा प्रारंभ हुई, जो अंततः मनुष्य को शाश्वत आनंद की ओर ले जाती है। भारतीय शिक्षा पद्धति पर चर्चा करते हुए डॉ. भागवत ने कहा कि वास्तविक शिक्षा वह है जो मनुष्य को आत्मनिर्भर बनाए और उसमें श्रम के प्रति प्रतिष्ठा का भाव जगाए। उन्होंने जननायक टंट्या मामा और संत गाडगे महाराज का उदाहरण देते हुए बताया कि औपचारिक शिक्षा न होने के बावजूद उनके भीतर का दैवीय ज्ञान आज भी अनुकरणीय है। उन्होंने कहा कि ज्ञान मनुष्य के भीतर ही है, उसे केवल बाहर निकालने की आवश्यकता है। ऐसी शिक्षा जो विश्व मानवता का कल्याण करे, वही वास्तविक अर्थों में शिक्षा है। भारत की प्रगति को परिभाषित करते हुए डॉ. भागवत ने एक व्यापक दृष्टिकोण साझा किया। उन्होंने कहा कि भारत की उन्नति का अर्थ केवल जीडीपी या मानवीय सुख-सुविधाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें जल, जंगल, नदी, पहाड़ और पशु-पक्षी, यानी संपूर्ण प्रकृति की उन्नति समाहित है। उन्होंने भारती ठाकुर के संकल्प की सराहना करते हुए कहा कि रक्षा मंत्रालय की नौकरी छोड़कर वनवासी बच्चों के लिए अपना जीवन समर्पित करना ही उस भारतीय स्वभाव का प्रकटीकरण है, जो परिणाम की चिंता किए बिना उत्कृष्ट कर्म करने में विश्वास रखता है। प्रकाश/04 फरवरी 2026