इस्लामाबाद (ईएमएस)। पाकिस्तान और चीन के बीच दशकों पुराने कूटनीतिक और सैन्य रिश्ते अब एक नए और जटिल मोड़ पर पहुंच गए हैं। दोनों देशों के बीच इस गहरे जुड़ाव का सबसे बड़ा केंद्र चाइना-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (सीपीईसी) है। अरबों डॉलर की इस महत्वाकांक्षी परियोजना के जरिए चीन अपने दक्षिण-पश्चिमी हिस्से को अरब सागर से जोड़ना चाहता है। हालांकि, इस परियोजना ने पाकिस्तान में बुनियादी ढांचे का विस्तार तो किया है, लेकिन साथ ही उसे एक ऐसे कर्ज के जाल में फंसा दिया है जिससे निकलना फिलहाल नामुमकिन नजर आता है। इस आर्थिक निर्भरता का असर अब सैन्य क्षेत्र में भी स्पष्ट दिखने लगा है। 2020 से 2024 के बीच पाकिस्तान के कुल हथियार आयात का लगभग 81 प्रतिशत हिस्सा चीन से आया है। स्थिति यह है कि पाकिस्तान अब चीनी कर्ज चुकाने के लिए जे-17 थंडर फाइटर जेट जैसे चीनी हथियारों की वैश्विक मार्केटिंग में एक डीलर की भूमिका निभाने को विवश है। पाकिस्तान की चरमराती अर्थव्यवस्था और देश के भीतर अस्थिर सुरक्षा परिस्थितियों ने उसे चीन पर इस कदर निर्भर कर दिया है कि अब उसकी संप्रभुता पर सवाल उठने लगे हैं। आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर 2023 तक पाकिस्तान का कुल बाहरी कर्ज लगभग 131 बिलियन डॉलर था, जिसमें से अकेले चीन का हिस्सा 68.9 बिलियन डॉलर के करीब है। यह भारी कर्ज न केवल पाकिस्तान की आर्थिक स्वतंत्रता को सीमित कर रहा है, बल्कि उसे बीजिंग की रणनीतिक मांगों के आगे झुकने पर भी मजबूर कर रहा है। चीन की सबसे बड़ी चिंता पाकिस्तान में, विशेषकर बलूचिस्तान प्रांत में बढ़ती हिंसा और चीनी नागरिकों पर होते हमले हैं। बलूच विद्रोहियों द्वारा चीनी इंजीनियरों और परियोजनाओं को निशाना बनाए जाने से बीजिंग बेहद आक्रामक रुख अपना रहा है। चीन पहले भी चेतावनी दे चुका है कि वह अपने प्रोजेक्ट्स को हर हाल में समय पर पूरा करना चाहता है। हाल ही में चीन ने पाकिस्तान पर दबाव डालकर अपनी परियोजनाओं की सुरक्षा के लिए निजी सुरक्षा कर्मियों की तैनाती सुनिश्चित की है। साल 2025 में हुए एक समझौते के तहत चीनी सुरक्षा बलों के लिए जॉइंट सिक्योरिटी फ्रेमवर्क तैयार किया गया है, जिसे पाकिस्तान ने शुरू में ठुकरा दिया था, लेकिन बाद में चीनी दबाव के आगे उसे घुटने टेकने पड़े। विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान अब उस दहलीज पर खड़ा है जहां वह अपने देश में चीनी पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) की सीधी तैनाती को ज्यादा दिनों तक नहीं रोक पाएगा। पाकिस्तान सरकार ने बलूचिस्तान में सुरक्षा के लिए ऑपरेशन अज्म-ए-इस्तेहकाम जैसे अभियानों पर करोड़ों रुपये खर्च किए हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर विद्रोही गतिविधियों में कोई कमी नहीं आई है। अपनी परियोजनाओं और नागरिकों की सुरक्षा को लेकर चीन का बढ़ता अविश्वास उसे पाकिस्तान की धरती पर अपनी सेना उतारने का ठोस बहाना दे रहा है। आर्थिक रूप से चीन का गुलाम बन चुका पाकिस्तान जिस तरह से अपनी रक्षा नीतियों को बीजिंग की शर्तों पर बदल रहा है, उससे यह आशंका गहरी हो गई है कि आने वाले समय में पाकिस्तान की सुरक्षा कमान पूरी तरह से चीनी हाथों में जा सकती है। यह बेबसी पाकिस्तान को एक ऐसे कूटनीतिक दलदल में धकेल रही है, जहां से वापसी का रास्ता फिलहाल धुंधला दिखाई देता है। वीरेंद्र/ईएमएस 05 फरवरी 2026