- म्याना हॉस्पिटल की लापरवाही से तड़पती रही मरीज शासकीय अस्पताल से टूटा भरोसा, घंटों तड़पती रही गंभीर मरीज गुना (ईएमएस)। । जिले के म्याना शासकीय अस्पताल की बदहाल व्यवस्थाओं ने एक बार फिर सरकारी स्वास्थ्य सिस्टम पर सवाल खड़े कर दिए हैं। टकनेरा निवासी मीना बाई कुशवाह को शनिवार सुबह अचानक घबराहट और तेज बेचैनी हुई, जिसके बाद परिजन तत्काल उन्हें म्याना शासकीय अस्पताल लेकर पहुंचे। बताया गया कि अस्पताल पहुंचते-पहुंचते ही मीना बाई की हालत और बिगड़ गई और वे बेहोश हो गईं। परिजनों का आरोप है कि अस्पताल में न तो समय पर इलाज मिला और न ही गंभीर हालत में मरीज को गुना ले जाने के लिए एम्बुलेंस उपलब्ध कराई गई। परिजनों के अनुसार अस्पताल में मौजूद स्टाफ ने मरीज की हालत देखकर गुना रेफर करने की बात कही, लेकिन एम्बुलेंस बुलाने के नाम पर केवल इंतजार कराया गया। सुबह करीब 7 बजे अस्पताल पहुंचने के बाद परिजन लगातार एम्बुलेंस का इंतजार करते रहे, लेकिन तीन से चार घंटे बीत जाने के बावजूद एम्बुलेंस नहीं पहुंची। इस दौरान मीना बाई की हालत लगातार बिगड़ती चली गई और वे पूरी तरह बेहोशी की हालत में चली गईं। परिजन लखन लाल ने बताया कि अस्पताल में उस समय कोई डॉक्टर मौजूद नहीं था। केवल एक नर्स और एक कंपाउंडर थे। जब उन्होंने बार-बार एम्बुलेंस के बारे में पूछा तो जवाब मिला कि यहां गाड़ी नहीं है, गुना से मंगवानी पड़ेगी। इसी बीच परिजनों ने बीएमओ शिल्पा टांटिया से संपर्क करने की कोशिश की। आरोप है कि उन्हें एक दर्जन से ज्यादा बार फोन किया गया, लेकिन बीएमओ ने एक भी कॉल रिसीव नहीं किया। यहां तक कि बमोरी विधायक ऋषि भैया से संपर्क कर बीएमओ का नंबर मिलने के बाद भी कोई जवाब नहीं मिला। अंतत: मजबूरी में परिजन मीना बाई को एक निजी वाहन से गुना के निजी अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां उनका इलाज शुरू किया गया। परिजनों ने आरोप लगाया कि सरकारी अस्पतालों की अव्यवस्था के चलते वे जिला अस्पताल भी नहीं गए, क्योंकि वहां भी इसी तरह की स्थिति बनी रहती है। उनका कहना है कि म्याना ही नहीं, गुना जिले के सरकारी अस्पतालों में एम्बुलेंस और इलाज की व्यवस्था लगातार फेल हो रही है और इसी लापरवाही के कारण पहले भी कई मरीजों की जान जा चुकी है। इस पूरे मामले ने एक बार फिर ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की जमीनी हकीकत उजागर कर दी है, जहां समय पर एम्बुलेंस और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही मरीजों की जान पर भारी पड़ रही है। - सीताराम नाटानी