- तैयार की जा रही आंदोलन की रणनीति - पचामा दादर के जंगल में खदान के लिए 60 हेक्टेयर वन भूमि प्रस्तावित - पर्यावरणीय असर और ग्रामसभा की सहमति पर उठे सवाल बालाघाट (ईएमएस)। जिले के दक्षिण बैहर क्षेत्र के पचामा दादर के घने वन क्षेत्र में लगभग 60 हेक्टेयर भूमि पर बाक्साइट खदान को शासन से स्वीकृति मिलने के बाद मामला तूल पकडऩे लगा है। खदान प्रस्ताव को लेकर जहां प्रशासनिक प्रक्रिया आगे बढ़ रही है, वहीं ग्रामीणों ने पर्यावरणीय प्रभाव और ग्रामसभा की भूमिका को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। गांव-गांव बैठकें हो रही है। आंदोलन की रणनीति तैयार की जा रही है। जनसुनवाई से पहले आंदोलन की तैयारी की जा रही है। जानकारी के अनुसार दक्षिण बैहर के ग्राम पंचायत लूद, बम्हनी, सारद, धानीटोला, घोंदी सहित अन्य गांवों के बीच जंगल में बाक्साइट खदान के लिए प्रशासकीय स्वीकृति मिली है। यह बाक्साइट खदान इन गांवों से करीब 10-12 किमी के दूरी पर संचालित होगी। लेकिन खदान के संचालन के लिए न केवल पेड़-पौधों की कटाई की जाएगी। बल्कि ग्रामीणों के आजीविका पर भी इसका प्रभाव पड़ेगा। इधर, बैहर विधायक संजय उइके के नेतृत्व में ग्रामीणों द्वारा आंदोलन की रणनीति तैयार की जा रही है। सूत्रों के अनुसार, खदान परियोजना को प्रारंभिक स्वीकृति मिली है और आगे की प्रक्रिया पर्यावरणीय एवं वैधानिक अनुमतियों पर निर्भर करेगी। ग्रामसभा की सहमति पर प्रश्न स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि खदान जैसी परियोजना के लिए वनाधिकार कानून और पंचायत (अनुसूचित क्षेत्र विस्तार) अधिनियम (पेसा) के तहत ग्रामसभा की स्पष्ट सहमति आवश्यक है। ग्रामीणों का आरोप है कि उन्हें इस संबंध में समुचित जानकारी नहीं दी गई और प्रक्रिया पारदर्शी नहीं रही। ग्राम पंचायत लूद के सरपंच चमरु सिंह टेकाम ने बताया कि पचामा दादर का जंगल क्षेत्र केवल वन भूमि नहीं, बल्कि स्थानीय आदिवासी समुदाय की आजीविका और सांस्कृतिक आस्था से जुड़ा है। यहां से महुआ, तेंदूपत्ता, लकड़ी और अन्य लघु वनोपज ग्रामीणों की आय का प्रमुख स्रोत है। पर्यावरणीय प्रभाव की आशंका वन भूमि पर खनन कार्य प्रारंभ होने की स्थिति में बड़े पैमाने पर पेड़-पौधों की कटाई संभावित है। इससे वन्यजीवों के आवास और जल स्रोतों पर भी प्रभाव पड़ सकता है। क्षेत्र के पर्यावरण प्रेमियों का कहना है कि दक्षिण बैहर का इलाका जैव विविधता की दृष्टि से संवेदनशील माना जाता है। ऐसे में पर्यावरण प्रभाव आकलन की रिपोर्ट को सार्वजनिक कर पारदर्शिता सुनिश्चित की जानी चाहिए। जनसुनवाई से पहले रणनीति इस मामले में 18 फरवरी को ग्राम पंचायत लूद में जनसुनवाई प्रस्तावित है। हालांकि, उससे पहले ही गांव-गांव बैठकों का दौर शुरू हो चुका है। बैठकों में खदान को लेकर किस तरह से विरोध किया जाना है, आंदोलन कैसे करना है सहित अन्य तरह की रणनीति तैयार कर ग्रामीणों को जागरुक किया जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि वे जनसुनवाई में बड़ी संख्या में पहुंचकर अपना पक्ष रखेंगे। बैठकों में यह भी चर्चा हो रही है कि यदि उनकी आपत्तियों पर ध्यान नहीं दिया गया तो वे आंदोलन को और तेज करेंगे। कुछ ग्रामीण संगठनों ने इस मुद्दे को व्यापक स्तर पर उठाने की तैयारी भी शुरू कर दी है। अब निगाहें 18 फरवरी की जनसुनवाई पर टिकी हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या प्रशासन ग्रामीणों की आपत्तियों और पर्यावरणीय चिंताओं को गंभीरता से लेते हुए परियोजना की शर्तों में बदलाव करता है या विरोध और तेज होता है। इनका कहना है पचामा दादर के जंगल में बाक्साइट खदान को स्वीकृति मिली है। करीब 60 हेक्टेयर भूमि पर इसका संचालन होगा। ग्रामीणों ने इसका विरोध शुरु कर दिया है। गांव-गांव बैठके ली जा रही है। 18 फरवरी को जनसुनवाई से पहले ग्रामीण वृहद पैमाने पर आंदोलन करने की योजना तैयार कर रहे हैं। चमरु सिंह तेकाम, सरपंच, ग्राम पंचायत लूद इस पर एक हिंदी में तंज भरा समाचार 600 शब्दों में तंज भरी हेडिंग्स बनाकर दे