लेख
07-Feb-2026
...


कलयुगी रिश्ते की डोर कमजोर क्यों है क्योंकि आज के युग में रिश्ता पल पल बदल रहें है क्योंकि मन बहुत चंचल होता है और किसी का स्वभाव बदलता नहीं है अतः यदि रामचरितमानस का अध्ययन करना चाहिए रामचरितमानस के उत्तर कांड के कई दोहों में कहा गया है: वह माया जो पूरे संसार को नचाती है, जिसका चरित्र (काम) कोई नहीं समझ पाया है। यानी, माया पूरे संसार को नचाती है, और कोई भी उसके स्वभाव (कामों) को नहीं समझ पाया है, और माया कई गुण और दोष बनाती है और यह पूरे संसार में फैली हुई है। माया कई गुण और दोष, मोह, काम, अज्ञान आदि बनाती है, जो पूरी दुनिया में फैले हुए हैं। भगवान राम स्वयं कहते हैं, हे प्रिय! माया ने कई गुण और दोष बनाए हैं। उनका कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। उन्हें अलग-अलग न समझना ही ज्ञान है; उन्हें ऐसा देखना अज्ञान है। • सुनो, प्रिय, माया कई गुण और दोष बनाती है। गुण यह है कि इन दोनों में से किसी को भी न देखा जाए; उन्हें देखना अज्ञान है। (उत्तर कांड, 41) • माया द्वारा बनाए गए गुणों और दोषों में काम, मोह, आसक्ति, अज्ञान आदि शामिल हैं। माया कई गुण और दोष बनाती है। मोह, काम, और ऐसी ही अन्य चीजें। (उत्तर कांड, 56.2) भगवान राम कहते हैं, यह पूरा संसार मेरी माया द्वारा बनाया गया है (मेरी माया से उत्पन्न संसार)। (उत्तर कांड, 85.2) भगवान श्री कृष्ण गीता में कहते हैं: दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया (मेरी यह दिव्य, गुणों से भरी माया पार करना कठिन है, यानी इसे पार करना बहुत मुश्किल है)। यहाँ, एक बात ध्यान देने योग्य है कि भगवान ने माया को मम माया कहा है, जिसका अर्थ है कि माया भगवान की है। हालाँकि, जो लोग इसे स्वतंत्र अस्तित्व वाला मानते हैं, उनके लिए माया पर विजय पाना आसान है। भगवान स्वयं माया पर विजय पाने का तरीका बताते हैं: मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते (जो लोग लगातार मेरी पूजा करते हैं, वे इस माया को पार कर जाते हैं)। इसका मतलब है कि भगवान के प्रति समर्पण ही माया पर विजय पाने का एकमात्र तरीका है। रामचरितमानस में, श्री काकभुशुंडि पक्षियों के राजा गरुड़ से कहते हैं, हरि माया कर अमित प्रभावा। विपुल बार जेहि मोहि नचावा। (हरि की माया में अपार शक्ति है, जिसने हमें कई बार नचाया और भ्रमित किया है)। फिर वे कहते हैं, हे पक्षियों के राजा, गरुड़! वही माया, भगवान श्री रामचंद्र की भौंह के इशारे मात्र से, अपने दल (परिवार) के साथ एक अभिनेत्री की तरह नाचती है। • सोई प्रभु भ्रूबिलास खगराजा। नाच नटी इव सहित समाजा॥1॥ (उत्तरकाण्ड 71/1) फिर वे कहते हैं, हे पक्षियों के राजा! इसी प्रकार, श्री हरि की पूजा के बिना जीवों का दुख समाप्त नहीं होता। अज्ञान श्री हरि के सेवक को प्रभावित नहीं करता, और भगवान की प्रेरणा से वह ज्ञान प्राप्त करता है। • ऐसेहि हरि बिनु भजन खगेसा। मिटहिं जीवन्ह के कलेसा॥ हरि सेवकहि न माया अपार है। यह माया भगवान से प्रेरित है। (उत्तरकाण्ड 78.1) भगवान की भक्ति के बिना, यह लाखों प्रयासों से भी दूर नहीं होती (लाखों उपायों से भी दूर नहीं होती)। अंत में, काकभुशुंडि जी अपना अनुभव सुनाते हैं, हे गरुड़ जी, हरि की भक्ति के बिना दुख समाप्त नहीं होता (अब मैं आपको अपना अनुभव बताता हूँ। हरि की भक्ति के बिना दुख दूर नहीं होता)। उपरोक्त चर्चा से दो बातें बिल्कुल स्पष्ट हैं: 1) यह माया भगवान की है और सभी जीवों को भ्रमित रखती है, और उनमें कई प्रकार के गुण और दोष पैदा करती है। 