लेख
10-Feb-2026
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आधुनिक मूल्यों ने जहाँ एक ओर वास्तविक उपलब्धियाँ दी हैं, वहीं पारंपरिक नैतिक अवधारणाओं को गंभीर क्षति भी पहुँचाई है, इस तथ्य से इनकार नहीं किया जा सकता। आधुनिकता के आलोचक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाते हैं, लेकिन वे अक्सर उन ऐतिहासिक परिस्थितियों को नज़रअंदाज़ कर देते हैं जिनसे आधुनिक मूल्य उत्पन्न हुए। आधुनिकता से पूर्व यूरोप या समग्र रूप से विश्व का जीवन प्रायः कठोर, पदानुक्रमित और अनेक मामलों में अमानवीय था। व्यक्ति का कल्याण अक्सर सामाजिक संस्थाओं के अधीन पूरी तरह दबा दिया जाता था, यहाँ तक कि कई बार व्यक्तिगत गरिमा स्वयं पाप के समान मानी जाती थी। कृषिदासता (दासप्रथा) इस बात का स्पष्ट उदाहरण है कि किस प्रकार व्यक्ति का दमन क्रूर सीमाओं तक पहुँच सकता था। सभी मनुष्यों को मनुष्य नहीं माना जाता था; बहुसंख्यक लोगों के साथ पशुओं या संपत्ति (चैटल) जैसा व्यवहार किया जाता था। ऐसे बाज़ार थे जहाँ मनुष्यों को गाय, भैंस या घोड़े की तरह खरीदा-बेचा जाता था, और इस पर धर्म मौन बना रहा, जो मानव इतिहास के तर्क में एक वास्तविक पाप था। आधुनिकता की ओर संक्रमण (विशेषकर औद्योगिकीकरण के माध्यम से) ने केवल व्यक्तियों को मुक्त ही नहीं किया, बल्कि दीर्घकाल से चले आ रहे सामाजिक बंधनों और सुरक्षा के रूपों को भी नष्ट कर दिया। इस टूटन ने अस्थिरता और अराजकता को जन्म दिया, जिसे उस समय जिस रूप में धर्म संस्थागत था, वह न तो संभाल सका और न ही उसका कोई अर्थपूर्ण विकल्प दे सका। जैसे-जैसे आधुनिक आर्थिक शक्तियाँ उभरीं, औद्योगिक उत्पादन से जुड़ी बाज़ार-आधारित अर्थव्यवस्थाएँ, धार्मिक संस्थाएँ इन नई प्रणालियों के साथ गहराई से उलझती चली गईं। भविष्यवाणी-सदृश नैतिक आलोचना प्रस्तुत करने के बजाय, चर्च ने एक ओर मध्ययुगीन सामाजिक सत्ता संरचनाओं को बचाए रखने का प्रयास किया और दूसरी ओर आधुनिक आर्थिक विस्तार में भागीदारी भी की। इस अंतर्विरोध ने उसकी नैतिक विश्वसनीयता को कमजोर कर दिया। ऐतिहासिक उदाहरण इस विफलता को स्पष्ट करते हैं। स्पेनिश और पुर्तगाली औपनिवेशिक साम्राज्यों के साथ चर्च की संलिप्तता तथा प्रारंभिक आधुनिक यूरोप में सोने-चाँदी की भारी आमद ने मुद्रास्फीति और खाद्य कीमतों में वृद्धि को बढ़ावा दिया। फिर भी, चर्च ने इस आर्थिक अव्यवस्था में राज्य की भूमिका को चुनौती देने में प्रायः असफलता दिखाई और इसके बजाय राजनीतिक सत्ता के साथ संरेखित होता चला गया। परिणामस्वरूप, लोगों ने संस्थागत धर्म को शक्ति के प्रति नैतिक प्रतिरोध के रूप में नहीं, बल्कि उसी वर्चस्वकारी व्यवस्था के हिस्से के रूप में देखना शुरू किया, जिससे संदेह, प्रतिरोध और सुधार की प्रवृत्तियाँ उभरीं। मैं इस बात से सहमत हूँ कि आधुनिकता में अक्सर वास्तविक आत्मालोचना का अभाव होता है। किंतु समाधान किसी सरल रूप में पूर्व-आधुनिक संरचनाओं की ओर लौटना नहीं हो सकता। नैतिक मूल्यांकन को सार्वभौमिक मानवीय मूल्यों में निहित होना चाहिए, ऐतिहासिक अनुभव से सीख लेनी चाहिए और परिवर्तन के लिए खुला रहना चाहिए। मेरा मानना है कि हम एक और परिवर्तन के मुहाने पर खड़े हैं, जो आधुनिक मूल्यों के संकट और तीव्र आर्थिक पीड़ा से प्रेरित है। यह परिवर्तन व्यक्ति की स्वायत्तता और सामाजिक एकता के क्षरण से चिह्नित है, इस हद तक कि सामाजिक प्रक्रियाएँ और मानवीय जीवन स्वयं कैंसरग्रस्त और मेटास्टेटिक प्रतीत होने लगे हैं। ऐसा लगता है कि नैतिकता का अभाव सभी बुराइयों का कारण है; किंतु नैतिकता कोई ऐसी चीज़ नहीं है जिसे कोई व्यक्ति मात्र चुन ले। यह एक ऐसा गुण है जो जीए हुए अनुभवों और व्यक्ति की उस क्षमता के जटिल अंतःक्रिया से गढ़ा जाता है, जिसके द्वारा वह अत्यधिक पीड़ा को सहन कर सके। किसी भी गंभीर नैतिक पुनर्जागरण को इस जटिलता से जूझना होगा, न कि इतिहास को केवल पतन की कथा तक सीमित करना होगा। कोई व्यक्ति केवल इच्छा करने मात्र से नैतिक नहीं बन सकता। ईएमएस/10/02/2026