लेख
10-Feb-2026
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(पुण्यतिथि पर विशेष) विलक्षण प्रतिभा के धनी दीनदयाल उपाध्याय का जन्म 25 सितम्बर 1916 को उत्तर प्रदेश के ग्राम नगला चन्द्र भान में हुआ था।हालकि परिवारिक कारणों से उनका बचपन अपने नाना चुन्नीलाल के घर ग्राम धनकिया में बीता। जब नाना नौकरी छोड़कर गुडकी मंडई आ गए तो वे भी अपने नाना के साथ गुडकी मंड ई आ गए।हालांकि दिनदयाल जी के 9वर्ष की आयु पूरी होने के बाबजूद उनके अध्ययन की कोई माकूल व्यवस्था नहीं थी अत वे अपने मामा राधारमण के पास आ गए जो गगापुर में रेलवे स्टेशन पर कार्यरत थे। ‌गंगा पुर आने के पश्चात ही उनकी सुचारू रुप से शिक्षा प्रारंभ हो सकी।गंगा पुर में वे चार सालों तक रहे।कयोकि गंगापुर में इससे आगे पढाई की व्यवस्था नहीं थी।ऐसी स्थिति में 2 जून 1929 को कोटा के एक स्कूल में दखिला लेना पडा। वे यहाँ सेल्फ सपोटिग हाउस में रहते थे।कक्षा 5 से 7 तक की परीक्षा उन्होंने प्रथम श्रेणी से उतीर्ण की। इसके पश्चात उन्हें राजगढ़ आना पडा। उन्होंने 8 वी कक्षा के राजगढ़ में दखिला लिया। 8 वी कक्षा मेंछऔठट शानदार अकों से उतीर्ण होकर जब वो 9 वी कक्षा में गए तो उनकी कबलियत के चलते 10 वी कक्ष के छात्र उनसे गणित के सवाल हल करवाने के लिए उनके पास आते थे। सीकर के कल्याण स्कूल से 10 की परीक्षा प्रथम श्रेणी श्रेणी से उतीर्ण करने के पश्चात 1937 में पिलानी से इंटरमीडिएट की परीक्षा में वे सवप्रथम रहे। तत्कालीन सीकर के महाराज कल्याण सिंह ने उन्हें स्वर्ण पदक प्रदान किया 10 रुपए माहवार छात्रवृत्ति और पुस्तक एवं आदि के लिए 250 रुपए की राशि पारितोषिक के रूप में दी गई । उन दोनों पिलानी उच्च शिक्षा का प्रसिद्ध केंद्र था । दीनदयाल इंटरमीडिएट की पढ़ाई के लिए 1935 में पिलानी चले गए 1937 में इंटरमीडिएट बोर्ड परीक्षा में बैठे और न केवल समस्त बोर्ड में प्रथम रहे सभी विषयों में विशेष योग्यता के अंक प्राप्त किए । बिरला कॉलेज के वे प्रथम छात्र थे जिसने इतने सम्मानजनक अकों में परीक्षा पास की थी। सीकर महाराज के समान ही घनश्याम दास बिड़ला ने एक स्वर्ण पदक 10 रुपये मासिक छात्रवृत्ति तथा पुस्तक आदि के खर्चे के लिए 250 रुपए प्रदान किए। इसी वर्ष बीए की पढ़ाई के लिए कानपुर गए यह रामा मंडी में किराए के मकान में रहे। 2 वर्ष तक यहां रहकर 1941 में मात्र 25 बर्ष की आयु में बीटी करने के लिए प्रयाग चले गए। 25वर्ष की आयु तक दीनदयाल राजस्थान और उत्तर प्रदेश के कम से कम ग्यारह स्थानो पर कुछ समय तक रहे।इसके साथ ही उनका प्रवेश , सार्वजनिक जीवन में हो गया है! कानपुर में अध्ययन करते समय अपने सहपाठी कालू जी महाशब्दे के माध्यम से वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में आए।कानपुर में ही पहली बार उनकी संघ संस्थापक डॉ केशव बलिराम हेडगेवार जी से मुलाकात हुई।बाबा साहेब आपटे के दादा राव परमार्थ इनके छात्रावास में ठहरा करते थे। उनकी इस दौरान अनेक मुद्दे पर विस्तार से चर्चा होती थी। दीनदयाल उपाध्याय जी ने वीर सावरकर के कानपुर प्रवास के दौरान उन्हे शाखा में आमंत्रित करके उनसे बौद्धिक वर्ग करवाया।