लेख
22-Feb-2026
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कर्नाटक के पश्चिमी घाटों की हरीतिमामयी गोद में, जहाँ कोहरे की चादर ओढ़े कॉफी-बागान विहरते हैं तथा मसालों की तीखी गन्ध हवा में घुली रहती है, वहाँ एक दिव्य तीर्थ निर्माण साकार हो रहा है। मडिकेरी के निकट हर्दूर ग्राम में उदित हो रहा श्री जीरावला तीर्थ धाम जैन परम्परा का एक भव्य पुनर्जागरण है, जो राजस्थान के देलवाड़ा और रणकपुर जैसे प्राचीन मंदिरों से प्रेरित होकर दक्षिण भारत में जैन आध्यात्मिकता का नया केंद्र बनने जा रहा है। दसवीं से बारहवीं शताब्दी तक गंगा तथा होयसल वंशों के संरक्षण में कुर्ग (कोडगु) जैन धर्म का अभेद्य दुर्ग रहा। असंख्य बसदियाँ (जैन मन्दिर) यहाँ फली-फूलीं। मडिकेरी किले के संग्रहालय में संरक्षित खण्डित मूर्तियाँ उस स्वर्णिम युग की साक्षी हैं। समय के प्रचण्ड प्रहारों से विलुप्तप्राय इस वैभव को पुनः जीवित करने का महायज्ञ अब पूर्ण वेग से चल रहा है। मार्च 2020 में प्रारम्भ यह निर्माण, अब अस्सी प्रतिशत तक पूर्ण हो चुका है। शिल्पकार अब भव्य गोपुरम की स्थापना में संलग्न हैं। इस धाम की वास्तुकला पल्लू, पाला होयसल शैली तथा राजस्थान की मकरन्द-नक्काशी का अनुपम संनाद है। स्तम्भों, तोरणों तथा शिखरों पर मिथकीय प्राणी, गज, मयूर, बाघ, अश्व, कल्पवृक्ष आदि की जीवन्त आकृतियाँ इस बारीकी से उकेरी जा रही हैं, मानो पत्थर स्वयं साँस ले रहे हों। गर्भगृह में मूलनायक भगवान पार्श्वनाथ की पाँच फुट ऊँची श्वेत-मरमर मूर्ति पद्मासन मुद्रा में विराजमान होगी, जो सौम्यता एवं तेज की अमृत-मूर्ति बनेगी। पद्मावती माता की असाधारण प्रतिमा तथा अन्य तीर्थंकर मूर्तियाँ भी यहाँ स्थापित होंगी। प्रतिदिन कावेरी के पावन जल से अभिषेक, पुष्प-शृंगार तथा सात्विक भोजन की व्यवस्था यहाँ की आध्यात्मिक ऊर्जा को और गहन बनाती है। आधुनिक सुविधाओं से युक्त कॉटेज, उपाश्रय तथा ध्यान-कक्ष श्रद्धालुओं को सुखद अनुभूति प्रदान करेंगे। बेंगलुरु से 260 किमी, मैसूर से 120 किमी तथा मंगलुरु से 150 किमी की दूरी पर स्थित यह तीर्थ भारत के आध्यात्मिक पर्यटन को नवीन आयाम प्रदान करेगा। यह धाम केवल दर्शन का स्थल नहीं, अपितु प्राचीन भारतीय शिल्प-कला तथा जैन दर्शन का सजीव साक्षात्कार है, एक ऐसा दीपस्तम्भ जो आगामी पीढ़ियों को उनकी मूल जड़ों से अविच्छिन्न जोड़े रखेगा। (घुमक्कड़ एवं स्वतंत्र लेखक) .../ 22 फरवरी /2026