नई दिल्ली (ईएमएस)। आयुर्वेदाचार्य के अनुसार, पित्त दोष शरीर और मन दोनों के संवेगों को नियंत्रित करता है। जब यह असंतुलित हो जाता है, तो मानसिक बेचैनी, क्रोध, चिंता और भावनात्मक अस्थिरता बढ़ जाती है। इसके साथ ही पेट में जलन, हार्टबर्न, थकान और बिना कारण उदासी महसूस होना भी इसके प्रमुख लक्षणों में शामिल है। कहा जाता है कि शाम के समय यह बेचैनी और अधिक बढ़ जाती है। आयुर्वेद के मुताबिक पित्त दोष को दबाने की बजाय उसे शांत और संतुलित करना जरूरी है। सही दिनचर्या, ठंडे और हल्के आहार तथा प्राकृतिक उपायों से इसे संतुलित किया जा सकता है। पित्त शांत करने के लिए सबसे प्रभावी तरीका पित्त शामक पेय पदार्थों का सेवन है। इसमें जीरा, सौंफ, सोंठ और अंगूर के रस से तैयार पेय शामिल है, जो पेट की जलन कम करने और हार्टबर्न से राहत देने में मददगार है। पित्त शामक औषधियों में अविपत्तिकर चूर्ण को बेहद लाभकारी माना जाता है। यह मन को शांत करता है और तनाव व बेचैनी को नियंत्रित करता है। इसे गुनगुने पानी के साथ लिया जा सकता है, हालांकि सेवन से पहले चिकित्सकीय परामर्श लेना जरूरी है। पित्त संतुलन के लिए घी नस्य भी एक प्राचीन और प्रभावी आयुर्वेदिक पद्धति है। रात में सोने से पहले नाक में देसी घी की कुछ बूंदें डालने से मस्तिष्क को शांति मिलती है और मानसिक अस्थिरता कम होती है। यदि सीधे नाक में घी डालना असुविधाजनक लगे, तो उंगलियों से घी को नाक के अंदर लगाया जा सकता है। वहीं, अभ्यंग यानी शरीर पर तेल मालिश भी पित्त शमन में कारगर है। नारियल और भृंगराज के तेल से सिर और तलवों की मालिश करने से शरीर की गर्मी कम होती है और जलन, खुजली तथा बेचैनी में राहत मिलती है। आहार में हर्बल चाय शामिल करना भी लाभदायक है। कैमोमाइल, तुलसी और गुलाब की पंखुड़ियों को पानी में उबालकर तैयार की गई चाय मानसिक तनाव कम करती है और मन को गहरी शांति प्रदान करती है। सुदामा/ईएमएस 16 फरवरी 2026