बांग्लादेश के आम चुनाव परिणामों ने दक्षिण एशिया की राजनीति में एक नया अध्याय लिखने के लिए एक कोरी डायरी पेश कर दी है। इसमें नई सरकार के काम-काज के साथ ही उनके असर को बिंदुवार रेखांकित किया जा सकेगा। दरअसल तारिक रहमान की 17 वर्ष बाद स्वदेश वापसी और उनकी पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की निर्णायक जीत ने सत्ता संतुलन बदल दिया है। यह चुनाव जुलाई 2024 की हिंसक उथल-पुथल और पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के लंबे शासन के अंत के बाद हुआ। स्वाभाविक है कि अब सबकी नजर नई सरकार की कथनी और करनी के साथ ही साथ विदेश नीति पर है। सवाल यही कि क्या ढाका नई दिल्ली के करीब आएगा या बीजिंग और इस्लामाबाद की ओर झुकेगा? वैसे भी भारत के लिए यह सवाल केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक और रणनीतिक महत्व का है। याद करें जब 1971 में पूर्वी पाकिस्तान के दमन के खिलाफ मुक्ति संग्राम छिड़ा, तब भारत ने निर्णायक भूमिका निभाई। भारतीय सेना के हस्तक्षेप, शरणार्थियों को आश्रय और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर समर्थन ने स्वतंत्र बांग्लादेश के निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया। इसलिए भारत-बांग्लादेश संबंध केवल पड़ोसी देशों का रिश्ता नहीं, बल्कि साझा इतिहास, बलिदान और सांस्कृतिक निकटता से जुड़ा है। आखिर यह कौन नहीं जानता कि तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की दृढ़ कूटनीतिक और सैन्य रणनीति ने पाकिस्तान को 13 दिनों के युद्ध में घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था। वक्त बदला और हालात भी बदले लेकिन भारत ने कभी भी बांग्लादेश के साथ दोयम दर्जे का बर्ताव कभी नहीं किया। हर समय कंधे से कंधा मिलाकर आगे बढ़ाने का काम किया, आर्थिक मदद प्रदान करने से भी पीछे नहीं हटा। यही वजह रही कि जैसे ही बीएनपी की बंपर जीत सामने आई नई दिल्ली ने तेजी से पहल करते हुए बधाई संदेश दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकतांत्रिक, समावेशी और प्रगतिशील बांग्लादेश की कामना की। यह संदेश औपचारिक जरूर था, लेकिन इसके निहितार्थ स्पष्ट थे, भारत पिछले डेढ़ वर्ष की अस्थिरता, चीन-पाकिस्तान की बढ़ती सक्रियता और अल्पसंख्यकों पर हमलों जैसी चिंताओं को पीछे छोड़ स्थिर संबंध चाहता है। गौरतलब है कि बीएनपी अध्यक्ष तारिक रहमान एक प्रभावशाली राजनीतिक परिवार से आते हैं। वे पूर्व राष्ट्रपति जियाउर रहमान और पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के बेटे हैं। निर्वासन के लंबे काल के बाद उनकी वापसी ने जनता में उत्साह पैदा किया है। चुनाव प्रचार के दौरान उनका मेरे पास बांग्लादेश के लिए एक योजना है वाला संदेश नई शुरुआत का संकेत था। उन्होंने यह भी कहा है कि वे भारत के हितों का सम्मान करेंगे, यह बयान उनकी मां की बांग्लादेश पहले नीति से थोड़ा संतुलित और व्यावहारिक दृष्टिकोण दर्शाता है। बावजूद इसके बांग्लादेश को लेकर भारत की चिंताएं तीन आयामों में केंद्रित हैं। पहला, कहीं पाकिस्तान-चीन-बांग्लादेश का कोई त्रिकोणीय समीकरण न उभर आए। दूसरा, सीमा और आंतरिक सुरक्षा, विशेषकर अवैध घुसपैठ और पूर्वोत्तर भारत में अस्थिरता। तीसरा, आर्थिक हित। भारत को बांग्लादेश के साथ व्यापार में उल्लेखनीय लाभ है; वह वहां के वस्त्र उद्योग को बड़े पैमाने पर कच्चा कपास निर्यात करता है। स्थिर संबंध दोनों देशों की अर्थव्यवस्थाओं के लिए लाभकारी होंगे। शेख हसीना के काल में संबंध अपेक्षाकृत स्थिर रहे। सीमा समझौते, यातायात संपर्क और सुरक्षा सहयोग में प्रगति हुई। हालांकि अवामी लीग इस बार चुनावी मैदान से बाहर रही और हसीना पर कानूनी संकट भी मंडरा रहा है, लेकिन यह भी सच है कि सत्ता परिवर्तन लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा है। भारत को बदलती राजनीतिक वास्तविकताओं के साथ तालमेल बिठाना ही होगा। एक सकारात्मक संकेत यह है कि कट्टरपंथी जमात-ए-इस्लामी सरकार का हिस्सा नहीं बन रही। यदि ऐसा होता तो भारत की सुरक्षा चिंताएं और गहरी हो सकती थीं। चीन की बढ़ती आर्थिक मौजूदगी, विशेषकर बंदरगाह और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में नई दिल्ली के लिए चिंता का विषय है। श्रीलंका और पाकिस्तान में चीनी निवेश के रणनीतिक आयाम पहले से स्पष्ट हैं। बांग्लादेश में भी ऐसी संभावनाएं भारत को सजग रहने को बाध्य करती हैं। फिलहाल भारत रुको और देखो की नीति अपनाए हुए है। उसे भावनात्मक प्रतिक्रिया के बजाय व्यावहारिक कूटनीति अपनानी होगी। ढाका की नई सरकार भी समझती है कि भारत से दूरी बनाना आसान विकल्प नहीं। भौगोलिक, आर्थिक और सांस्कृतिक निकटता दोनों देशों को सहयोग की दिशा में ही ले जाती है। आखिरकार, 1971 की साझी विरासत आज भी दोनों देशों के रिश्तों की आधारशिला है। यदि तारिक रहमान उस ऐतिहासिक सच्चाई को ध्यान में रखते हुए संतुलित विदेश नीति अपनाएंगे तो बांग्लादेश और भारत मिलकर दक्षिण एशिया में स्थिरता और समृद्धि का नया अध्याय लिख सकते हैं। उम्मीदें खासी हैं और अब परीक्षा नई सरकार की है। ईएमएस / 14 फरवरी 26