राज्य
08-Feb-2026
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गरीबों के हक का चावल सड़ रहा, जिम्मेदारों की अनदेखी से सरकार को करोड़ों रूपए का नुकसान गरीबों का निवाला खा रहे कीड़े! -गरीबों की थाली में पहुंच रहा रिजेक्टेट अनाज, लाखों गरीबों को मिलने वाले राशन में कंकड़ और पत्थर भोपाल/मंडला/डिंडोरी (ईएमएस)। मप्र देश में अनाज उत्पादन में अव्वल बना हुआ है। वहीं प्रदेेश के गोदामों में रखा गेहूं और चावल खराब हो रहा है। जिम्मेदारों की अनदेखी से सरकार को करोड़ों रूपए का नुकसान हो रहा है। हद तो यह है कि सड़ा-गला गेहूं और चावल गरीबों को बांटा जा रहा है। आलम यह है कि लगातार शिकायत के बाद भी गोदामों में रखे अनाज की देख-रेख नहीं की जा रही है। इसका परिणाम यह हो रहा है की गोदामों में रखा गरीबों का निवाला कीड़े खा रहे हैं। गौरतलब है कि मप्र के सरकारी गोदामों में रखा कई हजार क्विंटल अनाज हर साल सड़ जाता है। ऐसी ही एक तस्वीर मंडला के सरकारी गोदाम से सामने आई है, जो सरकारी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर रही है। किसानों के पसीने से पैदा हुआ अन्न, जो गरीबों की थाली तक पहुंचना था। आज सरकारी गोदामों में घुन का शिकार बन चुका है। मंडला में 15 हजार क्विंटल गेहूं बर्बाद हो गया है। वहीं डिंडोरी में गरीबों के हक का 48 हजार क्विंटल चावल सड़ गया। वर्ष 2023-24 में जिले की पांच राइस मिलों से मिलिंग के बाद यह चावल नागरिक आपूर्ति निगम के गोदामों में जमा कराया गया था। जांच में पाया गया कि चावल की गुणवत्ता मानकों के अनुरूप नहीं थी। इसके बावजूद उसे भंडारण की अनुमति दे दी गई। यह चावल सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से जरूरतमंदों तक पहुंचाया जाना था, लेकिन ऐन समय पर गुणवत्ता पर सवाल उठने से वितरण रोक दिया गया। मंडला में 15 हजार क्विंटल गेहूं बर्बाद मंडला के सरकारी अनाज भंडारण व्यवस्था की घोर लापरवाही उजागर हुई है। समर्थन मूल्य पर किसानों से खरीदा गया हजारों क्विंटल गेहूं, जिम्मेदारों की अनदेखी के कारण अब खाने लायक नहीं बचा है। अनदेखी और समय पर गेहूं का उठान न होने से घुन लग गया है। यह स्थिति केवल एक सरकारी भंडारण केंद्र की नहीं है, बल्कि यह हालत नैनपुर, बम्हनी और बिछिया क्षेत्रों में स्थित लगभग 9 सरकारी गोदामों में भंडारण की यही स्थिति है। जिम्मेदारों ने गेहूं में दवा का छिडक़ाव नहीं किया, जिससे गोदामों रखे पूरे गेहूं की गुणवत्ता खराब हो गई है। यहां करीब 15 हजार क्विंटल गेहूं में घुन लग चुका है, चौंकाने वाली बात यह है कि यह अनाज पिछले 21 महीनों से गोदामों में यूं ही रखा हुआ था। न समय पर उठाव हुआ, न कीटनाशकों का छिडक़ाव और न ही किसी ने पलटकर देखने की जहमत उठाई। यदि बाजार मूल्य और भंडारण लागत को जोड़ा जाए, तो इस लापरवाही से सरकारी खजाने को 50 करोड़ रुपए से अधिक के नुकसान की आशंका है। यह सिर्फ पैसों का नुकसान नहीं है, बल्कि उस अन्न की बर्बादी है जो हजारों परिवारों का पेट भर सकता था। घुने गेहूं को पीडीएस दुकानों में