आज की जीवनशैली भागम-भाग भरी है। मनुष्य हर कहीं तनाव और अवसाद की बेड़ियों में बंधा नज़र आता है। उसके पास न स्वयं के लिए समय बचा है और न ही परिवार व दूसरों के लिए। पदार्थ में वह रम-बस सा गया है।ऐसे में संगीत मनुष्य के जीवन में एक सकारात्मक भूमिका निभा सकता है। वैसे भी सदियों सदियों से मनुष्य के जीवन में संगीत का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रहा है। संगीत और मनुष्य का संबंध उतना ही प्राचीन है जितनी स्वयं मानव सभ्यता। जब शब्दों का जन्म भी पूरी तरह नहीं हुआ था, तब मनुष्य ने ध्वनियों, लयों और सुरों के माध्यम से अपनी भावनाओं को व्यक्त करना शुरू कर दिया था। पत्थरों की टकराहट, पत्तों की सरसराहट और पानी की कल-कल जैसी प्राकृतिक ध्वनियाँ ही संगीत के प्रारंभिक रूप थे, जिन्होंने मानव मन में संवेदना और अभिव्यक्ति का भाव जगाया। संगीत में एक अद्भुत शक्ति और जादू है। यह सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर होता है और सीधे मन को स्पर्श करता है। मधुर संगीत उस लय से जुड़ा होता है जो इस संपूर्ण सृष्टि में व्याप्त है और हमारे भीतर भी निरंतर गूंजती रहती है। यही कारण है कि संगीत मन के तनाव, चिंता और अवसाद को दूर करता है, मन को सुकून देता है और मानसिक बोझ को हल्का कर देता है। मानसिक और भावनात्मक स्तर पर संगीत का प्रभाव अत्यंत गहरा होता है। यह कभी हँसाता है, कभी रुलाता है और कभी बिना कुछ कहे बहुत कुछ कह जाता है। जब शब्द असहाय हो जाते हैं, तब संगीत भावनाओं की भाषा बन जाता है। दुख में यह सहारा देता है, खुशी में आनंद को कई गुना बढ़ा देता है और अकेलेपन में एक अनकहा साथी बन जाता है। संगीत केवल मन को ही नहीं, बल्कि शरीर को भी लाभ पहुँचाता है। विशेषज्ञों और चिकित्सकों के अनुसार मधुर और शांत संगीत रक्तचाप को नियंत्रित करने, हृदय को स्वस्थ रखने और अनिद्रा की समस्या को कम करने में सहायक होता है। यही कारण है कि ध्यान, योग और चिकित्सा पद्धतियों में भी संगीत का उपयोग किया जाता है। लोरी सुनकर बच्चे का सो जाना और भजन-संगीत से बुजुर्गों का मन हल्का हो जाना इसके सरल और प्रभावशाली उदाहरण हैं। दैनिक जीवन में संगीत एक प्रकार की थैरेपी का काम करता है। काम से फ्री होकर प्रतिदिन दस–पंद्रह मिनट आंख मूंदकर सुरीले गीत सुनना मन को शांति और ताजगी देता है। पुराने गीत हमें अतीत की मधुर स्मृतियों में ले जाते हैं और भावनात्मक सुकून प्रदान करते हैं। पढ़ाई या काम के दौरान हल्का संगीत एकाग्रता बढ़ाने में सहायक होता है और मस्तिष्क को सक्रिय रखकर स्मरण शक्ति को मजबूत करता है। संगीत का सामाजिक जीवन पर भी गहरा प्रभाव पड़ता है। लोकगीत, पर्व-त्योहारों के गीत और सामूहिक नृत्य समाज में एकता और अपनापन पैदा करते हैं। अलग-अलग भाषाएँ, संस्कृतियाँ और देश होने के बावजूद संगीत सभी को एक सूत्र में बाँध देता है, क्योंकि इसकी भाषा सार्वभौमिक है। संगीत लोगों को जोड़ता है और सामूहिकता की भावना को मजबूत करता है। व्यक्तिगत स्तर पर भी संगीत आत्म-अभिव्यक्ति और आत्मविश्वास को बढ़ाता है। गायन और वादन से व्यक्ति अपने भीतर की भावनाओं को व्यक्त करता है और सकारात्मक सोच विकसित करता है। युवाओं के लिए संगीत ऊर्जा और उत्साह का माध्यम है, जबकि अपने श्रेष्ठतम रूप में वही संगीत श्रेष्ठ होता है जिसमें माधुर्य, सुकून, तल्लीनता और भावनात्मक लगाव हो। संक्षेप में, संगीत मनुष्य के जीवन का केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि उसकी आत्मा का भोजन है। यह जीवन को तनावमुक्त, संतुलित और आनंदमय बनाता है तथा मनुष्य के भीतर छिपी संवेदनाओं को स्वर देकर जीवन को अधिक मानवीय और सुंदर बना देता है। (सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार, पिथौरागढ़, उत्तराखंड।) ईएमएस / 10 फरवरी 26