कानपुर के सुन्दर भंडारी भी दीनदयाल जी के सहपाठी थे। संघ के शारीरिक कार्यक्रम को दीनदयाल जी भले ही ठीक तरह से नहीं कर पाते थे लेकिन बौद्धिक परीक्षा में सदैव अव्वल रहते थे।वे सच्चे अर्थों में भारतीयता के जीवंत प्रतीक और एक परिपूर्ण मानव थे। पंडित जी एक ऐसे निष्काम कर्मयोगी थे जिन्होंने राजनीति में रहते हुए अपने वतन की सेवा के व्रत के परायण में अपना सम्पूर्ण र्जीवन समर्पित कर दिया था। पंडित दीनदयाल उपाध्याय ने 1964को ग्वालियर में भारतीय जनसंघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा के अधिवेशन में एकात्म मानववाद का जो सिद्धांत दिया ,वह जीवन के सभी सुखो का मूल मंत्र है ।यह भारतीय दर्शन, भारतीय संस्कृति और भारतीय विचार का आज के युग के लिए अनुकूल समुच्चय है जो आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करेगा ।यह सिद्धांत समाज के अंतिम छोर तक के व्यक्ति के हित में कार्य करने का है ।पंडित दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानववाद का दर्शन एक ऐसा दर्शन है जो हमें हमारी संस्कृति और सभ्यता से जोड़े रखता है। पंडित दीनदयाल का जिक्र करते ही , पंडित जी की जो छवि हमारी आंखों के सामने उभरती है वह किसी बड़े राजनीतिक दल के कद्दावर नेता की नहीं बल्कि एक सहृदय अग्रज.आत्मीय मित्र.और मार्गदर्शक की है.हिन्दुस्तान भर के लाखों अनुयाई पं दीनदयाल को इस स्वरूप में अपने साथ पाते थे.आज हमारे मुल्क में राजनीति का जो स्वरूप हमें द्रष्टिगोचर होता है और उसमें राजनीति करते हुए तमाम सारे राजनीतिक दलों के जो नेता हमें मिलते हैं उनकी तुलना यदि दीनदयाल उपाध्याय के साथ करें तो हमें बेहद आश्चर्य होता है हमारे ज़हन में विचार आता है कि इस आपाधापी के दौर में भी हमें एैसी शख्सियत का मार्गदर्शन मिला। कालांतर में पंडित दीनदयाल जो अमूल्य विचार हमें प्रदान कर गए.वह न केवल इस कीर्ति की आत्मा और शरीर दोनों के ही अनुकूल था.प्रसिद्वि से दूर.अहंकार से रहित और निश्छल मुस्कुराहट वाले पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ऐसी ही शख्सियतों में से एक थे। पंडित दीनदयाल उपाध्याय अपने नाम के अनुरूप ऐसे युगपुरुष थे जिन्होंने व्यक्ति, परिवार,समाज, और देश को समग्र परिवेश में देखा, पंडित उपाध्याय जी के बाल्यकाल में ही माता पिता का साया उनके सिर से उठा गया था, फलत बचपन के उन सुहाने दिनों से वंचित हो गए ,जब खेलने और खाने की जगह उन्हें अभावों में जीना पड़ा,यही वजह थी, कि बचपन में ही कठिन परिस्थितियों से संघर्ष की और व्यावहारिक शिक्षा ग्रहण कर लेने के बाद जीवन में उन्होंने संघर्ष से कभी मुंह नहीं मोड़ा, एम ए उतरार्द्ध की परीक्षा नहीं दे सके, मामा जी के अनुरोध करने पर वे प्रशासनिक परीक्षा में बैठे, उत्तीर्ण हुए और साक्षात्कार में भी वे चुन लिए गए ।