राष्ट्रीय
07-Feb-2026
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नई दिल्ली,(ईएमएस)। भारतीय सेना के पूर्व प्रमुख जनरल एम.एम. नरवणे की बहुचर्चित आत्मकथा फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। हाल ही में सामने आए तथ्यों के अनुसार, पिछले पांच वर्षों में सैन्य अधिकारियों द्वारा लिखी गई लगभग सभी पुस्तकों को मंजूरी मिल गई है, लेकिन जनरल नरवणे की यह किताब अब भी रक्षा मंत्रालय की समीक्षा प्रक्रिया में अटकी हुई है। यह वही पुस्तक है जिसका उल्लेख लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने किया था, जिसके बाद इस पर राजनीतिक गलियारों में काफी तीखी बहस हुई थी। सूचना के अधिकार से प्राप्त जानकारी के अनुसार, वर्ष 2020 से 2024 के बीच रक्षा मंत्रालय के पास कुल 35 पुस्तकों के शीर्षक अनुमोदन के लिए भेजे गए थे। मंत्रालय ने इनमें से 32 पुस्तकों को हरी झंडी दे दी है। लंबित सूची में शामिल अन्य दो पुस्तकें, जिनमें पूर्व सेना प्रमुख जनरल एन.सी. विज की अलोन इन द रिंग और ब्रिगेडियर जीवन राजपुरोहित की कृति शामिल थी, उन्हें भी अब मंजूरी मिल चुकी है। वर्तमान में जनरल नरवणे की किताब ही इकलौती ऐसी पांडुलिपि बची है, जो आधिकारिक तौर पर मंत्रालय के पास विचाराधीन है। जनरल नरवणे ने वर्ष 2019 से 2022 तक सेना प्रमुख के रूप में अपनी सेवाएँ दीं। उनके कार्यकाल के दौरान पूर्वी लद्दाख में वास्तविक नियंत्रण रेखा पर चीन के साथ अभूतपूर्व तनाव की स्थिति बनी थी। दिसंबर 2023 में जब इस पुस्तक के कुछ अंश सार्वजनिक हुए थे, तब उन्होंने राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े संवेदनशील मुद्दों पर नई बहस छेड़ दी थी। विपक्ष का दावा है कि पुस्तक में 31 अगस्त 2020 की उस रात का विवरण है, जब चीनी टैंक रेचिन ला क्षेत्र की ओर बढ़ रहे थे। कथित तौर पर जनरल नरवणे ने लिखा है कि उस चुनौतीपूर्ण रात में रक्षा मंत्री के साथ संवाद के दौरान उन्हें एक हॉट पोटैटो (अत्यधिक कठिन स्थिति) सौंप दी गई थी, जहाँ उन्हें तत्काल बड़े सैन्य निर्णय लेने थे। विशेषज्ञों का मानना है कि लद्दाख गतिरोध और सरकार के साथ सैन्य संवाद के इन संवेदनशील खुलासों के कारण ही रक्षा मंत्रालय इस पांडुलिपि की बेहद बारीकी से समीक्षा कर रहा है। जहाँ एक ओर लेफ्टिनेंट जनरल एस.ए. हसनैन और मेजर जनरल जी.डी. बख्शी जैसे अधिकारियों की पुस्तकों को अनुमति मिल चुकी है, वहीं इस देरी ने राजनीतिक रंग ले लिया है। सरकार ने स्पष्ट किया है कि वह पूर्व सेना प्रमुख का पूरा सम्मान करती है, जबकि विपक्ष इसे सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाने के अवसर के रूप में देख रहा है। वर्तमान में प्रकाशक और मंत्रालय दोनों ने इस विषय पर चुप्पी साध रखी है। वीरेंद्र/ईएमएस/07फरवरी2026