नई दिल्ली (ईएमएस)। फाल्गुन मास में जब दिन और रात के तापमान में लगातार उतार–चढ़ाव होता रहता है, स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का बढ़ना आम बात है। इस दौरान पहाड़ों से आने वाली ठंडी हवाएं सर्दी, जुकाम और वायरल संक्रमण के जोखिम को बढ़ा देती हैं। ऐसे में आयुर्वेद मानता है कि इस समय बीमारी से बचने का सबसे प्रभावी तरीका है आहार में सही और समयानुकूल परिवर्तन। फाल्गुन को आनंद और उल्लास का महीना कहा जाता है, जब पीली सरसों लहलहाती है और वातावरण खुशियों से भर जाता है, लेकिन यही मौसम प्रतिरोधक क्षमता को सबसे अधिक कमजोर भी करता है। आयुर्वेद अनुसार फाल्गुन आरंभ होते ही शरीर में पित्त की वृद्धि होती है, जबकि कफ का शमन होने लगता है। इससे पाचन तंत्र पर दबाव बढ़ता है और रोगों की संभावना भी अधिक हो जाती है। इसलिए इस दौरान ऐसी चीजों से बचना चाहिए जो पचने में भारी हों। चने का सेवन इस मास में वर्जित माना गया है क्योंकि यह भारी और गैस उत्पन्न करने वाला खाद्य है, जबकि फाल्गुन में पाचन अग्नि सामान्य से कमजोर रहती है। चना कब्ज, गैस व अपच जैसी समस्याओं को बढ़ा सकता है। इसी तरह बासी, तैलीय और तामसिक भोजन का सेवन भी इस मौसम में उचित नहीं माना जाता। आध्यात्मिक महत्व की दृष्टि से भी यह समय महत्वपूर्ण है, क्योंकि महाशिवरात्रि के कारण पूरा महीना सात्त्विक जीवनशैली अपनाने के लिए उत्तम माना जाता है। अब बात करते हैं कि इस समय आहार में क्या शामिल करना चाहिए। आयुर्वेद के अनुसार फाल्गुन मास में बेर और अंगूर का सेवन अत्यंत लाभकारी है। दोनों फलों में प्राकृतिक ठंडक प्रदान करने वाले तत्व मौजूद होते हैं, जो शरीर के तापमान को संतुलित करते हैं। ये रक्त को शुद्ध करते हैं, पित्त वृद्धि को नियंत्रित करते हैं और मौसमी बीमारियों से रक्षा करने में सहायक होते हैं। इसके नियमित सेवन से प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है और शरीर संक्रमणों से लड़ने में सक्षम बनता है। इसके अलावा, इस समय प्रकृति के नियमों के अनुरूप चलना भी स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण है। सुबह जल्दी उठना, हल्का व्यायाम करना और दिनचर्या में थोड़ी सक्रियता बढ़ाना शरीर की ऊर्जा को संतुलित रखता है। आयुर्वेद कहता है कि ऋतु परिवर्तन के अनुसार भोजन और जीवनशैली में किए गए छोटे-छोटे बदलाव भी बड़े रोगों से बचाव कर सकते हैं। सुदामा/ईएमएस 22 फरवरी 2026