मानव समाज ने विकास के नाम पर जिस क्रूरता से प्रकृति-प्रदत्त हरे-भरे जंगलों और पर्वत श्रंखलाओं को नष्ट किया है उसके अब दूष्परिणाम सामने आने लगे हैं। मानव ने जंगलों को खत्म कर कंक्रीट के जंगल खड़े किए, बहुतायत में पहाड़ों को समतल किया गया और भूमिगत जल के साथ ही तमाम तरह की खनिज संपदा निकालकर पृथ्वी को अंदर से भी खोखला कर दिया। ये वो प्राकृतिक चीजें हैं जो पृथ्वी के संतुलन को बनाए रखती हैं, जब यही असंतुलित हो गईं तो फिर प्रकृति खुद अपना संतुलन तो बनाएगी ही। इसलिए पिछले कुछ वर्षों में दुनिया के अलग–अलग हिस्सों से लगातार भूकंप के झटकों, तीव्र तूफानों, भीषण बारिश, बाढ़ और सुप्त ज्वालामुखियों के सक्रिय होने की खबरें सामने आ रही हैं। इन घटनाओं को केवल संयोग नहीं कह सकते हैं। दरअसल ये पृथ्वी की भूगर्भीय गतिविधियों और तेजी से बिगड़ते प्राकृतिक संतुलन की ओर इशारा कर रही हैं। प्रकृति मानो यह संकेत दे रही है कि वह अपने भीतर जमा दबाव को बाहर निकालने की प्रक्रिया में है, जिसे वैज्ञानिक भाषा में टेक्टोनिक प्लेटों की हलचल और जलवायु परिवर्तन से जोड़कर देखा जाता है। भूगाल की भाषा में कहें तो भूकंप पृथ्वी की आंतरिक प्लेटों के आपसी टकराव, खिसकने या टूटने का परिणाम होते हैं। प्रशांत महासागर का ‘रिंग ऑफ फायर’ क्षेत्र इसका प्रमुख उदाहरण है, जहां दुनिया के लगभग 90 प्रतिशत भूकंप आते हैं और कई ज्वालामुखी सक्रिय रहते हैं। यह क्षेत्र लंबे समय से भूगर्भीय रूप से संवेदनशील रहा है, लेकिन हाल के वर्षों में इसकी गतिविधियों में तेजी आई है। इसके साथ ही, यूरोप, एशिया और अमेरिका जैसे क्षेत्रों में भी असामान्य भूकंपीय गतिविधियां देखी जा रही हैं, जो पृथ्वी के भीतर बढ़ते असंतुलन का संकेत मानी जा सकती हैं। दूसरी ओर, मौसम संबंधी आपदाएं भी इसी कड़ी का हिस्सा हैं। हाल ही में यूरोप के इबेरियन प्रायद्वीप पर स्टॉर्म लियोनार्डो ने भारी तबाही मचाई। स्पेन और पुर्तगाल में मूसलाधार बारिश और तेज हवाओं के कारण नदियां उफान पर आ गईं, बाढ़ जैसे हालात बने और हजारों लोगों को अपने घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। अकेले स्पेन के अंडालूसिया क्षेत्र में 11 हजार से अधिक लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया, जबकि पुर्तगाल के कई शहरों में आपातकाल लागू करना पड़ा। स्थिति की गंभीरता इस बात से समझी जा सकती है कि लियोनार्डो के गुजरने के बाद भी खतरा टला नहीं है। मौसम विभाग चेतावनी दे चुका है कि मार्ता तूफान तट से टकरा सकता है, जिसकी रफ्तार 100 किलोमीटर प्रति घंटे तक हो सकती है। लगातार बारिश के कारण जमीन पहले ही पानी से संतृप्त हो चुकी है और अब उसमें और पानी समाने की क्षमता नहीं बची है। इसका सीधा असर नदियों के जलस्तर, बांधों और जलाशयों पर पड़ रहा है, जिससे बड़े पैमाने पर बाढ़ और भूस्खलन का खतरा बढ़ने की आशंका भी जताई जा रही है। अंडालूसिया के कोर्डोबा प्रांत में ग्वाडलक्विविर नदी का जलस्तर खतरनाक स्तर तक पहुंच गया, जिसके चलते रिहायशी इलाकों को खाली कराना पड़ा और ऐतिहासिक रोमन ब्रिज पर आवाजाही रोक दी गई। ग्रहजालेमा पर्वतीय क्षेत्र में तो हालात और भी चिंताजनक हैं, जहां चट्टानें अत्याधिक पानी सोखने पर घुलने लग जाती हैं। इससे जमीन धंसने का खतरा पैदा हो जाता है, जिससे मकानों और सड़कों की सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बन जाता है। पुर्तगाल में भी हालात अलग नहीं हैं। साडो नदी के किनारे स्थित अल्कासेर शहर का बड़ा हिस्सा कई दिनों से पानी में डूबा हुआ है। बताया जा रहा, कि लोगों के पास पहनने के कपड़ों के अलावा कुछ नहीं बचा और हजारों नागरिकों को तत्काल सहायता की जरूरत है। टैगस नदी सहित छह प्रमुख नदियों को रेड अलर्ट पर रखा गया है। सरकार ने फरवरी मध्य तक 69 नगरपालिकाओं में आपदा स्थिति बढ़ाने का फैसला किया है, जो इस संकट की व्यापकता को दर्शाता है। ऐसे में साधारणत: यही कहा जाता है कि इन सभी घटनाओं के पीछे जलवायु परिवर्तन की बड़ी भूमिका है। बढ़ता वैश्विक तापमान, अनियंत्रित शहरीकरण, वनों की कटाई और प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन मौसम चक्र को असंतुलित कर रहे हैं। लगातार आने वाले तूफानों की यह ‘स्टॉर्म ट्रेन’ बताती है कि अब चरम मौसमी घटनाएं अपवाद नहीं, बल्कि नई सामान्य स्थिति बनती जा रही हैं। भूकंप के झटके, तीव्र तूफान और ज्वालामुखीय गतिविधियां यह संकेत देती हैं कि प्रकृति अपने तरीके से संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है। अब सवाल यह है कि क्या मानव समाज इन चेतावनियों को गंभीरता से ले रहा है? केवल आपदा के बाद राहत और बचाव पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं होगा। जरूरत है मजबूत बुनियादी ढांचे, बेहतर शहरी नियोजन, वैज्ञानिक चेतावनी प्रणालियों और दीर्घकालिक पर्यावरण संरक्षण नीतियों की। यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि प्रकृति के साथ टकराव नहीं, बल्कि सामंजस्य ही मानव सभ्यता की सुरक्षा का एकमात्र रास्ता है। यदि समय रहते संतुलन नहीं साधा गया, तो आने वाले वर्षों में ऐसी आपदाएं और अधिक भयावह रूप ले सकती हैं। प्रकृति के संकेत साफ हैं, अब भी चेत जाने का वक्त है। .../ 7 फरवरी /2026