अंतर्राष्ट्रीय
11-Feb-2026


नए खरीददारों की तलाश में जुटे पुतिन मॉस्को,(ईएमएस)। समंदर में महीनों से भटक रहे रूसी तेल टैंकर वैश्विक ऊर्जा बाजार में बदलते समीकरणों की कहानी बयां कर रहे हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया था कि भारत ने रूस से तेल खरीदना बंद कर दिया है, जिससे दोनों देशों के बीच व्यापार समझौता संभव हुआ। हालांकि, वास्तविकता इससे अलग नजर आती है। भारत ने रूसी तेल की खरीद पूरी तरह बंद नहीं की है, लेकिन इसमें कमी जरूर आई है। इसकारण रूस पर अपने कच्चे तेल, खासकर यूराल्स ग्रेड, के लिए नए खरीदार तलाशने का दबाव बढ़ गया है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत द्वारा रियायती रूसी तेल की खरीद घटाने के बाद कम से कम 12 तेल टैंकर हिंद महासागर, मलेशिया, चीन और पूर्वी रूस के तटों के आसपास भटक रहे हैं। इन टैंकरों में लगभग 1.2 करोड़ बैरल यूराल्स कच्चा तेल लदा हुआ है। जहाज-ट्रैकिंग डेटा से पता चलता है कि कुछ अन्य टैंकर अटलांटिक, भूमध्य सागर और लाल सागर से एशिया की ओर बढ़ रहे हैं, लेकिन उनका अंतिम गंतव्य तय नहीं है। कई जहाज सिंगापुर को अपना गंतव्य दिखा रहे हैं, हालांकि वास्तविक खरीदार मिलने पर दिशा बदली जा सकती है। यूक्रेन युद्ध के बाद पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों ने रूस के ऊर्जा निर्यात को प्रभावित किया। ऐसे में रूस ने भारत और चीन जैसे एशियाई देशों को भारी छूट पर तेल बेचना शुरू किया। 2024 के मध्य तक भारत रोजाना लगभग 20 लाख बैरल रूसी तेल खरीद रहा था। हालांकि जनवरी में यह घटकर करीब 12 लाख बैरल प्रतिदिन रह गया। भारत सरकार ने आधिकारिक तौर पर खरीद रोकने की घोषणा नहीं की है, लेकिन कुछ रिफाइनरियों ने नए ऑर्डर टाल दिए हैं। रूस के सामने चुनौती यह है कि यूराल्स जैसे भारी ग्रेड के तेल के लिए सीमित खरीदार हैं। चीन की स्वतंत्र रिफाइनरियों ने जनवरी में यूराल्स की खरीद बढ़ाई, लेकिन वे आमतौर पर हल्के ग्रेड जैसे ईएसओपी और सोकोल को प्राथमिकता देती हैं। इंडोनेशिया जैसे देश भी हल्के ग्रेड पसंद करते हैं। वैश्विक बाजार में आपूर्ति अधिक होने से रूस के लिए वैकल्पिक बाजार ढूंढना और कठिन हो गया है। इस संकट का मानवीय पहलू भी सामने आया है। एक रूसी टैंकर, जो चीन के लिए रवाना हुआ था, महीनों से अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्र में खड़ा है। जहाज पर सवार क्रू ने भोजन और वेतन की कमी की शिकायत की। इंटरनेशनल ट्रांसपोर्ट वर्कर्स फेडरेशन (आईटीएफ) ने इस परित्यक्त घोषित किया और हस्तक्षेप कर बकाया वेतन दिलवाया तथा जरूरी सामान पहुंचाया। फिर भी कुछ नाविक अब भी जहाज पर फंसे हैं। विश्लेषकों का मानना है कि भारत अपनी ऊर्जा रणनीति में संतुलन साधने की कोशिश कर रहा है—एक ओर सस्ती आपूर्ति, दूसरी ओर वैश्विक कूटनीतिक दबाव। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि रूस अपने अतिरिक्त तेल का समाधान कैसे निकालता है और भारत अपनी खरीद नीति किस दिशा में ले जाता है। फिलहाल समुद्र में भटकते टैंकर वैश्विक ऊर्जा राजनीति की अनिश्चितता का प्रतीक बन गए हैं। आशीष दुबे / 11 फरवरी 2026