श्रीनगर,(ईएमएस)। पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में एक शिया मस्जिद पर हुए भीषण आत्मघाती हमले की गूँज शुक्रवार को कश्मीर घाटी की सड़कों पर सुनाई दी। इस्लामाबाद के तरलाई इलाके में स्थित खादिजा तुल कुबरा मस्जिद में जुमे की नमाज के दौरान हुए इस धमाके में 31 लोगों की मौत और 169 से अधिक लोगों के घायल होने की खबर ने सरहद के इस पार भी लोगों को झकझोर कर रख दिया है। इस पवित्र स्थल पर हुए रक्तपात के विरोध में जम्मू-कश्मीर के शिया समुदाय और आम नागरिकों ने स्वतःस्फूर्त विरोध प्रदर्शन कर पाकिस्तान सरकार के खिलाफ कड़ा आक्रोश व्यक्त किया है। कश्मीर के विभिन्न हिस्सों में हुए ये प्रदर्शन किसी राजनीतिक दल या संगठन के आह्वान पर नहीं थे, बल्कि यह लोगों के भीतर उपजे डर और असुरक्षा की भावना का परिणाम थे। हमले की खबर फैलते ही बारामूला के चैनाबल पट्टन और डाइवर परिहासपोरा में बड़ी संख्या में लोग सड़कों पर उतर आए। प्रदर्शनकारियों ने कुछ समय के लिए रास्तों को अवरुद्ध किया और पाकिस्तान के खिलाफ जमकर नारेबाजी की। श्रीनगर के शिया बहुल इलाकों जैसे इमामबाड़ा जदीबल और हरवान में भी ऐसा ही नजारा देखने को मिला, जहां लोगों ने पाकिस्तान सरकार की विफलता पर कड़ा विरोध दर्ज कराया। बांदीपोरा के इंदरकोट-सुंबल इलाके में शाम को कैंडल मार्च निकालकर मृतकों को श्रद्धांजलि दी गई और पाकिस्तान मुर्दाबाद के नारे लगाए गए। सुरक्षा विशेषज्ञों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि घाटी में पाकिस्तान के खिलाफ यह स्वर एक बड़े बदलाव का संकेत है। दशकों से पाकिस्तान खुद को कश्मीर के मुसलमानों के मसीहा और रक्षक के रूप में पेश करने का प्रोपेगेंडा चलाता रहा है, लेकिन उसके अपने ही देश में शिया समुदाय पर बार-बार होने वाले लक्षित हमलों ने इस दावे की पोल खोल दी है। जानकारों का कहना है कि ये प्रदर्शन पाकिस्तान के सैन्य नेतृत्व और विशेषकर आर्मी चीफ आसिम मुनीर के लिए एक बड़ा झटका हैं, क्योंकि अब कश्मीर के लोग सीमा पार की सांप्रदायिक अस्थिरता को पहचान रहे हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, पाकिस्तान में मस्जिदों और धार्मिक जुलूसों पर हो रहे आतंकी हमले अब कश्मीर में उल्टा असर डाल रहे हैं। पहले जहाँ सीमा पार की घटनाओं का इस्तेमाल कुछ वर्गों में सहानुभूति पैदा करने के लिए किया जाता था, वहीं अब वही घटनाएँ नाराजगी में बदल रही हैं। प्रदर्शनों में शामिल लोगों का सीधा सवाल था कि जो देश अपनी राजधानी में इबादत कर रहे लोगों और अल्पसंख्यकों को सुरक्षा नहीं दे पा रहा, वह दूसरों के अधिकारों की बात करने का नैतिक आधार कैसे रख सकता है। इन प्रदर्शनों को सीमा पार बैठे उन तत्वों के लिए भी एक गंभीर चेतावनी माना जा रहा है जो कश्मीर में धार्मिक भावनाओं को भड़काने का काम करते हैं। अब हालात ऐसे बन रहे हैं कि कश्मीर का एक बड़ा वर्ग पाकिस्तान को अपने भविष्य के साथ जोड़ने के बजाय उसे सांप्रदायिक हिंसा और अस्थिरता का स्रोत मानने लगा है। यह जन-आक्रोश दर्शाता है कि आतंकवाद और कट्टरवाद की कोई सीमा नहीं होती और पाकिस्तान की अपनी नीतियां अब खुद उसी के लिए कूटनीतिक और वैचारिक चुनौती बनती जा रही हैं। वीरेंद्र/ईएमएस/07फरवरी2026