-बिल्लियों का सबसे पसंदीदा घर बना मध्यप्रदेश और राजस्थान नई दिल्ली,(ईएमएस)। देश में पहली बार जंगली बिल्लियों की व्यापक गणना में उनकी कुल आबादी लगभग तीन लाख आंकी गई है। 26,838 कैमरा ट्रैप से ली गई करीब 3.48 करोड़ तस्वीरों के विश्लेषण के आधार पर यह आकलन तैयार किया गया है। इस गणना से उजागर हुआ है कि नर बिल्लियों की अपेक्षा मादा बिल्लियों की संख्या ज्यादा है। अध्ययन में यह भी सामने आया कि मध्यप्रदेश और राजस्थान इन मध्यम आकार की जंगली बिल्लियों के प्रमुख आश्रय स्थल हैं। दोनों राज्यों में मिलाकर 88,000 से अधिक जंगली बिल्लियां पाई गईं, जो देश की कुल आबादी का लगभग एक-तिहाई हिस्सा सुरक्षित रखती हैं। इन जंगली बिल्लियों को वैज्ञानिक नाम फेलिस चाउज से जाना जाता है, जिन्हें आमतौर पर ‘जंगली कैट’ भी कहा जाता है। भारत में इन्हें वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट की अनुसूची-2 के तहत संरक्षित दर्जा प्राप्त है। इस राष्ट्रीय स्तर के अध्ययन में वाइल्डलाइफ इंस्टिट्यूट ऑफ इंडिया, इंडियन नेशनल साइंस एकेडमी, नेशनल सेंटर फॉर बायोलॉजिकल साइंस तथा अमेरिका के हब स्कूल ऑफ इन्वायरमेंट एंड नेचुरल रिसोर्सेज ने संयुक्त रूप से भागीदारी की। राज्यवार आंकड़ों के अनुसार मध्यप्रदेश में 78,849 वर्ग किमी वन क्षेत्र में 11,769 नर और 32,854 मादा, जबकि राजस्थान में 76,709 वर्ग किमी क्षेत्र में 11,449 नर और 31,962 मादा जंगली बिल्लियां दर्ज की गईं। छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, गुजरात और आंध्र प्रदेश भी इनके प्रमुख आवास क्षेत्र के रूप में सामने आए हैं। झारखंड, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में भी उल्लेखनीय संख्या पाई गई है। हालांकि विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि ‘क्यूट किलर’ कही जाने वाली इन बिल्लियों के सामने कई खतरे मंडरा रहे हैं। तेजी से सिमटते प्राकृतिक आवास, जंगलों के बीच सड़कों का विस्तार और वाहनों से कुचलने की घटनाएं इनके लिए गंभीर चुनौती बन रही हैं। मानव बस्तियों के नजदीक पहुंचने के कारण घरेलू बिल्लियों के साथ इनका संकरण (हाइब्रिड) भी बढ़ रहा है, जिससे प्रजाति की शुद्धता पर असर पड़ सकता है। कृषि विस्तार और बुनियादी ढांचा परियोजनाएं भी इनके आवास को सीमित कर रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यह पहली व्यापक गणना भविष्य की संरक्षण नीतियों के लिए आधार तैयार करेगी। यदि समय रहते आवास संरक्षण, सुरक्षित कॉरिडोर और जनजागरूकता पर ध्यान नहीं दिया गया, तो इन जंगली बिल्लियों की संख्या आने वाले वर्षों में घट सकती है। हिदायत/ईएमएस 18 फरवरी 2026