नई दिल्ली (ईएमएस)। आयुर्वेद के अनुसार मानव शरीर को सुचारू रूप से चलाने के लिए तीन दोष वात, पित्त और कफ का संतुलित रहना बेहद जरूरी है। सर्दियों में प्राकृतिक रूप से शरीर में वात दोष की वृद्धि होने लगती है, जिससे जोड़ों में दर्द, पेट की गड़बड़ी, कब्ज, जकड़न और हड्डियों से जुड़े रोग बढ़ जाते हैं। ऐसे में आयुर्वेदिक औषधि त्रिफला बेहद प्रभावी मानी जाती है, जो न केवल पाचन संबंधी समस्याओं को सुधारती है, बल्कि बढ़े हुए वात दोष को भी संतुलित करती है। हालांकि, इसका सही तरीके से सेवन करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि सेवन विधि ही इसके प्रभाव को निर्धारित करती है। आयुर्वेद में बताया गया है कि वात दोष को कम करने के लिए त्रिफला का सेवन वसा के साथ अधिक लाभकारी होता है। वसा त्रिफला के गुणों को सक्रिय कर शरीर में तेजी से कार्य करने में मदद करती है। सबसे सरल और प्रभावी तरीका है रात में एक गिलास गुनगुने पानी में आधा से एक चम्मच त्रिफला मिलाकर, उसमें शुद्ध देसी घी डालकर पीना। यह संयोजन आंतों में चिकनाहट पैदा करता है, जिससे विषाक्त पदार्थों को बाहर निकालना आसान हो जाता है। दूसरा प्रभावी विकल्प है त्रिफला घृत। यह आयुर्वेदिक औषधि घी को कई जड़ी-बूटियों के साथ पकाकर तैयार की जाती है। सर्दियों में बढ़ते वात को शांत करने के लिए रात के समय त्रिफला घृत का सेवन लाभकारी माना जाता है। यह पेट से जुड़ी समस्याओं को भी दूर करने में मदद करता है। यदि बढ़ते वात के साथ कब्ज की समस्या भी परेशान कर रही हो, तो त्रिफला को अरंडी के तेल की कुछ बूंदों के साथ लिया जा सकता है। यह मिश्रण आंतों की गतिशीलता बढ़ाता है और कब्ज से राहत दिलाता है। ध्यान रखें कि सर्दियों में शाम और रात के समय वात दोष बढ़ता है, इसलिए रात के भोजन के कम से कम दो घंटे बाद ही त्रिफला का सेवन करना चाहिए। वात दोष बढ़ने पर शरीर में जकड़न, तनाव, बेचैनी, कंपन, कब्ज, नींद न आने की परेशानी और जोड़ों में दर्द बढ़ जाता है। सुदामा/ईएमएस 09 फरवरी 2026