फरवरी-मार्च का नाम आते ही घरों का माहौल बदलने लगता है। वही कमरे, वही मेज, वही किताबें, लेकिन हवा में एक अनकहा तनाव घुल जाता है। रात भर जलती लाइटें, कॉफी या चाय के कप, आंखों में नींद और मन में आशंका यह दृश्य आज असामान्य नहीं रहा। परीक्षा अब केवल ज्ञान की परख नहीं रह गई है, वह बच्चों के मन के लिए एक कसौटी बन चुकी है। जैसे ही तारीखें नजदीक आती हैं, कई बच्चों के पैरों में कंपन, दिल की धड़कन तेज होना और अगर अच्छा नहीं हुआ तो?जैसे सवाल मन पर हावी हो जाते हैं। डर धीरे-धीरे आत्मविश्वास को ढक लेता है और पढ़ा हुआ ज्ञान भी धुंधला पड़ने लगता है। असल समस्या परीक्षा नहीं है, समस्या वह माहौल है जो परीक्षा के इर्द-गिर्द खड़ा कर दिया गया है। जब परीक्षा को जीवन-मरण का सवाल बना दिया जाता है, तब बच्चा सवाल हल करने से ज्यादा अपने भविष्य को लेकर डरने लगता है। माता-पिता की उम्मीदें, समाज की तुलना और स्कूल का अंक-केंद्रित ढांचा मिलकर बच्चों के कंधों पर ऐसा बोझ रख देते हैं, जिसे उठाना हर किसी के बस की बात नहीं होती। परिणाम यह होता है कि परीक्षा ज्ञान का उत्सव बनने के बजाय भय का कारण बन जाती है। मनोरोग विशेषज्ञ और शिक्षा मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि अत्यधिक दबाव में शरीर में तनाव हार्मोन बढ़ जाते हैं। इससे नींद प्रभावित होती है, भूख कम हो जाती है और ध्यान भटकने लगता है। बच्चा जितना ज्यादा डरता है, उतना ही उसका प्रदर्शन गिरने की आशंका बढ़ती जाती है। यह एक दुष्चक्र है।डर से प्रदर्शन कमजोर, और कमजोर प्रदर्शन से डर और गहरा। ऐसे में सबसे जरूरी सवाल यह है कि इस डर को कैसे तोड़ा जाए। डर तोड़ने की शुरुआत सोच बदलने से होती है। बच्चे को यह महसूस कराना जरूरी है कि परीक्षा उसकी काबिलियत का एक पड़ाव है, पूरी पहचान नहीं। जब बच्चा यह समझ लेता है कि एक पेपर उसका भविष्य तय नहीं करता, तब उसके भीतर छुपा आत्मविश्वास धीरे-धीरे बाहर आने लगता है। पढ़ाई का मकसद नंबर जुटाना नहीं, समझ विकसित करना है।यह बात अगर घर और स्कूल दोनों जगह दोहराई जाए, तो आधा डर अपने आप कम हो जाता है। बच्चों के लिए सबसे पहला और असरदार उपाय है दिनचर्या को संतुलित करना। लगातार घंटों पढ़ने से दिमाग थक जाता है और डर बढ़ता है। छोटे-छोटे अंतराल में पढ़ाई करने से न सिर्फ याददाश्त बेहतर होती है, बल्कि मन भी हल्का रहता है। पर्याप्त नींद लेना कोई विलास नहीं, बल्कि जरूरत है। सात से आठ घंटे की नींद दिमाग को तरोताजा रखती है और परीक्षा के समय घबराहट कम करती है। हल्की शारीरिक गतिविधि जैसे टहलना, स्ट्रेचिंग या योग, शरीर में सकारात्मक रसायन छोड़ती है जो तनाव को काबू में रखते हैं। डर अक्सर अनिश्चितता से पैदा होता है। अगर सवाल नहीं आया तो?, अगर भूल गया तो? जैसे विचार मन को जकड़ लेते हैं। ऐसे में बच्चों को यह सिखाना जरूरी है कि वे अपने डर को नाम दें और उससे बात करें। जब डर को मन में दबाने के बजाय स्वीकार किया जाता है, तो उसकी तीव्रता कम होने लगती है। गहरी सांस लेने की सरल तकनीकें, परीक्षा से पहले कुछ मिनट आंखें बंद कर खुद को शांत करना, मन को वर्तमान में लाने में मदद करता है। अभिभावकों की भूमिका यहां निर्णायक हो जाती है। बच्चे जितना परीक्षा से डरते हैं, उतना ही वे माता-पिता की प्रतिक्रिया से भी डरते हैं। अगर हर बातचीत का अंत अंकों पर हो, तो बच्चा खुद को मशीन समझने लगता है। तुलना बच्चों का आत्मविश्वास सबसे तेजी से तोड़ती है। जब किसी और के बच्चे की सफलता को आदर्श बनाकर पेश किया जाता है, तो संदेश साफ होता है।