राष्ट्रीय
18-Feb-2026
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-रिसर्च में खुलासा, यमुना नदी के पानी में मिले 13 तरह के माइक्रोप्लास्टिक नई दिल्ली,(ईएमएस)। आप जो पानी समझकर पी रहे हैं वह पानी नहीं प्लास्टिक है। हाल ही में एक रिसर्च ने सभी को डरा दिया है। एक वैज्ञानिक अध्ययन में दिल्ली से गुजरने वाली यमुना नदी, नलों से आने वाले भूजल, शहर के खुले नालों और बाढ़ क्षेत्र की मिट्टी में बड़ी मात्रा में माइक्रोप्लास्टिक के कण मिले हैं। शोधकर्ताओं ने दिल्ली के सभी 11 जिलों की विभिन्न जगहों से 88 नमूने लिए थे और उनकी जांच की थी, जिनमें से हर सैंपल में माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा काफी ज्यादा मिली। इस स्टडी को दिल्ली सरकार के पर्यावरण विभाग ने करवाया था, जिसके परिणाम डराने वाले आए। यह रिपोर्ट पिछले साल के अंत में दिल्ली सरकार को सौंप दी गई थी। रिपोर्ट बताती है कि मौसम के मुताबिक यमुना जल समेत बाकी जल स्त्रोतों में प्रदूषण का स्तर बदलता रहता है। जहां बारिश यानि मानसून से पहले यमुना नदी के पानी में बहाव और जल की आपूर्ति बढ़ने के कारण माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा ज्यादा देखी गई और मॉनसून के बाद यह कम हो जाती है क्योंकि यह गंदगी और प्लास्टिक आसपास की मिट्टी में फैल जाती है। माइक्रोप्लास्टिक 5 मिलीमीटर से छोटे प्लास्टिक के कण होते हैं जो पानी में मिले रहते हैं और दिखाई भी नहीं देते लेकिन अगर इस पानी को पीया जाता है तो यह कण अपने साथ जहरीले रसायनों को चिपका कर शरीर के अंदर ले जाते हैं और भारी नुकसान पहुंचाते हैं। माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा शरीर में पहुंचने के चलते काफी सारी गंभीर बीमारियां जन्म ले सकती हैं। जांच में पाया गया कि करीब 95 फीसदी कण माइक्रोफाइबर थे। इससे अंदाजा लगाया गया कि घरों से निकलने वाला कपड़े धोने का पानी और कपड़ा उद्योग से निकलने वाला कचरा भी इस प्रदूषण का बड़ा कारण हो सकता है। सबसे खास बात है कि इस परीक्षण में पानी के अंदर 13 तरह के प्लास्टिक कण पाए गए, जिससे पता चलता है कि ये कण घरों के कचरे, फैक्ट्रियों के गंदे पानी और पैकेजिंग सामग्री जैसे कई स्रोतों से आकर मिल रहे हैं। स्टडी से पता चलता है कि मॉनसून में यानि मई–जून 2024 में यमुना के पानी में औसतन 6,375 माइक्रोप्लास्टिक कण प्रति घन मीटर मिले, जबकि दिसंबर 2024 से जनवरी 2025 में यह घटकर 3,080 कण प्रति घन मीटर रह गए यानी लगभग 50 फीसदी की कमी देखी गई। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह कमी प्लास्टिक कम बनने से नहीं, बल्कि बारिश के कारण पानी बढ़ने से कण बह जाने और पतले पड़ने की वजह से हुई। मानसून के दौरान तेज बहाव कणों को नीचे की ओर बहा देता है, लेकिन सबसे बड़ी बात है कि नदी किनारे की मिट्टी में माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा चार गुना से ज्यादा बढ़ गई। मानसून से पहले औसतन 24.5 कण प्रति किलो मिट्टी थे, जो बाद में बढ़कर 104.45 कण प्रति किलो हो गए। सिराज/ईएमएस 18 फरवरी 2026