लेख
10-Feb-2026
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गौतम बुद्ध ने कहा-’ बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय।’ उन्होंने ‘ सर्वजन हिताय, सर्वजन सुखाय’ नहीं कहा। बुद्ध महाकरूणा के सागर थे, तब भी उन्होंने बहुजन के सुख की कामना की, सर्वजन की नहीं। सवाल है कि क्या बुद्ध के मन में संदेह था कि इस दुनिया के तमाम लोगों को सुखी नहीं किया जा सकता? सवाल यह भी है कि बहुजन के अलावे जो बच जाते हैं, वे अनिवार्य रूप से शोषक ही थे या इतने बिगड़े हुए थे कि उनमें बदलाव की संभावना ना के बराबर थी? उपनिषद में लिखा है -’ वसुधैव कुटुंबकम्।’ वसुधा पर रहने वाले तमाम लोग कुटुंब हैं। उपनिषद में यह घोषणा इसलिए करनी पड़ी, क्योंकि उपनिषद - काल में भी वसुधा पर रहने वाले तमाम लोग कुटुंब नहीं थे। इतने वर्षों बाद भी दुनिया की बात तो छोड़िए, क्या भारतवर्ष में ही सभी कुटुंब हो सके? उपनिषद सर्वजन की बात करता है, लेकिन उपनिषद जिस समाज में विकसित हुआ, वह खंडों में बंटा है। खंडों में जी रहा मनुष्य अपने अपने खंड में चिपका हुआ है और उसे ही दुनिया मान बैठा है। आज देश में न बहुजन खुश है, न सर्वजन। मनुष्य की चालाकी या धूर्तता कहिए कि जिसने भी आधुनिक युग में बहुजन की एकता या उसकी खुशी चाही, उसे भी खंडों में बांट दिया। आजादी के 78 वर्षों बाद जाति संगठन का उफान है। यों आजादी की लड़ाई के समय भी जाति संगठन थे, लेकिन उन संगठनों में जाति कल्याण की थोड़ी भावना थी। कोई शिक्षा संस्थान खोल रहा था तो कोई जाति के अंदर सामाजिक सुधार कर रहा था। तीन जातियों का गठजोड़ त्रिवेणी संघ भी बना। आजादी के बाद जाति संगठन बनाने की होड़ लग गई। भूमिहार, ब्राह्मण, राजपूत, कायस्थ, यादव, कुर्मी, कुशवाहा से लेकर एस सी में शामिल जातियों के भी संगठन बने। यहां तक कि उप जातियों के भी संगठन बनाये गये। संगठन बनाते हुए जाति नेताओं का दावा यह रहा कि उनकी जाति की उपेक्षा हुई है। राजनीति में वाजिब भागीदारी नहीं मिली है, इसलिए जाति गोलबंदी करनी चाहिए। ऐसे संगठनों का उद्देश्य सीमित था, इसलिए जिनके मन में जाति इस्तेमाल कर नेता बनने की इच्छा हुई, उसने जाति की सभा और महासभा बनायी। नतीजा है कि जाति संगठनों की भरमार है। ज्यादातर जाति संगठनों के पास लिखित नीति या उद्देश्य नहीं है। यदा कदा जाति - भोज होता है, जाति का कोई नेता जीत गया तो उसे माल्यार्पण होता है या फिर जाति का कोई खेल, अफसरी , डिग्री आदि में अच्छा करता है तो उसका स्वागत समारोह होता है। अपने जाति के नेता के साथ फोटो खींचा कर फेसबुक पर डालना उसका कर्तव्य होता है। इसके पीछे लोगों का आर्थिक और राजनैतिक स्वार्थ सक्रिय होता है। सीमित अर्थ में इन जाति संगठनों की एक उपयोगी भूमिका हो सकती है। अगर वह अपनी ही जाति के निर्धनों को जमीन दे दे या जाति के अंदर दहेज प्रथा रोक दे या जाति के अंदर की सामाजिक बुराइयों को दूर करे या पढ़ाई-लिखाई में अपनी जाति के गरीबों को मदद करे। आज भीषण स्वार्थ से ग्रसित लोग लोकतंत्र और सामाजिक परिवर्तन के रास्ते में बाधा उत्पन्न कर रहे हैं। महात्मा बुद्ध से लेकर जगदेव प्रसाद तक बहुजन हिताय की बात करते रहे और आज उन्हें भी जाति में विभाजित कर उसकी परंपरा को भी नष्ट कर रहे हैं। हमें जाति विनाश के बारे में सोचना चाहिए, न कि उसकी जड़ में पानी और खाद देकर लहकाना चाहिए। लोकतंत्र लोगों का तंत्र है, वह जाति या संप्रदाय का तंत्र नहीं है। एक सौ वर्ष के हिन्दू संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अब तक के छह सर संघचालक में पांच ब्राह्मण और एक राजपूत हुए हैं। वर्षों बरस एक जातिवादी मानसिकता का आदमी सर संघचालक पद पर बैठा रहता है। उसने आज तक हिन्दू एकता तक की बात नहीं सोची। अगर सोचता तो जाति विनाश के बारे में भी सोचता। जाति रहते हुए हिन्दू एकता कैसे हो सकती है? जिस संगठन में कोई चुनाव नहीं होता, उस संगठन से निकला आदमी लोकतांत्रिक कैसे हो सकता है? (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 10 फरवरी /2026