लेख
14-Feb-2026
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(शिव रात्रि पर विशेष) शिवरात्रि के उपलक्ष्य में उत्तराखंड के राज्यपाल लेफ्टिनेंट जनरल गुरमीत सिंह व ओम शांति रिट्रीट सेंटर गुरुग्राम की निदेशिका राजयोगिनी बीके आशा दीदी देहरादून ब्रह्माकुमारीज सेवा केंद्र सुभाष नगर में 14 फ़रवरी को पधार रहे है ।वे संस्था के नवदशमोत्सवो कार्यक्रम में भी प्रतिभाग करेंगे।उनका स्वागत करने के लिए राजयोगिनी बीके मंजू दीदी,राजयोगिनी बीके मीना दीदी ,ब्रह्माकुमार सुशील भाई समेत बड़ी संख्या में भाई बहन उत्साहित है।महाशिवरात्रि का पर्व फाल्गुन मास की कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को इस बार 15 फ़रवरी को मनाया जा रहा है। इस दिन भगवान शिव की विधिवत पूजा करने के साथ व्रत रखने का विधान है। मान्यता है कि इस दिन शिवलिंग में मात्र जलाभिषेक करने से शिव जी प्रसन्न होते हैं और अपने साधक की सभी मनोकामनाएं पूरी कर सकते हैं। इस स्वर्णिम दुनियां की रचना कर परमात्मा शिव ने हमे यह अवसर प्रदान किया है कि हम उसकी बनाई इस दुनियां को उसके मूल स्वरूप में बनाये रखने में मदद करे।जिसके लिए आवश्यक है कि हम सत्यम,शिवम,सुंदरम को आत्मसात कर स्वयं को आत्म बोध में स्थापित कर परमात्मा से अपनी लौ लगाये।यह लौ हमारे अंदर के विकारों से हमे मुक्त कर हमारे कल्याण का माध्यम बनती है।युग परिवर्तन के लिए भी परमात्मा शिव हमे संगम युग मे ईश्वरीय ज्ञान प्राप्ति कराकर कलियुग से सतयुग में लाने के लिए यज्ञ रचते है।जिसमे स्त्री शक्ति का पोषण कर उन्हें युग परिवर्तन के निमित्त बनाया जाता है।वस्तुतःविश्व रचियता परमात्मा एक है जिसे कुछ लोग भगवान,कुछ लोग अल्लाह,कुछ लोग गोड ,कुछ लोग ओम, कुछ लोग ओमेन ,कुछ लोग सतनाम कहकर पुकारते है। यानि जो परम ऐश्वर्यवान हो,जिसे लोग भजते हो अर्थात जिसका स्मरण करते हो एक रचता के रूप में ,एक परमशक्ति के रूप में एक परमपिता के रूप में वही ईश्वर है और वही शिव है। एक मात्र वह शिव जो ब्रहमा,विष्णु और शकंर के भी रचियता है। जीवन मरण से परे है। ज्योति बिन्दू स्वरूप है। वास्तव में शिव एक ऐसा शब्द है जिसके उच्चारण मात्र से परमात्मा की सुखद अनुभूति होने लगती है। शिव को कल्याणकारी तो सभी मानते है, साथ ही शिव ही सत्य है शिव ही सुन्दर है यह भी सभी स्वीकारते है। परन्तु यदि मनुष्य को शिव का बोध हो जाए तो उसे जीवन मुक्ति का लक्ष्य प्राप्त हो सकता है। गीता में कहा गया है कि जब जब भी धर्म के मार्ग से लोग विचलित हो जाते है,समाज में अनाचार,पापाचार ,अत्याचार,शोषण,क्रोध,वैमनस्य,आलस्य,लोभ,अहंकार,का प्रकोप बढ़ जाता है।माया मोह बढ जाता है तब परमात्मा को स्वयं आकर राह भटके लोगो को सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा का कार्य करना पडता है। ऐसा हर पाचं हजार साल में पुनरावृत होता है। पहले सतयुग,फिर द्वापर,फिर त्रेता और फिर कलियुग तक की यात्रा इन पांच हजार वर्षो में होती है। हांलाकि सतयुग में हर कोई पवित्र,सस्ंकारवान,चिन्तामुक्त और सुखमय होता है।