माँ बाप की सेवा करना हरेक पुत्र का दायित्व है जो आपके यश को उज्जवल करती है गुरु गोबिंद सिंह जी के दो सबसे छोटे बेटे, साहिबजादा ज़ोरावर सिंह जी और साहिबजादा फतेह सिंह जी, जो दसवें सिख गुरु थे, उन्हें 26 दिसंबर, 1704 को सरहिंद (आज का फतेहगढ़ साहिब, पंजाब) में ज़बरदस्ती अपना धर्म छोड़ने से इनकार करने पर ज़िंदा दीवारों में चुनवा दिया गया और वे शहीद हो गए।वजीर खान ने धर्म परिवर्तन कराने की पुरी कोशिश की प्रलोभन दिया और यहाँ तक कहा की बड़े होने पर सुन्दर सुन्दर बेगम मिलेगी लेकिन जो माता पिता का संस्कार था वो डगमगाऐ नहीं मरना पसंद किया और शहीद हो गया अतः आज बच्चे माता पिता को इग्नोर क्यों करते हैं क्योंकि उन्हें लगता है मेरी बेगम या रानी बहुत सुन्दर है वो जो कहेजी वो ठीक होगा और रात्रि में सोने का एक अलग मजा होगा सच कटु होगा लेकिन आप डाकदल में बुरी तरह से फंसे हो और दुनिया में जिम्मेदारी नाम की भी चीज होती है और पत्नी प्रेम में रखना ठीक है लेकिन माता और पिता का सहारा बनना भी जरुरी है क्योंकि जब पालण पोषण पढ़ाया लिखाया तो वो भूल क्यों जाते हो सीखो श्रवण कुमार से नहीं तो आप गकत रास्ते की ओर चल पड़े और चाह कर भी आपस में टकराव देखने को मिलता है बच्चे को अपना देखना है चाहे आपका सर जले या पेट दर्द बिमारी से परेशान हो इतना पत्नी प्रेम में ना डुवो की वृद्धा आश्रम में डाल दो इसलिए आप अपने भविष्य को देख कर ही निर्णय लो हो सकता है भगवान राम जैसा वनवास मिले लेकिन आगे का भविष्य आपको हमेशा माता पिता की दुआ देगी संस्कार अच्छा होना चाहिए सीखो श्रवण कुमार से जो दुनिया से चला तो गया लेकिन इतिहास बना दिया आप बाल बलिदान दिवस तो मानते है लेकिन सीखते क्या है गुरु गोविन्द सिंह के दो मासूम बच्चे जब अपनी क़ुरबानी दि होगी तो इतने छोटे से बच्चे से नहीं सीखा आप पढ़कर भी अनपढ़ से भी कहीं ख़राब हो क्योंकि आपकी मानसिकता गलत तब होती है जब पत्नी प्रेम में डुबकी लगा कर आंनद से रहते हो और माता पिता को अकेले छोड़ कर पल्ला छुड़ाने की कोशिश करते हो पितृभक्त पुत्र श्रवण कुमार को याद करो जिसने अपने माता पिता को टोकड़ी में लेकर तीर्थ स्थान पर ले गए और गलती से पानी लाने के चक्कर में राजा दशरथ के हाथों शिकार हो गया लेकिन माता पिता का पुत्र के प्रति प्रेम इतना था की उन्होंने राजा दशरथ को ही श्राप दें दिया और उनके पुत्र भगवान राम को 14 वर्ष का वनवास मिला और उनके वियोग में उन्होंने भी वही पीड़ा सही और स्वर्गवास हो गया इस बात को भगवान राम भी जानते होंगे लेकिन राज़ सिंहासन छोड़ कर उनके वचन को निभाया राजा दसरथ उस समय यदि अपनी पत्नी कैकई के मायाजाल में ना फँसते तो शायद भगवान राम को वनवास ना मिलता और राज़तिलक होता लेकिन विधि का विधान कौन टाल सकता h हुआ ऐ की पितृभक्त पुत्र श्रवण कुमार एक