2) भगवान राम की शरण लिए बिना इस माया पर विजय पाना असंभव है। इसलिए, भगवान की भक्ति बहुत महत्वपूर्ण है।भगवान राम का ध्यान करना मुश्किल जरूर होगा लेकिन यदि मिला तो एक आंनद का अनुभूति होती है अच्छा सोच और डर आपके मन से जाता है इसलिए यदि भगवान राम के चरण को पकड़ लिया तो जीवन सफल हो जायेगा और सही और गलत का फर्क दिखेगा, आप मस्त रहोगे यदि जाने अनजाने में आपके गलती से माता पिता को क़ोई चोट पहुंचा है तो वो आपके परमात्मा जो परमपिता है उससे क्षमा माँग लें अवश्य हीं अच्छा होगा भगवान राम के चरणों में झुकना मतलब मौत को भी मात देना होता है इसके दो उदाहरण हैं जैसे अहिल्या जो श्राप से पत्थर बनी और एक बार जब शरीर नष्ट हुआ तो दोबारा उसी रूप में बापस नहीं आता है लेकिन भगवान राम के चरणों में झुकी अहिल्या पुनः जीवित हो गईं इसी तरह एक और उदाहरण है जब भगवान राम ने बाली को मारा था वो छल जरूर था क्योंकि बाली को यह वरदान मिला था की क़ोई भी उससे युद्ध करेगा तो उसकी शक्ति आधी हो जाएगी लेकिन बाली को भगवान राम ने साल के वृक्ष के पीछे जो सात साल के वृक्ष थे , जिन्हें एक-एक कर के वाली , एक ही तीर से आर-पार बींध देता था। और जिन सातों साल के वृक्षों को राम ने एक साथ , एक ही बाण से आर-पार बींध दिया था ।उसके बाद उनका वही बाण , पृथ्वी को फोड़ कर वापिस लौटा ,और राम के तरकस में समा गया था। यह काम बाण ने एक ही मुहूर्त में (लगभग ४५ मिनिट) कर दिखाया। राम जी का यही पराक्रम देख कर , सुग्रीव को भरोसा हो गया कि राम , वाली को मार सकेंगे।अतः जब दोनों भाई युद्ध के लिए आए तो भगवान राम ने पहले वाण नहीं चलाया क्योंकि वो जानना चाहते थे सही या गलत कौन है अंततः दूसरे दिन जब सुग्रीव ने बाली को युद्ध के लिए ललकारा तो दोनों में सुग्रीव को माला इसलिए नहीं पहनाया कि दोनों को पहचानते नहीं थे इसलिए पहनाया की तुम विजय होगे और बाली को भगवान राम ने बाण से छुपकर मारा बाली के ह्रदय में जब तीर लगा हुआ था। जब वह मरने की स्थिति में था तब बाली ने कुछ प्रश्न भगवान से पूछे कहा प्रभु आपने मुझे क्यों मारा। किसी राजा को तपस्या के लिए मेरी छाल किसी काम की नहीं आएगी क्योंकि बंदरों को तो दूषित माना जाता है, और मेरा मांस भी किसी काम का नहीं है। क्योंकि यह खाने के काम नहीं आता। आपने मेरे से सामने आकर युद्ध क्यों नहीं किया। आपने यह कायरता का काम क्यों किया तब भगवान राम ने उसे आशा दिलाया की ऐ ऐसी बाण है जो निकाल दूंगा तो पुनः जीवन मिल जायेगा तब बाली भगवान राम को ईश्वर के रूप में देखा और उसने कहा यदि मैं जीवित रहा तो भोग विलास में लिप्त हो जाऊंगा और अन्त में उसे कष्ट के रूप में भोगना पड़ेगा अतः भगवान राम ने बाली को मोक्ष दिया ऐ जीवन और मरन का अंतर आम आदमी को सही लगता है और विलाप करता है लेकिन सिद्ध या तत्वदर्शी संत को यह मालूम हीं नहीं होता है कि मैं मरा या जिन्दा हो क्योंकि वो तो राम नाम की माया में खोया रहता है अतः आप मत नाचो एक अच्छा इंसान बनो माँ बाप की सेवा करो क्योंकि ऐ तुम्हारा कर्तव्य है। ईएमएस / 07 फरवरी 26