भेजने की तैयारी सरकार और प्रशासन की मंशा पर सवाल उठाए हुए कांग्रेस नेता अशोक मर्सकोले ने कहा कि घुन लगा गेहूं साफ कर क्या प्रशासन गरीबों को खिलाने की तैयारी कर रहा है? विभाग से जुड़े लोगों से जानकारी मिल रही है कि इसी खराब गेहूं को पीडीएस प्रणाली के जरिए राशन दुकानों तक भेजने की योजना बनाई जा रही है। आनन-फानन में गेहूं की सफाई और सेग्रीगेशन की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या केवल सफाई से घुन लगा अनाज सुरक्षित और खाने लायक हो सकता है? क्या जिम्मेदारों की लापरवाही की कीमत गरीब चुकाएगा? एफसीआई ने रिजेक्ट कर दिया था गेहूं नागरिक आपूर्ति निगम के प्रबंधक हेमंत वर्मा ने बताया कि नैनपुर और बम्हनी में 2024 का गेहूं है। 2024 -25 में गेहूं का उपार्जन का काम जो था मार्फेट एजेंसी द्वारा किया गया था। एजेंसी ने कुछ चमक विहीन गेहूं खरीद कर लिया था। जिसको एफसीआई की टीम रिजेक्ट कर खरीदने से इंकार कर दिया था। जांच में यह गेहूं गुणवत्ताहीन पाया गया था, जिस कारण एफसीआई ने उठाओ नहीं कराया था। इसके बाद लंबे समय से गेहूं वेयर हाउस में रखा हुआ है। इस कारण कुछ गेहूं खराब हो गया, जिसकी साफ सफाई वेयर हाउस के मैनेजर के द्वारा कराई है 48 हजार क्विंटल चावल सड़ गया प्रदेश के आदिवासी बहुल डिंडोरी जिले से सरकारी लापरवाही की एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आई है। यहां सार्वजनिक वितरण प्रणाली के लिए रखे गए हजारों क्विंटल चावल समय पर वितरण और उचित निगरानी के अभाव में गोदामों में सडक़र पूरी तरह खराब हो गया। बताया जा रहा है कि करीब 47,979 क्विंटल चावल, जिसकी कीमत लगभग 27 करोड़ रुपये आंकी जा रही है, अब उपयोग के लायक तक नहीं बचा है। वर्ष 2023-24 में जिले की पांच राइस मिलों से मिलिंग के बाद यह चावल नागरिक आपूर्ति निगम के गोदामों में जमा कराया गया था। जांच में पाया गया कि चावल की गुणवत्ता मानकों के अनुरूप नहीं थी। इसके बावजूद उसे भंडारण की अनुमति दे दी गई। यह चावल सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से जरूरतमंदों तक पहुंचाया जाना था, लेकिन ऐन समय पर गुणवत्ता पर सवाल उठने से वितरण रोक दिया गया। दो साल तक चलता रहा कागजी खेल मामले के सामने आने के बाद नोटिस और पत्राचार का सिलसिला शुरू हुआ, लेकिन जमीनी स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई। परिणाम यह हुआ कि खराब गुणवत्ता वाला चावल दो वर्षों तक गोदामों में पड़ा रहा और अंतत: पूरी तरह सड़ गया। अब स्थिति ऐसी है कि इसे हटाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। वेयरहाउसिंग विभाग के जिला प्रबंधक ने स्वीकार किया है कि इस मामले में गोदाम प्रबंधन, खाद्य विभाग और संबंधित अधिकारियों की लापरवाही रही है। वहीं, कुछ राइस मिल संचालकों ने गोदामों में रखरखाव की कमी को कारण बताया है। जानकारी के अनुसार पांच में से केवल दो मिलर्स ने खराब चावल वापस लेकर नया चावल देने की सहमति जताई है। बाकी मिलर्स की ओर से अभी तक संतोषजनक जवाब नहीं मिला है। इससे यह सवाल उठ रहा है कि जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया कितनी प्रभावी होगी। मामले की गंभीरता को देखते हुए कलेक्टर अंजू पवन सिंह भदौरिया ने संबंधित राइस मिलर्स और गोदाम संचालकों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई और नुकसान की वसूली के लिए शासन को प्रस्ताव भेजा है। प्रशासनिक स्तर पर आगे की कार्रवाई अब राज्य शासन के निर्णय पर निर्भर करेगी। करोड़ों रुपये के अनाज के नुकसान ने सरकारी निगरानी तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दो वर्षों तक चली ढिलाई ने यह स्पष्ट कर दिया कि जवाबदेही तय किए बिना ऐसी घटनाएं दोबारा भी हो सकती हैं। अब देखना होगा कि इस मामले में जिम्मेदारों पर वास्तव में सख़्त कार्रवाई होती है या यह प्रकरण भी कागज़ी कार्यवाही तक सीमित रह जाता है। कटनी में हजारों टन गेहूं कटनी जिले में समर्थन मूल्य पर किसानों से खरीदे गए गेहूं को शासकीय उचित मूल्य की दुकानों (पीडीएस) के माध्यम से गरीबों तक पहुंचाने की योजना भारी अव्यवस्था की भेंट चढ़ गई है। जिले के अलग-अलग वेयरहाउसों में भंडारित करीब 5 हजार टन गेहूं बर्बाद हो चुका है। गेहूं पर कीड़े लग गए तो कहीं यह आटे में तब्दील हो गया। गरीबों के निवाले की यह दुर्दशा न केवल नागरिक आपूर्ति निगम, वेयर हाउस प्रबंधन, गोदाम प्रबंधन व जिला प्रशासन की लापरवाही उजागर करती है बल्कि जिम्मेदारों की कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है। समय पर उठाव न होने और यूमीगेशन में लापरवाही सबसे बड़ी वजह मानी जा रही है। 2019-20, 2020-21 और 2021-22 तक का गेहूं आज भी गोदामों में पड़ा हुआ है। केजी चौदह, राधिका, ओम साईराम, श्याभवी, पैक्स बराज, पैक्स विजयराघवगढ़ और श्रीनिवासन वेयरहाउस में यह अनाज भंडारित है। नान, वेयर हाउस प्रबंधन व डीसीसी कमेटी द्वारा अनाज को साफ कराए जाने का दावा किया जा रहा है, लेकिन जिमेदार एजेंसी ने न तो माल उठवाया और न ही अब तक आगे के लिए सुरक्षित कराया। जानकारी अनुसार भारतीय खाद्य निगम ने मार्च 2022 में ही इस गेहूं को अमानक और मानव स्वास्थ्य के लिए घातक घोषित कर दिया था। इसके बाद भी जिम्मेदार विभागों ने स्थिति सुधारने की जहमत नहीं उठाई। सवाल यह उठता है कि आखिर गरीबों के हक का अनाज पांच साल तक गोदामों में क्यों सडऩे दिया गया? करोड़ों रुपए भंडारण व सुरक्षा पर खर्च करने के बावजूद निगरानी क्यों नहीं हुई? हैरानी की बात यह है कि वेयरहाउस मालिकों को अनाज की सुरक्षा के लिए सरकार हर साल करोड़ों रुपए किराए के रूप में दे रही है, फिर भी अनाज जिले में साल दर साल खराब होता चला जा रहा है। हालांकि समय पर उठाव न कराया जाना भी प्रमुख समस्या है। सरकारी आंकड़ों की बात करें तो 2019-20 के भंडारण पर 3 करोड़ 81 लाख 7 हजार 880 रुपए, 2020-21 पर 4 करोड़ 70 लाख 3 हजार 568 रुपए, 2021-22 पर 3 करोड़ 61 लाख 9 हजार 980 रुपए से अधिक का भुगतान किया गया है। यानी केवल किराए और भंडारण में ही कई करोड़ रुपए झोंक दिए गए, लेकिन गरीबों के निवाले की रक्षा नहीं हो सकी।