जिन्हें आज भी मातृ-पितृभक्ति के लिए जाना जाता हैं। इतिहास में मातृभक्ति और पितृभक्ति के लिए श्रवण कुमार का नाम अमर हैं। हिन्दू धर्म ग्रंथ रामायण में श्रवण कुमार का उल्लेख है। सबसे खास बात यह है कि ये वही श्रवण कुमार हैं जिनके माता-पिता के श्राप के कारण राजा पुत्र वियोग में राजा दशरथ की मृत्यु हुई थी। श्रवण कुमार की कथा श्रवण कुमार की कथा फॉलो करें श्रवण कुमार के माता-पिता श्रवण अपने माता-पिता से अतुलनीय प्रेम करते थे। इनके माता-पिता नेत्रहीन थे इसलिए वो उनकी अत्यंत श्रद्धापूर्वक सेवा करते थे। श्रवण की मां ने उन्हें बहुत कष्ट उठाकर पाला था। श्रवण अपने माता-पिता के कामों में बहुत मदद करते थे। घर का सारा काम जैसे नदी से पानी भरकर लाना, जंगल से लकड़ियां लाना, चूल्हा जलाकर खाना बनाना आदि, श्रवण कुमार ही करते थे। माता-पिता का काम करने में वो जरा भी थकते नहीं थे बल्कि उन्हें आनंद मिलता था। माता-पिता उन्हें हमेशा आशीर्वाद देते रहते। माता-पिता की तीर्थयात्रा एक बार उनके अंधे माता-पिता ने इच्छा जताई की उनके बेटे ने उनकी सभी इच्छाएं पूरी की है बस एक इच्छा बाकी रह गई है। उन्होंने तीर्थयात्रा करने की इच्छा जताई। श्रवण कुमार ने माता-पिता की आज्ञा मानते हुए उन्हें प्राण रहते उनकी इच्छा पूरी करने का वचन दे दिया। कंधे पर कांवर लेकर और उसमें दोनों को बैठाकर वह तीर्थयात्रा करने निकल पड़े। श्रवण अपने माता-पिता को कई तीर्थ स्थानों जैसे गया, काशी, प्रयाग आदि लेकर गए और उन्हें तीर्थ के बारे में सारी बातें सुनाते रहे। ईश्वर कौन है? भगवद्गीता में किस प्रकार ईश्वर की व्याख्या की गई है? अयोध्या तीर्थ एक दिन श्रवण माता-पिता के साथ अयोध्या के समीप जंगल में पहुचे जहा रात्रि के समय वो विश्राम कर रहे थे। उनकी माता को प्यास लगने पर वो पास ही बहती नदी से पानी लेने चले गए। श्रवण कुमार पानी लेने के लिए अपना लोटा लेकर सरयू तट पर गए। उस समय अयोध्या के राजा दशरथ थे। राजा दशरथ को शिकार खेलने का बहुत शौक था। वे रात में भी जंगल में शिकार खेलने चले जाते थे क्यूंकि उन्हें शब्दभेदी बाण चलाने में महारथ हासिल थी। पावस ऋतु में सायंकाल वे धनुष-बाण लेकर सरयू के किनारे गये। उसी समय वह पर श्रवण अपने, माता - पिता के लिए जल भरने आए हुए थे। राजा दशरथ की भूल राजा रात के समय जल पीने के लिए आए किसी वन्य पशु का शिकार करना चाहते थे। अचानक पानी की कुछ आवाज सुनकर उन्हें लगा कि कोई वन्य पशु पानी पीने आया है जबकि श्रवण ने जल भरने के लिए कमंडल को पानी में डुबोया था। बर्तन में पानी भरने की अवाज सुनकर राजा दशरथ ने जानवर समझकर और सुनकर अचूक निशाना लगा दिया। आवाज के आधार पर उन्होंने तीर मारा जो श्रवण के सीने में जा लगा। श्रवण के मुंह से ‘आह’ निकल गई। राजा तीर चलाने के बाद सरयू तट पर शिकार को लेने गए