- नई दिल्ली,(ईएमएस)। भारत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) को लेकर बड़े स्तर पर आयोजन और नीतिगत घोषणाएं हो रही हैं, लेकिन बजट उपयोग और जमीनी प्रगति को लेकर सवाल उठने लगे हैं। पिछले वर्ष केंद्र सरकार ने एआई क्षेत्र के विकास के लिए 2000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया था, किंतु उपलब्ध जानकारी के अनुसार करीब 800 करोड़ रुपये ही खर्च हो सके। शेष राशि के उपयोग न हो पाने से नीति क्रियान्वयन की गति पर बहस तेज हो गई है। सूत्रों के मुताबिक विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों को अपेक्षित वित्तीय सहायता समय पर नहीं मिल पाई, जिससे स्वदेशी एआई अनुसंधान प्रभावित हुआ है। आईटी विशेषज्ञों का कहना है कि उच्च स्तरीय कंप्यूटिंग इंफ्रास्ट्रक्चर, डेटा सेंटर और दीर्घकालिक निवेश के बिना भारत वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पिछड़ सकता है। इधर एआई समिट और तकनीकी मंचों पर विदेशी कंपनियों की सक्रिय भागीदारी बढ़ी है। वैश्विक दिग्गज जैसे गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और ओपन एआई भारतीय बाजार में अपने उत्पाद और समाधान तेजी से पेश कर रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत एआई उत्पादों का बड़ा उपभोक्ता बाजार बनता जा रहा है, लेकिन घरेलू उत्पादन और पेटेंट की हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम है। आर्थिक विश्लेषकों के अनुसार यदि स्वदेशी नवाचार और निर्यात समान गति से नहीं बढ़े, तो आयात पर निर्भरता बढ़ने से व्यापार घाटा और विदेशी मुद्रा पर दबाव बढ़ सकता है। रक्षा, विनिर्माण और औद्योगिक क्षेत्रों में एआई के सीमित उपयोग को भी विस्तार की जरूरत बताई जा रही है। सरकार एआई को भविष्य की परिवर्तनकारी तकनीक बताते हुए निवेश बढ़ाने और नवाचार को प्रोत्साहन देने की बात कर रही है। अब निगाह इस पर है कि घोषित योजनाएं और बजट आवंटन जमीनी स्तर पर कितनी तेजी और प्रभावशीलता से लागू होते हैं। हिदायत/ईएमएस 20 फरवरी 2026