उनकी अध्ययनशीलता सार्वजनिक जीवन में जाने के पश्चात प्रखरतम होती चली गई ,कालांतर में पंडित दीनदयाल उपाध्याय का भारतीय राजनीति ने जो जीवन उभरा वह उनका श्रषि व्यक्तित्व था,वे ताउम्र अविवाहित रहे, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से वे राजनीतिक क्षेत्र में गए और भारतीय जन संघ के महामंत्री बने ,उनकी विलक्षण प्रतिभा को देखकर डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कहा था कि मुझे दो दीनदयाल जी मिल जाए तो मैं भारतीय राजनीति का मानचित्र बदल के रख दूंगा। भारतीय जनसंघ की स्थापना के दो वर्ष भी पूर्ण नहीं हो पाए थे काश्मीर आंदोलन के दौरान 23जून को डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी का बलिदान हो गया, आजाद भारत के नवगठित राजनीतिक दल का भार पूर्ण तौर पर 36 वर्षीय दीनदयाल उपाध्याय जी के कंधे पर आ गया,वे निरंतर17 सालों तक भारतीय जन संघ के महामंत्री रहे और 18 में बर्ष में जन संघ के अध्यक्ष बने लेकिन नियति ने उन्हें हमसे छीन लिया, दीनदयाल जी का व्यक्तित्व बहुआयामी था, वे सामान्य व्यक्ति,सक्रिय कार्यकर्ता कुशल संगठक, प्रभावी नेता एवं विचारक थे समाजशास्त्री, अर्थशास्त्री, राजनीति विज्ञानी एवं दार्शनिक एव अच्छे वक्ता थे। किसी भी विषय पर अच्छी प्रकार से अभ्यास और विभिन्न कोणों से उस पर विचार व्यक्त करने के उपरांत ही अपना कोई मत व्यक्त करते थे ,उनके बहुआयामी व्यक्तित्व की झलक कुछ उदाहरणों से पता चलती है, राष्ट्र, राष्ट्रीयता और भारतीय संस्कृति पर दीन दयाल जी के विचारों से यह स्पष्ट हो जाता है। उनका चिंतन आज भी प्रासंगिक है राष्ट्र एक स्थाई सच है,राष्ट्र की आवश्यकता को पूर्ण करने के लिए राज्य पैदा होता है, राष्ट्र का संगठन के निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए उत्पन्न नहीं होता है ,एक राष्ट्र भाव की विस्मृति के कारण घटक शिथिल पड़ते हैं और यदि पूरी तरह निष्क्रिय हो गए, तो संपूर्ण राष्ट्र के विनाश का कारण भी बनते हैं, अतः हमें कालजेय स्थाई सक्षम, आत्मनिर्भर व्यवहारिकता और स्वाभाविक संगठन के लिए राष्ट्र को आधार मानना होगा, राष्ट्र का संगठन दृढ़ हुआ तो सामर्थ निर्माण होगा और विभिन्न अंग पुष्ट हो सकेंगे ,राष्ट्र को परम वैभव की ओर ले जाने के लिए धर्म का संरक्षण करते हुए आना चाहिए, यह संघटित कार्प शक्ति एवं पुरुषार्थ से ही प्राप्त हो सकता है, पंडित दीनदयाल उपाध्याय का मानना था कि भारतीय संस्कृति की विशेषता यह है कि वह संपूर्ण जीवन और संपूर्ण सृष्टि का विचार करती है। उसका दृष्टिकोण एकात्मक वादी है। टुकड़ों में विचार करना विशेषज्ञ की दृष्टि से उचित हो सकता है लेकिन व्यवहारिक दृष्टि से यह कतई उपयुक्त नहीं है पश्चिम की समस्या का मुख्य कारण उसका जीवन के संबंध में सतही ढंग से विचार करना है। दीनदयाल जी का मानना था कि स्वराज प्राप्त करते ही हम स्व की भावना विस्मित कर बैठे तथा विदेशी विचारधारा हमारे आकर्षण और अनुकरण का केंद्र बन गई। आज आवश्यकता है कि अपने स्व का परिचय किया जाए, बिना उसके स्वराज का कोई अर्थ नहीं है स्वतंत्रता हमारे विकास और सुख का साधन मात्र नहीं बन सकती जब तक हमें अपनी हकीकत का पता नहीं तब तक हमें अपनी शक्तियों का ज्ञान नहीं हो सकता और ना ही उसका विकास ही संभव है,हम