तो उन्हें अपनी भूल का अहसास हुआ। उनसे अनजाने में अपराध हो गया। उन्होंने श्रवण से क्षमा मांगते हुए कहा -मुझे क्षमा करना भाई। ये अपराध मैंने अनजाने में कर दिया है। बताइए मैं आपके लिए क्या कर सकता हूं? एक ऐसा मंदिर जहां स्वयं माता सीता ने किया था अपने ससुर राजा दशरथ का पिंडदान श्रवण कुमार का दुःख जब राजा दशरथ को ने श्रवण से क्षमा मांगी तो श्रवण ने राजा को दुखी देख कहा- राजन मैं अपनी मृत्यु के लिए दुखी नहीं हूं किंतु अपने माता-पिता के लिए बहुत दुखी हूं। मैं अपने अंधे माता-पिता को तीर्थ यात्रा पूरी नहीं करवा पाऊंगा। आप उन्हें जल पिलाकर उनकी प्यास शांत करके उन्हें मेरी मृत्यु का समाचार सुना दें। श्रवण के माता- पिता का श्राप जब राजा दशरथ श्रवण के माता- पिता के पास पहुचे और उन्हें ये दुखद समाचार सुनाया तो वो दोनों विलाप करने लगे। बूढ़े माता-पिता ने राजा दशरथ को उनसे उनके बेटे को छीनने के अपराध में श्राप दे डाला। उन्होंने शाप दिया कि जा राजा तू भी हमारी ही तरह पुत्र वियोग में तड़प कर प्राण त्याग करेगा। इसी कारणवश राजा दशरथ को भी पुत्र वियोग सहना पड़ा था। रामचंद्र जी के चौदह साल के वनवास के वियोग को वो सह नहीं सकें और उन्होंने पुत्र वियोग में अपने प्राण त्याग दिए। पितृभक्त पुत्र श्रवण कुमार एक पौराणिक पात्र हैं जिन्हें आज भी मातृ-पितृभक्ति के लिए जाना जाता हैं। इतिहास में मातृभक्ति और पितृभक्ति के लिए श्रवण कुमार का नाम अमर हैं। हिन्दू धर्म ग्रंथ रामायण में श्रवण कुमार का उल्लेख है। सबसे खास बात यह है कि ये वही श्रवण कुमार हैं जिनके माता-पिता के श्राप के कारण राजा पुत्र वियोग में राजा दशरथ की मृत्यु हुई थी। श्रवण कुमार की कथा श्रवण कुमार की कथा फॉलो करें श्रवण कुमार के माता-पिता श्रवण अपने माता-पिता से अतुलनीय प्रेम करते थे। इनके माता-पिता नेत्रहीन थे इसलिए वो उनकी अत्यंत श्रद्धापूर्वक सेवा करते थे। श्रवण की मां ने उन्हें बहुत कष्ट उठाकर पाला था। श्रवण अपने माता-पिता के कामों में बहुत मदद करते थे। घर का सारा काम जैसे नदी से पानी भरकर लाना, जंगल से लकड़ियां लाना, चूल्हा जलाकर खाना बनाना आदि, श्रवण कुमार ही करते थे। माता-पिता का काम करने में वो जरा भी थकते नहीं थे बल्कि उन्हें आनंद मिलता था। माता-पिता उन्हें हमेशा आशीर्वाद देते रहते। माता-पिता की तीर्थयात्रा एक बार उनके अंधे माता-पिता ने इच्छा जताई की उनके बेटे ने उनकी सभी इच्छाएं पूरी की है बस एक इच्छा बाकी रह गई है। उन्होंने तीर्थयात्रा करने की इच्छा जताई। श्रवण कुमार ने माता-पिता की आज्ञा मानते हुए उन्हें प्राण रहते उनकी इच्छा पूरी करने का वचन दे दिया। कंधे पर कांवर लेकर और उसमें दोनों को बैठाकर वह तीर्थयात्रा करने निकल पड़े। श्रवण अपने माता-पिता को कई तीर्थ स्थानों जैसे गया, काशी, प्रयाग