बांग्लादेश में अचानक जेन-ज़ी आंदोलन और हिंसा के बीच प्रधानमंत्री शेख हसीना अगस्त 2024 में सत्ता से हटते हुए भारत में शरण लेती हैं। इसके बाद प्रमुख सलाहकार यूनुस की अंतरिम सरकार सत्ता की बागडोर संभालती है और फिर अंतर्राष्ट्रीय संबंधों को तोड़ने-मरोड़ने का खेल शुरु हो जाता है। सबसे भरोसेमंद और हितैषी पड़ोसी मित्र देश को दूर करने और दुश्मनों को गले लगाने का काम भी होता है। इस दौरान न हिंसा रुकती है और न ही हालात बदलते हैं। इसी के साथ चुनाव की तारीख भी सामने आ जाती है। बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले आम चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का अवसर भर नहीं हैं, बल्कि वे देश की वैचारिक दिशा, लोकतांत्रिक विश्वसनीयता और पड़ोसी देशों खासकर भारत से रिश्तों की जमीन तय करने वाले निर्णायक मोड़ साबित होंगे। कुल 300 सीटों में से 299 सीटों पर मतदान और ‘जुलाई चार्टर’ पर जनमत संग्रह के साथ यह चुनाव कई स्तरों पर महत्वपूर्ण होने वाले है। बावजूद इसके जिस राजनीतिक माहौल में चुनाव कराए जा रहे हैं, उससे इसकी निष्पक्षता और पारदर्शिता पर पहले से ही गंभीर प्रश्न खड़े हो गए हैं। सबसे बड़ा सवाल अवामी लीग को चुनाव लड़ने की अनुमति न दिए जाने को लेकर है। पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के नेतृत्व वाली यह पार्टी बांग्लादेश की राजनीति की केंद्रीय धुरी रही है। ऐसे में उसका चुनावी मैदान से बाहर होना लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा की आत्मा को कमजोर करता है। अवामी लीग के वरिष्ठ नेता और पूर्व विदेश मंत्री हसन महमूद ने चुनाव को सुनियोजित बताते हुए निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि चुनावी प्रक्रिया को इस तरह से गढ़ा गया है कि एक विशेष विचारधारा को सत्ता में बनाए रखा जा सके। उन्होंने ऐसे चुनाव का बहिष्कार करने की अपील अंतरराष्ट्रीय समुदाय तक से कर डाली। यहां कहना गलत भी नहीं होगा कि यदि विपक्ष का एक बड़ा दल ही चुनावी प्रक्रिया से बाहर हो, तो लोकतंत्र की विश्वसनीयता स्वतः संदिग्ध हो जाती है। बहरहाल चुनाव हो रहे हैं ऐसे में जीत-हार के दावे भी सामने आ गए हैं। चुनावी मुकाबला मुख्यतः तारिक रहमान के नेतृत्व वाले बीएनपी गठबंधन और जमात-ए-इस्लामी व नेशनल सिटीजन पार्टी (एनसीपी) के 11 दलों के गठबंधन के बीच माना जा रहा है। अनुमानित वोट प्रतिशत बताता है, कि मुकाबला कांटे का है। 13 वर्षों के प्रतिबंध के बाद जमात-ए-इस्लामी का चुनावी मैदान में लौटना भी एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम है। 2008 के बाद पहली बार वह चुनाव लड़ रही है। खुद को मुख्यधारा की राजनीति में स्थापित करने के प्रयास में जमात ने इस बार एक हिंदू उम्मीदवार को टिकट दिया है, हालांकि किसी महिला को उम्मीदवार नहीं बनाए जाने को लेकर जमात सुर्खियां भी बटोर रही है। इस मामले में पार्टी का तर्क है कि महिलाओं की सुरक्षा एक बड़ा मुद्दा है, लेकिन यह तर्क समावेशी राजनीति की कसौटी पर अधूरा लगता है। बांग्लादेश के आम चुनाव का एक बड़ा आयाम विदेश नीति भी है। जमात-ए-इस्लामी के नेताओं ने संकेत दिए हैं कि वे सम्मान और मर्यादा के आधार पर विदेश संबंधों को पुनर्परिभाषित करना चाहते हैं। पिछले 16 वर्षों की विदेश नीति को एक देश अर्थात भारत केंद्रित बताकर उसकी आलोचना की जा रही है। तीस्ता जल बंटवारा, सीमा पर होने वाली घटनाएं और साझा नदियों के पानी का मुद्दा प्रमुख चुनावी विषय बन चुके हैं। यह स्पष्ट है कि बांग्लादेश में भारत के साथ संबंध अब निर्विवाद नहीं रहे। यदि नई सरकार भारत के प्रति अधिक कठोर रुख अपनाती है, तो द्विपक्षीय रिश्तों में तनाव और बढ़ सकता है। सुरक्षा कारण बताकर भारत द्वारा चुनाव के लिए पर्यवेक्षक न भेजना भी इन्हीं संकेतों की ओर इशारा करता है। यह या तो सतर्क दूरी का संकेत है या फिर आंतरिक परिस्थितियों को लेकर एक प्रकार की प्रतीक्षा की नीति। वैसे यहां यह नहीं भूलना चाहिए कि भारत के लिए बांग्लादेश केवल पड़ोसी देश ही नहीं है, बल्कि सामरिक, आर्थिक और सांस्कृतिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण साझेदार भी है। सीमा सुरक्षा, पूर्वोत्तर भारत की स्थिरता, आतंकवाद-रोधी सहयोग और क्षेत्रीय कनेक्टिविटी इन सभी पर ढाका की राजनीतिक दिशा का सीधा असर पड़ता है। चिंता का विषय यह भी है कि चुनावी विमर्श में वैचारिक ध्रुवीकरण बढ़ता दिख रहा है। यदि कट्टरपंथी ताकतें मजबूत होती हैं, तो अल्पसंख्यकों, विशेषकर हिंदू समुदाय की सुरक्षा और सामाजिक सौहार्द पर प्रश्नचिह्न लग सकते हैं। बांग्लादेश ने पिछले दशक में आर्थिक प्रगति और सामाजिक सूचकांकों में उल्लेखनीय सुधार दर्ज किया है। राजनीतिक अस्थिरता या वैचारिक टकराव इस उपलब्धि को कमजोर कर सकता है। ऐसे में यह चुनाव केवल सरकार चुनने की प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह बांग्लादेश के लोकतांत्रिक चरित्र, धर्मनिरपेक्ष मूल्यों और क्षेत्रीय संतुलन की परीक्षा है। नई सरकार यह तय करेगी कि देश सहयोग और संवाद की राह पर चलेगा या टकराव और अविश्वास की ओर मुड़ेगा। भारत और बांग्लादेश के संबंध इतिहास, भूगोल और साझा संघर्षों से जुड़े हैं। उम्मीद यही की जानी चाहिए कि ढाका में जो भी सत्ता में आए, वह राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए क्षेत्रीय शांति और सहयोग को प्राथमिकता देगा। क्योंकि अंततः स्थिर, समावेशी और संतुलित बांग्लादेश ही पूरे दक्षिण एशिया के हित में है। .../ 11 फरवरी /2026