स्वर की भावना किस मत कर बैठे हैं विदेशी विचारधारा मारे आकर्षण और अनुकरण का केंद्र बन गई आज आवश्यकता है कि अपने स्व का परिचय किया जाये कर विनाश के स्वराज का कोई अर्थ नहीं है, स्वतंत्रता हमारे विकास और सुख का साधन नहीं बन सकती जब तक हमें अपनी हकीकत का पता नहीं तब तक हमें अपनी शक्ति का ज्ञान नहीं हो सकता और नहीं उसका विकास ही संभव है, पंडित दीनदयाल जी ने राष्ट्र को परम वैभव पर ले जाने योग्य छोटे-छोटे आयामों का चिंतन करते हुए एकात्मक मानव बाद के माध्यम से जो दिशानिर्देश किया है वह अन्य सभी बातों से उठकर किसी भी राष्ट्र के लिए प्रेरणा स्रोत है इसमें किसी भी प्रकार की संकुचित प्रवृत्ति का आभास भी नहीं होता ,राष्ट्र का प्रत्येक व्यक्ति इस एकात्मक मानव बाद को भलीभांति समझ कर स्वयं के विकास और समाज के विकास के साथ ही संपूर्ण राष्ट्र को सर्वोच्च पर ले जाने में समर्थ होगा, पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी राष्ट्र निर्माण के कुशल शिल्पिओं में से एक रहे हैं व्यक्तिगत जीवन तथा राजनीति में भी सिद्धांत और व्यवहार में समानता रखने वाली इस शख्सियत को तमाम सारे विरोधियों का सामना करना पड़ा किंतु राष्ट्रभक्ति जिनका मकसद हो ऐसे महापुरुष को भला कौन उसके लक्ष्य से डिगा सकता था,आज जरूरत इस बात की है कि उनके विचारों को दीप स्तंभ बनाकर आगे बढ़ा जाए और भारत को सबल राष्ट्र बनाने के लिए उनकी प्रखर मेधा और अनुभवों का लाभ उठाया जाए। हमारा भारत देश त्यागी तपस्वियों के प्रति सहज श्रद्वा रखने वालों का देश है तत्कालीक लोकप्रियता पाएं लोग क्षणिक चकाचौंध भले ही उत्पन्न कर ले मगर उनकी यश कीर्ति दीर्घकाल तक जन मन गगन में नहीं रह सकती हमारे मुल्क में तो लोकहित में स्वयं की आहुति देने वाली शख्सियतों की पूजा होती है दलगत छाप की छाया में उनका आभामंडल छिपता नहीं है। दीनदयाल उपाध्याय का व्यक्तित्व जितना विराट था,वे उतने ही दूरदर्शी राजनेता भी थे ।उन्होंने पांच दशक पहले ही अपने मुल्क के लिए आत्मनिर्भरता की अपरिहार्यता की परिकल्पना की थी। दीनदयाल उपाध्याय समाज सेवक और राजनेता के साथ विचारक, लेखक और पत्रकार भी थे। आजादी से पहले उन्होंने लखनऊ से प्रकाशित मासिक पत्रिका राष्ट्र धर्म का संपादन किया। बाद में पांचजन्य के संपादक भी रहे। इतना ही काफी नहीं। इसके साथ ही उनहोंने सनातन धर्म की पताका को सशक्त करने वाले वे जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने मगर वे इस पद पर सिर्फ 43 दिन ही रहे, 51वर्ष की आयु में 11 फरवरी 1968को मुगलसराय रेलवे स्टेशन के निकट उनका निधन हो गया। लेकिन यह कहने में कोई हर्ज नहीं है कि पंडित दीनदयाल जी उनके विचार उनके सिद्धांत कल भी प्रासंगिक थे, आज भी हैं तथा हमेशा प्रासंगिक रहेंगे। पंडित दीनदयाल उपाध्याय समूचे विश्व के लिए अब भी उतने ही प्रासंगिक है जितने जीते जीते थे।स्मरण रखना होगा कि पंडित दीनदयाल के एकात्म मानववाद के दायरे को सिर्फ एक मुल्क विशेष की भौगोलिक सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता है। ईएमएस/10/02/2026