आदि लेकर गए और उन्हें तीर्थ के बारे में सारी बातें सुनाते रहे। ईश्वर कौन है? भगवद्गीता में किस प्रकार ईश्वर की व्याख्या की गई है? अयोध्या तीर्थ एक दिन श्रवण माता-पिता के साथ अयोध्या के समीप जंगल में पहुचे जहा रात्रि के समय वो विश्राम कर रहे थे। उनकी माता को प्यास लगने पर वो पास ही बहती नदी से पानी लेने चले गए। श्रवण कुमार पानी लेने के लिए अपना लोटा लेकर सरयू तट पर गए। उस समय अयोध्या के राजा दशरथ थे। राजा दशरथ को शिकार खेलने का बहुत शौक था। वे रात में भी जंगल में शिकार खेलने चले जाते थे क्यूंकि उन्हें शब्दभेदी बाण चलाने में महारथ हासिल थी। पावस ऋतु में सायंकाल वे धनुष-बाण लेकर सरयू के किनारे गये। उसी समय वह पर श्रवण अपने, माता - पिता के लिए जल भरने आए हुए थे। राजा दशरथ की भूल राजा रात के समय जल पीने के लिए आए किसी वन्य पशु का शिकार करना चाहते थे। अचानक पानी की कुछ आवाज सुनकर उन्हें लगा कि कोई वन्य पशु पानी पीने आया है जबकि श्रवण ने जल भरने के लिए कमंडल को पानी में डुबोया था। बर्तन में पानी भरने की अवाज सुनकर राजा दशरथ ने जानवर समझकर और सुनकर अचूक निशाना लगा दिया। आवाज के आधार पर उन्होंने तीर मारा जो श्रवण के सीने में जा लगा। श्रवण के मुंह से ‘आह’ निकल गई। राजा तीर चलाने के बाद सरयू तट पर शिकार को लेने गए तो उन्हें अपनी भूल का अहसास हुआ। उनसे अनजाने में अपराध हो गया। उन्होंने श्रवण से क्षमा मांगते हुए कहा -मुझे क्षमा करना भाई। ये अपराध मैंने अनजाने में कर दिया है। बताइए मैं आपके लिए क्या कर सकता हूं? एक ऐसा मंदिर जहां स्वयं माता सीता ने किया था अपने ससुर राजा दशरथ का पिंडदान श्रवण कुमार का दुःख जब राजा दशरथ को ने श्रवण से क्षमा मांगी तो श्रवण ने राजा को दुखी देख कहा- राजन मैं अपनी मृत्यु के लिए दुखी नहीं हूं किंतु अपने माता-पिता के लिए बहुत दुखी हूं। मैं अपने अंधे माता-पिता को तीर्थ यात्रा पूरी नहीं करवा पाऊंगा। आप उन्हें जल पिलाकर उनकी प्यास शांत करके उन्हें मेरी मृत्यु का समाचार सुना दें। श्रवण के माता- पिता का श्राप जब राजा दशरथ श्रवण के माता- पिता के पास पहुचे और उन्हें ये दुखद समाचार सुनाया तो वो दोनों विलाप करने लगे। बूढ़े माता-पिता ने राजा दशरथ को उनसे उनके बेटे को छीनने के अपराध में श्राप दे डाला। उन्होंने शाप दिया कि जा राजा तू भी हमारी ही तरह पुत्र वियोग में तड़प कर प्राण त्याग करेगा। इसी कारणवश राजा दशरथ को भी पुत्र वियोग सहना पड़ा था। रामचंद्र जी के चौदह साल के वनवास के वियोग को वो सह नहीं सकें और उन्होंने पुत्र वियोग में अपने प्राण त्याग दिए अतः अगर अपने माता पिता की सेवा करो यही आपका कर्तव्य हैं कुछ नहीं इस संसार से लेकर जाओगे सिर्फ इंसानियत ही काम आएगा और माता पिता की सेवा ही इंसान को पवित्र करती है। ईएमएस / 11 फरवरी 26