लेख
15-Feb-2026
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उत्तर भारत में इस वर्ष फरवरी का महीना अप्रत्याशित गर्मी लेकर आया है। कई शहरों में तापमान 29 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया है और लोगों को ऐसा महसूस हो रहा है मानो सर्दी के बाद सीधे मई का मौसम आ गया हो। जिस समय फागुन की मादक बयार बहती थी और दिन में हल्की गर्मी के साथ रात में ठंडक रहती थी उस समय अब तेज धूप और शुष्क हवाएं चल रही हैं। वसंत का संतुलित और सुखद स्वरूप जैसे अचानक सिमट गया है। भारत मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार फरवरी में तापमान सामान्य से अधिक दर्ज किया जा रहा है। दिल्ली एनसीआर सहित उत्तरी मैदानी क्षेत्रों में न्यूनतम और अधिकतम तापमान दोनों में तेजी से वृद्धि देखी गई है। यह स्थिति केवल एक अस्थायी बदलाव नहीं बल्कि दीर्घकालिक जलवायु प्रवृत्ति का संकेत है। वैश्विक स्तर पर पिछले वर्ष अत्यधिक गर्मी दर्ज की गई और 2025 भी गर्म वर्षों में शामिल रहा। इसका प्रभाव क्षेत्रीय मौसम चक्र पर स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है। सीधी गर्मी आने के पीछे कई कारण हैं। वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसों की बढ़ती मात्रा धरती की सतह से उत्सर्जित ऊष्मा को रोक लेती है जिससे तापमान बढ़ता है। औद्योगीकरण वाहनों की बढ़ती संख्या ऊर्जा की अत्यधिक खपत और जंगलों की कटाई इस प्रवृत्ति को तेज कर रहे हैं। शहरी क्षेत्रों में कंक्रीट और डामर की अधिकता के कारण हीट आइलैंड प्रभाव उत्पन्न होता है जिससे शहरों का तापमान आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से अधिक हो जाता है। सर्दियों में अपेक्षित वर्षा और हिमपात में कमी भी ठंड के प्रभाव को सीमित कर देती है और तापमान तेजी से ऊपर चला जाता है। वसंत के सिमटने का असर प्रकृति पर स्पष्ट है। पहले सरसों के खेत कई दिनों तक पीले फूलों से लहराते थे और पेड़ों पर नई कोपलें धीरे धीरे खिलती थीं। अब तेज गर्मी के कारण फसल जल्दी पक रही है और फूलों का जीवनकाल कम हो रहा है। अमलतास गुलाब और चमेली की सुगंधित उपस्थिति भी प्रभावित हो रही है। पतझड़ और नई पत्तियों के आने का क्रम असंतुलित हो गया है जिससे परागण प्रक्रिया और जैव विविधता पर प्रभाव पड़ सकता है। कृषि क्षेत्र के लिए यह परिवर्तन चुनौतीपूर्ण है। समय से पहले तापमान बढ़ने से गेहूं जैसी रबी फसलों की उपज प्रभावित हो सकती है। मिट्टी की नमी जल्दी समाप्त होती है और सिंचाई की मांग बढ़ जाती है। यदि मार्च और अप्रैल में ही लू जैसे हालात बनते हैं तो किसानों की लागत बढ़ेगी और उत्पादन घट सकता है। यह केवल आर्थिक समस्या नहीं बल्कि खाद्य सुरक्षा से जुड़ा प्रश्न भी है। स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी यह स्थिति चिंता का विषय है। यदि फरवरी में ही गर्मी बढ़ती रही तो हीटवेव का खतरा पहले उत्पन्न हो सकता है। बुजुर्ग बच्चों और श्रमिक वर्ग को अधिक सावधानी की आवश्यकता होगी। जल की कमी और बिजली की बढ़ती मांग से सामाजिक दबाव बढ़ सकता है। अस्पतालों में डिहाइड्रेशन और हीट स्ट्रेस के मामलों में वृद्धि की आशंका रहती है। जहां तक आगे ठंड बढ़ने की संभावना का प्रश्न है तो अल्पकाल में पश्चिमी विक्षोभ के कारण कुछ दिनों के लिए बादल और वर्षा हो सकती है जिससे तापमान में हल्की गिरावट आएगी। पश्चिमी हिमालय में वर्षा और बर्फबारी का प्रभाव मैदानी क्षेत्रों तक महसूस हो सकता है परंतु दीर्घकालिक प्रवृत्ति गर्मी की ओर झुकी हुई है। इसलिए यह मानना उचित होगा कि मौसम में अस्थिरता बनी रहेगी और वसंत की पारंपरिक अवधि छोटी होती जाएगी। निवारण के लिए बहुआयामी प्रयास आवश्यक हैं। कार्बन उत्सर्जन में कमी सबसे महत्वपूर्ण कदम है। सौर और पवन ऊर्जा के उपयोग को बढ़ाना होगा। सार्वजनिक परिवहन और इलेक्ट्रिक वाहनों को प्रोत्साहन देना चाहिए। वृक्षारोपण और हरित क्षेत्रों का विस्तार स्थानीय तापमान को नियंत्रित करने में सहायक होगा। जल संरक्षण और वर्षा जल संचयन को प्राथमिकता देनी चाहिए। नीति निर्माण में दीर्घकालिक पर्यावरणीय दृष्टिकोण अपनाना समय की मांग है। व्यक्तिगत स्तर पर भी जिम्मेदारी निभानी होगी। ऊर्जा की बचत जल का संयमित उपयोग और पर्यावरण अनुकूल जीवन शैली अपनाना आवश्यक है। स्कूलों और सामाजिक संस्थाओं के माध्यम से जागरूकता बढ़ानी चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ियां प्रकृति के संतुलन को समझ सकें। सिमटता वसंत केवल मौसम का बदलाव नहीं बल्कि चेतावनी है कि प्रकृति का संतुलन बिगड़ रहा है। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले वर्षों में ऋतुओं की पहचान धुंधली हो सकती है। वसंत का सुकून फिर लौट सकता है यदि मानव समाज विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन स्थापित करे। यह समय चिंतन का भी है और संकल्प का भी ताकि भविष्य की पीढ़ियां केवल यादों में नहीं बल्कि वास्तविक अनुभव में भी वसंत की मधुरता महसूस कर सकें। ( L 103 जलवंत टाऊनशिप पूणा बॉम्बे मार्केट रोड, नियर नन्दालय हवेली सूरत मो 99749 40324 वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार स्तम्भकार) ईएमएस / 15 फरवरी 26