राष्ट्रीय
08-Feb-2026
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बेंगलुरु,(ईएमएस)। कर्नाटक उच्च न्यायालय ने एक ऐतिहासिक फैसले में 84 वर्षीय बुजुर्ग पिता के सम्मान और अधिकारों की रक्षा करते हुए उस गिफ्ट डीड (उपहार विलेख) को रद्द कर दिया है, जिसके माध्यम से उन्होंने अपनी दो एकड़ से अधिक जमीन अपनी दो बेटियों के नाम कर दी थी। अदालत का यह निर्णय उन बुजुर्गों के लिए एक बड़ी राहत और उम्मीद की किरण बनकर उभरा है, जिन्हें संपत्ति हथियाने के बाद उनके ही बच्चों द्वारा बेसहारा छोड़ दिया जाता है। न्यायमूर्ति सूरज गोविंदराज की पीठ ने इस मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि संपत्ति मिलने के बाद पिता को भोजन, आश्रय और बुनियादी जरूरतों के लिए तरसाना कंस्ट्रक्टिव फ्रॉड यानी रचनात्मक धोखाधड़ी की श्रेणी में आता है। अदालत ने अपने आदेश में बेहद मार्मिक टिप्पणी करते हुए कहा कि बुजुर्गों द्वारा अपने बच्चों को दी गई संपत्ति महज एक कानूनी दस्तावेज नहीं, बल्कि एक गहरा भरोसा है, और इस भरोसे के टूटने पर कानून मूकदर्शक बनकर नहीं बैठ सकता। पूरा मामला तुमकुरु तालुक के निवासी वेंकटैया से जुड़ा है, जिन्होंने वर्ष 2023 में इस उम्मीद और आश्वासन पर अपनी जमीन अपनी दो बेटियों, शिवम्मा और पुट्टम्मा को उपहार में दी थी कि वे उनके बुढ़ापे की लाठी बनेंगी। लेकिन जैसे ही जमीन के कागजात बेटियों के नाम हुए, उन्होंने अपने पिता की देखभाल करने के बजाय उन्हें उपेक्षित करना शुरू कर दिया। विवश होकर वेंकटैया ने माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 की धारा 23 के तहत न्याय की गुहार लगाई। हालांकि, शुरुआती स्तर पर स्थानीय अधिकारियों ने उनकी याचिका इस तकनीकी आधार पर खारिज कर दी थी कि गिफ्ट डीड के दस्तावेजों में देखभाल करने की कोई स्पष्ट लिखित शर्त नहीं जुड़ी थी। उच्च न्यायालय ने अधिकारियों के इस तकनीकी तर्क को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि भारतीय समाज, विशेषकर ग्रामीण परिवेश में, वरिष्ठ नागरिक कानूनी औपचारिकताओं के बजाय विश्वास और पारिवारिक नैतिकता पर निर्भर रहते हैं। न्यायमूर्ति गोविंदराज ने जोर देकर कहा कि यदि हर गिफ्ट डीड में भरण-पोषण की लिखित शर्त को अनिवार्य माना जाएगा, तो यह इस अधिनियम के सुरक्षात्मक उद्देश्य को ही विफल कर देगा। अदालत ने पाया कि चूंकि वेंकटैया अनपढ़ थे और दस्तावेज उनकी बेटियों द्वारा तैयार कराए गए थे, इसलिए जानबूझकर देखभाल की शर्त को लिखित रूप में शामिल न करना उनकी दुर्भावना और धोखाधड़ी की मंशा को दर्शाता है। अदालत ने अधिनियम की धारा 23(1) की व्यापक व्याख्या करते हुए व्यवस्था दी कि यदि कोई वरिष्ठ नागरिक अपनी संपत्ति उपहार में देता है और प्राप्तकर्ता बुनियादी सुविधाएं प्रदान करने में विफल रहता है, तो यह माना जाएगा कि हस्तांतरण धोखाधड़ी या अनुचित प्रभाव के तहत हुआ था। इस मामले में एक बेटी पुट्टम्मा ने पिता की बात स्वीकार कर ली, लेकिन मृतक बेटी के बेटे नरसेगौड़ा ने याचिका का विरोध किया। अदालत ने नाती के दावे को कड़ी फटकार के साथ खारिज करते हुए कहा कि बिना जिम्मेदारी निभाए केवल संपत्ति पर अधिकार जताना कानून का दुरुपयोग है। अंततः, हाईकोर्ट ने राजस्व अधिकारियों को तत्काल निर्देश दिया कि तुमकुरु की उक्त संपत्ति के रिकॉर्ड में वेंकटैया का नाम फिर से पूर्ण स्वामी के रूप में दर्ज किया जाए। यह फैसला समाज को यह कड़ा संदेश देता है कि बुजुर्गों का भरण-पोषण केवल नैतिक ही नहीं, बल्कि एक अनिवार्य कानूनी जिम्मेदारी भी है। वीरेंद्र/ईएमएस/08फरवरी2026