जयपुर (ईएमएस)। एकादशी का पर्व हर माह दो बार कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष में आता है. आमतौर पर वर्ष में 24 एकादशियां होती हैं, लेकिन इस वर्ष दुर्लभ संयोग के चलते 26 एकादशियां मनाई जाएंगी इसका कारण है अधिकमास, जो लगभग हर चौथे वर्ष आता है. ज्योतिषीय गणना के अनुसार जब सूर्य की संक्रांति अमावस्या के आसपास विशेष स्थिति में आती है, तब चंद्रमास की गणना संतुलित करने के लिए अधिकमास जुड़ता है. इसी कारण इस बार दो अतिरिक्त एकादशियां होंगी, जिनका फल सहस्रगुना होगा। पंडित मनु मुद्गल ने बताया कि इस वर्ष ज्येष्ठ मास में अधिकमास का विशेष योग बन रहा है. 17 मई से शुरू होकर 15 जून तक चलने वाले अधिकमास में दो एकादशियां पड़ेंगी-कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की. शास्त्रों में अधिकमास को अत्यंत पुण्यदायी माना गया है. विष्णु पुराण और स्कन्द पुराण में उल्लेख है कि अधिक मासस्य अधिक फलम अर्थात अधिकमास में किए गए व्रत, दान और जप का फल कई गुना बढ़ जाता है। एकादशी व्रत का विधान दशमी से प्रारंभ होता है. दशमी तिथि को एक समय सात्विक अन्न ग्रहण कर एकादशी को उपवास या फलाहार किया जाता है. द्वादशी को विधिपूर्वक पारायण कर अन्न ग्रहण किया जाता है. एकादशी के दिन चावल का सेवन वर्जित माना गया है. धार्मिक मान्यता के साथ-साथ इसके पीछे स्वास्थ्य संबंधी कारण भी बताए जाते हैं. इन पर आधुनिक विज्ञान भी शोध कर रहा है अधिकमास की एकादशी पर भगवान विष्णु की विशेष पूजा का विधान है. गोपाल स्वरूप या शालिग्राम रूप में भगवान का पंचामृत अभिषेक, तुलसीदल, मंजरी, सुगंधित पुष्प अर्पित किए जाते हैं. मान्यता है कि इस दिन विधिपूर्वक पूजन और मिष्ठान-फलाहार का भोग लगाकर पारायण करने से सहस्त्र गुना पुण्यफल प्राप्त होता है। एकादशी के दिन नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र, गोपाल सहस्त्रनाम और विष्णु सहस्त्रनाम का पाठ विशेष फलदायी माना गया है. श्रद्धालु दिनभर जप, भजन और सत्संग में समय व्यतीत करते हैं. मान्यता है कि प्रत्येक 15 दिन में आने वाली एकादशी शरीर और मन की शुद्धि का अवसर देती है. उन्होंने बताया कि सभी एकादशियां समान रूप से महत्वपूर्ण हैं, लेकिन ज्येष्ठ अधिकमास की कृष्ण और शुक्ल पक्ष की एकादशी चार वर्ष बाद आने वाला दुर्लभ संयोग है, जो श्रद्धालु नियमित व्रत नहीं कर पाते, वे यदि अधिकमास की एकादशी का श्रद्धापूर्वक पालन करें तो उन्हें विशेष पुण्यफल प्राप्त होता है। अशोक शर्मा/ 4.30 बजे/ 16 फरवरी 2026