लेख
10-Feb-2026
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संसद का बजट सत्र देश की आर्थिक दिशा तय करने का सबसे महत्वपूर्ण मंच होता है, लेकिन जब यही मंच हंगामे, नारेबाजी और रणनीतिक अवरोध का अखाड़ा बन जाए, तो सवाल सिर्फ कार्यवाही के ठप होने का नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जिम्मेदारी के क्षरण का भी उठता है। हालिया घटनाक्रम में लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस, प्रश्नकाल का बार-बार स्थगन और विपक्ष का निरंतर विरोध, इसी चिंता को गहरा करता है। इस पूरे परिदृश्य में कांग्रेस की भूमिका पर गंभीर आत्ममंथन की जरूरत है। लोकसभा में विपक्ष का अधिकार बहस करना, सवाल उठाना और सरकार को जवाबदेह ठहराना है। यह अधिकार संविधान और संसदीय परंपराओं से सुरक्षित है। लेकिन जब यह अधिकार सदन को चलने ही न देने की जिद में बदल जाए, तो वह लोकतंत्र की मजबूती के बजाय उसकी कमजोरी का संकेत बन जाता है। बजट सत्र के लगातार दिनों तक बाधित रहने से आम जनता के मुद्दे, आर्थिक नीतियों पर चर्चा और विकास से जुड़े सवाल पीछे छूट जाते हैं। कांग्रेस, जो स्वयं को लोकतंत्र की प्रहरी बताती है, यदि उसी लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बाधित करती दिखे, तो उसकी विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है। लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाना कोई असाधारण बात नहीं है। संसदीय इतिहास में यह प्रक्रिया पहले भी अपनाई गई है। लेकिन इस कदम का औचित्य तभी बनता है, जब यह संसदीय मर्यादा और ठोस तर्कों के साथ उठाया जाए। मौजूदा मामले में विपक्ष का आरोप है कि स्पीकर पक्षपातपूर्ण रवैया अपना रहे हैं और विपक्षी नेताओं को बोलने नहीं दिया जा रहा। यदि यह सच है, तो इसका समाधान भी संसदीय संवाद और नियमों के तहत होना चाहिए। सदन के भीतर नारेबाजी, वेल में आकर हंगामा और बार-बार कार्यवाही ठप कराना, किसी भी तरह से समाधान नहीं है। कांग्रेस का रवैया यहां विरोध से अधिक टकराव का नजर आता है। राहुल गांधी को बोलने देने की मांग को लेकर पूरा सत्र बाधित करना, जबकि देश की आर्थिक नीतियों पर चर्चा लंबित हो, यह दर्शाता है कि पार्टी प्राथमिकताओं को लेकर भ्रमित है। लोकतंत्र में व्यक्ति से बड़ा संस्थान होता है। संसद किसी एक नेता का मंच नहीं, बल्कि 140 करोड़ नागरिकों की आवाज का प्रतिनिधि सदन है। यदि किसी नेता को बोलने में आपत्ति है, तो उसके लिए नियम, अध्यक्ष और संसदीय समितियां मौजूद हैं। सत्र को ही ठप कर देना, लोकतांत्रिक दबाव नहीं, बल्कि राजनीतिक हठधर्मिता है। कांग्रेस का इतिहास बताता है कि जब वह सत्ता में रही, तब विपक्ष की आवाज को दबाने के आरोप उस पर भी लगे। ऐसे में आज नैतिक ऊंचाई का दावा करना, बिना आत्मालोचना के, खोखला लगता है। संसदीय परंपराएं दोतरफा जिम्मेदारी मांगती हैं। सरकार को विपक्ष की बात सुननी चाहिए, लेकिन विपक्ष का भी कर्तव्य है कि वह सदन की गरिमा बनाए रखे। हाथ जोड़कर बजट पर चर्चा की अपील करना किसी मंत्री की कमजोरी नहीं, बल्कि संसदीय परंपरा को बचाने का प्रयास है। इसके बावजूद हंगामा जारी रहना, कांग्रेस की नकारात्मक राजनीति को उजागर करता है। स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव को लेकर भी कांग्रेस की रणनीति अस्पष्ट दिखती है। एक ओर प्रस्ताव का नोटिस दिया जाता है, दूसरी ओर प्रमुख नेता खुद उस पर हस्ताक्षर नहीं करते। यह दोहरा संदेश पार्टी की आंतरिक असमंजस को दर्शाता है। यदि स्पीकर सचमुच पक्षपात कर रहे हैं, तो पार्टी को एकजुट और स्पष्ट रुख अपनाना चाहिए था। लेकिन यहां यह कदम अधिक प्रतीकात्मक विरोध जैसा प्रतीत होता है, जिसका उद्देश्य समाधान नहीं, बल्कि राजनीतिक दबाव बनाना है। संसद में महिला सांसदों के साथ हुई घटनाओं, बैनर और पोस्टर की राजनीति, और पुस्तक विवाद जैसे मुद्दों को जिस तरह तूल दिया गया, उसने मूल प्रश्नों को हाशिए पर धकेल दिया। देश महंगाई, रोजगार, वैश्विक व्यापार और सुरक्षा जैसे मुद्दों पर स्पष्ट बहस चाहता है। लेकिन कांग्रेस का फोकस बार-बार ऐसे विवादों पर रहा, जिनसे सदन का समय नष्ट हुआ। यह रवैया न तो विपक्ष की परिपक्वता दिखाता है और न ही लोकतंत्र के प्रति प्रतिबद्धता। लोकतंत्र में विरोध जरूरी है, लेकिन रचनात्मक विरोध उससे भी अधिक जरूरी है। कांग्रेस यदि सचमुच जनता की आवाज बनना चाहती है, तो उसे सड़क की राजनीति को संसद के भीतर दोहराने से बचना होगा। संसद संवाद का मंच है, संघर्ष का नहीं। यहां तर्क, तथ्य और नीति से सरकार को घेरा जाता है, न कि शोर और अवरोध से। हर बार सदन ठप कर देना आसान रास्ता हो सकता है, लेकिन इससे न तो जनता का भरोसा बढ़ता है और न ही लोकतांत्रिक संस्थाएं मजबूत होती हैं। अंततः सवाल यह नहीं है कि कौन जीता या हारा, बल्कि यह है कि संसद चली या नहीं। बजट सत्र का समय अमूल्य होता है। इसे बाधित कर कांग्रेस ने न सिर्फ सरकार को, बल्कि देश को नुकसान पहुंचाया है। लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका सत्ता को असहज करना नहीं, बल्कि उसे जवाबदेह बनाना है। इसके लिए सदन का चलना अनिवार्य है। यदि कांग्रेस इस मूल सिद्धांत को नहीं समझती, तो उसका विरोध लोकतांत्रिक नहीं, बल्कि अवरोधकारी राजनीति के रूप में ही देखा जाएगा। (L 103 जलवन्त टाऊनशिप पूणा बॉम्बे मार्केट रोड, नियर नन्दालय हवेली सूरत मो -99749 40324 वरिष्ठ पत्रकार साहित्ययकार स्तम्भकार) (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) ईएमएस / 10 फरवरी 26