परन्तु जैसे जैसे सतयुग से द्वापर और द्वापर से त्रेता तथा त्रेता से कलियुग तक का कालचक्र धूमता है। वैसे वैसे व्यक्ति रूप में मौजूद आत्मायें भी शान्त,पवित्र और सुखमय से अशान्त,दुषित और दुखमय हो जाती है। कलियुग को तो कहा ही गया है दुखों का काल। लेकिन जब कलियुगके अन्त और सतयुग के आगमन की धडी आती है तो उसके मध्य के काल को सगंम युग कहा जाता है यही वह समय जब परमात्मा स्वंय सतयुग की दुनिया बनाने के लिए आत्माओं को पवित्र और पावन करने के लिए उन्हे स्वंय ज्ञान देते है औरउन्हे सतयुग के काबिल बनाते है। समस्त देवी देवताओ में मात्र शिव ही ऐसे देव है जो देव के देव यानि महादेव है जिन्हे त्रिकालदर्शी भी कहा जाता है। परमात्मा शिव ही निराकारी और ज्योति स्वरूप है जिसे ज्योति बिन्दू रूप में स्वीकारा गया है। परमात्मा सर्व आत्माओं से न्यारा और प्यारा है जो देह से परे है जिसका जन्म मरण नही होता और जो परमधाम का वासी है और जो समस्त संसार का पोषक है। दुनियाभर में ज्योतिर्लिगं के रूप में परमात्मा शिव की पूजा अर्चना और साधना की जाती है। शिवलिंग को ही ज्योतिर्लिंग के रूप में परमात्मा का स्मृति स्वरूप माना गया है।धार्मिक दृष्टि में विचार मथंन करे तो भगवान शिव ही एक मात्र ऐसे परमात्मा है जिनकी देवचिन्ह के रूप में शिवलिगं की स्थापना कर पूजा की जाती है। लिगं शब्द का साधारण अर्थ चिन्ह अथवा लक्षण है। चूंकि भगवान शिव ध्यानमूर्ति के रूप में विराजमान ज्यादा होते है इसलिए प्रतीक रूप में अर्थात ध्यानमूर्ति के रूप शिवलिगं की पूजा की जाती है। पुराणों में लयनाल्तिमुच्चते अर्थात लय या प्रलय से लिगं की उत्पत्ति होना बताया गया है। जिनके प्रणेता भगवान शिव है। यही कारण है कि भगवान शिव को प्राय शिवलिगं के रूप अन्य सभी देवी देवताओं को मूर्ति रूप पूजा की जाती है। शिव स्तुति एक साधारण प्रक्रिया है। ओम नमः शिवाय का साधारण उच्चारण उसे आत्मसात कर लेने का नाम ही शिव अराधना है। संसार में सबसे पहले सोमनाथ के मन्दिर में हीरे कोहिनूर से बने शिवलिंग की स्थापना की गई थी।विभिन्न धर्मो में परमात्मा को इसी आकार रूप में मान्यता दी गई। ज्योतिरूप में धार्मिक स्थलों पर ज्योति अर्थात दीपक प्रज्जवलित कर परमात्मा के ज्योति स्वरूप की साधना की जाती है। शिव परमात्मा ऐसी परम शक्ति है,जिनसे देवताओं ने भी शक्ति प्राप्त की है। भारत के साथ साथ मिश्र,यूनान,थाईलैण्ड,जापान,अमेरिका,जर्मनी,जैसे दुनियाभर के अनेक देशों ने परमात्मा शिव के अस्तित्व को स्वीकारा है। धार्मिक चित्रों में स्वंय श्रीराम,श्रीकृष्ण और शंकर भी भगवान शिव की आराधना में ध्यान मग्न दिखाये गए है। जैसा कि पुराणों और धार्मिक ग्रन्थों में भी उल्लेख मिलता है। श्री राम ने जहां रामेश्वरम में शिव की पूजा की तो श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध से पूर्व शिव स्तुति की थी। इसी तरह शंकर को भी भगवान शिव में ध्यान लगाते देखे जाने के चित्र प्रदशित किये गए है। दरअसल शिव और शंकर दोनो अलग अलग है शिव परमपिता परमात्मा है तो ब्रहमा,विष्णु और महेश यानि शंकर उनके देव तभी तो भगवान शिव को देव का देव महादेव अर्थात परमपिता परमात्मा स्वीकारा गया है। ज्योति बिन्दू रूपी शिव ही अल्लाह अर्थात नूर ए इलाही है।वही लाईट आफ गॉड है और वही सतनाम है।यानि नाम अलग अलग परन्तु पूरी कायनात का मालिक एक ही परम शक्ति है और वह शिव है।आत्माओं का जन्म होता है और परमात्मा का अवतरण होता है। यही आत्मा और परमात्मा में मुख्य अन्तर है। सबसे बडा अन्तर यह भी हैे कि आत्मा देह धारण करती है जबकि परमात्मा देह से परे है,परमात्मा निराकार है। ( लेखक आध्यात्मिक चिंतक व वरिष्ठ साहित्यकार है) ईएमएस / 14 फरवरी 26