तुम जैसे हो, वैसे पर्याप्त नहीं हो। इसके उलट, अगर माता-पिता बच्चे की मेहनत को सराहें, उसकी कोशिशों को महत्व दें और असफलता की स्थिति में भी साथ खड़े रहें, तो बच्चा डर के बजाय भरोसे के साथ परीक्षा का सामना करता है। सुनना भी एक बड़ी दवा है। कई बार बच्चे समाधान नहीं, सिर्फ समझ चाहते हैं। जब वे अपनी घबराहट, थकान या उलझन साझा करते हैं और सामने वाला बिना टोके, बिना उपदेश दिए उनकी बात सुन लेता है, तो मन का बोझ हल्का हो जाता है। घर का माहौल अगर सुरक्षित हो, जहां गलती पर डांट नहीं बल्कि बातचीत हो, तो परीक्षा का डर दरवाजे पर ही दम तोड़ देता है। शिक्षकों के कंधों पर भी बड़ी जिम्मेदारी है। अगर कक्षा में लगातार यह एहसास दिलाया जाए कि टेस्ट सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा है, अंतिम फैसला नहीं, तो बच्चों का नजरिया बदल सकता है। अंक के साथ-साथ प्रयास, रचनात्मकता और समझ की सराहना की जाए, तो छात्र खुद को सिर्फ नंबरों में सीमित नहीं मानते। कक्षा शुरू होने से पहले कुछ पल का ध्यान या शांत बैठना, बच्चों की एकाग्रता बढ़ाता है और मन को स्थिर करता है। शिक्षक अगर डर के बजाय भरोसे की भाषा बोलें, तो उसका असर गहरा और स्थायी होता है। दुनिया के कई देशों ने यह समझ लिया है कि अत्यधिक प्रतिस्पर्धा बच्चों को मजबूत नहीं, कमजोर बनाती है। सहयोग, कौशल और जीवन-उद्देश्य पर आधारित शिक्षा मॉडल यह दिखाते हैं कि जब परीक्षा का दबाव कम होता है, तब सीखने की खुशी बढ़ती है। भारत में भी हाल के वर्षों में यह बहस तेज हुई है कि शिक्षा का लक्ष्य केवल रैंक नहीं, बल्कि संतुलित और स्वस्थ व्यक्तित्व होना चाहिए। न्यायपालिका तक यह स्वीकार कर चुकी है कि लगातार मानसिक दबाव बच्चों के लिए नुकसानदेह है और संस्थानों को मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता देनी चाहिए। अंत में, यह समझना जरूरी है कि डर का इलाज डर से नहीं, विश्वास से होता है। जब बच्चे को यह भरोसा मिले कि वह अपने अंकों से बड़ा है, उसकी काबिलियत एक परीक्षा में नहीं समा सकती, तब उसकी रीढ़ सीधी हो जाती है। परीक्षा फिर डर नहीं रहती, वह खुद को परखने और बेहतर बनने का अवसर बन जाती है। अगर हम सब माता-पिता, शिक्षक और समाज मिलकर अपेक्षाओं का बोझ थोड़ा हल्का कर दें, तो बच्चे मुस्कान के साथ परीक्षा कक्ष में कदम रखेंगे। परीक्षा तब उत्सव बनेगी, जब हम उसे सीखने की यात्रा का पड़ाव मानेंगे, मंजिल नहीं। जब बच्चे के मन से भय हटेगा, तब ज्ञान अपने आप खिल उठेगा। यही वह बदलाव है, जिसकी आज सबसे ज्यादा जरूरत है। (L 103 जलवंत टाऊनशिप पूणा बॉम्बे मार्केट रोड, नियर नन्दालय हवेली सूरत मो 99749 40324 वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार स्तम्भकार) ईएमएस / 11 फरवरी 26