अंतर्राष्ट्रीय
07-Feb-2026
...


इस्लामाबाद,(ईएमएस)। पाकिस्तान का बलूचिस्तान प्रांत, जिसे अक्सर अस्थिरता और संघर्ष के लिए जाना जाता है, अब वैश्विक महाशक्तियों के बीच आर्थिक युद्ध का नया केंद्र बन गया है। बलूचिस्तान की बंजर जमीन के नीचे दबे सोने, चांदी और तांबे के विशाल भंडार पर अब अमेरिका की नजर टिक गई है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अपने महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट वॉल्ट के तहत बलूचिस्तान की प्रसिद्ध रेको डीक खदान में 1.3 अरब डॉलर (लगभग 1.17 लाख करोड़ रुपये) के निवेश का ऐतिहासिक ऐलान किया है। अमेरिका का यह कदम केवल व्यापारिक निवेश नहीं, बल्कि चीन के खिलाफ एक सोची-समझी रणनीतिक चाल है। वर्तमान में रेयर अर्थ मिनरल्स (दुर्लभ खनिजों) के वैश्विक बाजार पर चीन का एकाधिकार है। डिफेंस, इलेक्ट्रिक वाहन और उच्च तकनीक वाले उद्योगों के लिए ये खनिज अनिवार्य हैं। चीन के इस दबदबे को चुनौती देने के लिए अमेरिका ने अपनी स्ट्रैटेजिक क्रिटिकल मिनरल्स रिजर्व नीति के तहत पाकिस्तान के इस खजाने में अपनी हिस्सेदारी पक्की की है। 2 फरवरी 2026 को लॉन्च किया गया ‘प्रोजेक्ट वॉल्ट’ मुख्य रूप से अमेरिका के भीतर खनन परियोजनाओं पर केंद्रित है, लेकिन रेको डीक इस परियोजना का एकमात्र और सबसे बड़ा विदेशी निवेश स्थल बनकर उभरा है। रेको डीक खदान की महत्ता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसे दुनिया के सबसे बड़े तांबे और सोने के भंडारों में से एक माना जाता है। बलूचिस्तान के चागई पहाड़ों में स्थित यह इलाका एक प्राचीन ज्वालामुखी श्रृंखला का हिस्सा है। आंकड़ों के अनुसार, यहाँ अनुमानित 5.9 बिलियन टन अयस्क मौजूद है, जिसमें 41.5 मिलियन औंस सोने और भारी मात्रा में तांबे का भंडार छिपा है। यही कारण है कि इस खदान को सोने का पहाड़ भी कहा जाता है। हालांकि, इस निवेश की राह काँटों भरी है। बलूचिस्तान लंबे समय से अलगाववादी आंदोलनों और सुरक्षा चुनौतियों से जूझ रहा है। इससे पहले 2011 में इस खदान को लेकर कानूनी विवाद अंतरराष्ट्रीय अदालतों तक पहुँच चुका है। वर्तमान में कनाडाई कंपनी बैरिक गोल्ड इस पर काम कर रही है, लेकिन हालिया सुरक्षा घटनाओं ने कंपनियों को डरा रखा है। इन जोखिमों के बावजूद अमेरिका का निवेश आगे बढ़ाना यह दर्शाता है कि उसे इन खनिजों की कितनी सख्त जरूरत है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह निवेश पाकिस्तान की चरमराती अर्थव्यवस्था के लिए एक सहारा हो सकता है, लेकिन इसके राजनीतिक मायने भी गहरे हैं। बलूचिस्तान में चीन पहले से ही सक्रिय है, ऐसे में अमेरिका का प्रवेश यहाँ एक नया कूटनीतिक तनाव पैदा कर सकता है। अमेरिकी विदेश विभाग के इस फैसले को पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व और व्हाइट हाउस के बीच बढ़ती नजदीकियों के प्रतिफल के रूप में भी देखा जा रहा है। अब देखना यह होगा कि अमेरिका इस अशांत क्षेत्र में अपने हितों की रक्षा कैसे करता है और चीन इस नई चुनौती का क्या जवाब देता है। वीरेंद्र/ईएमएस 07 फरवरी 2026