23-Feb-2026
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भारत ने साफ कहा- एआई पर सिर्फ कुछ अमीर देशों या बड़ी टेक कंपनियों का एकाधिकार नहीं नई दिल्ली,(ईएमएस)। चीन कल तक सीमा पर आंखें दिखाता था और हर बात पर ऐंठता था, वह आज भारत के बनाए नियमों पर कदमताल कर रहा है। बांग्‍लादेश जैसा जो पड़ोसी कभी-कभार दूसरे देशों के बहकावे में आ जाते थे, वो आज दोस्‍ती का हाथ बढ़ा रहे हैं। दिल्ली में एआई इम्पैक्ट समिट हुई। इसके बाद जो डेक्‍लेरशन जारी किया गया, उस पर दुनिया के 89 देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के हस्ताक्षर थे। इसमें चीन है तो बांग्‍लादेश भी…89 देशों का एक मंच पर आना और भारत के नेतृत्व को स्वीकार करना यह बताता है कि आज वैश्विक मंच पर भारत का कद कितना ऊंचा हो रहा है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका-यूरोप हमेशा से तकनीक को अपनी बपौती मानते आए हैं। उनका मानना है कि जो तकनीक बनाएगा, वही उसका मालिक होगा और मुनाफा कमाएगा, लेकिन भारत ने दुनिया के सामने एक अलग विजन रखा है। एआई फॉर ऑल यानी सबके लिए एआई। भारत ने साफ कर दिया कि एआई सिर्फ कुछ अमीर देशों या बड़ी टेक कंपनियों का एकाधिकार नहीं हो सकता। इसका फायदा दुनिया के हर इंसान को मिलना चाहिए। इस मंत्र ने अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, और एशिया के उन तमाम देशों का दिल जीत लिया, जिन्हें डर था कि एआई की रेस में वे कहीं पीछे न छूट जाएं। रिपोर्ट के मुताबिक चीन अमूमन भारत के हर अंतरराष्ट्रीय प्रयास में अड़ंगा लगाता है। चाहे वह यूएन की परमानेंट मेंबरशिप हो या संयुक्त राष्ट्र में किसी आतंकी को बैन करने का मुद्दा, वही चीन एआई के मुद्दे पर भारत के साथ एक ही मंच पर खड़ा है। ऐसा क्यों? चीन ने अपनी अति-महत्वाकांक्षी योजना के तहत पाकिस्तान में जो करोड़ों डॉलर का निवेश किया था, जिसे सीपीईसी या चीन-पाक आर्थिक गलियारा कहा जाता है, उसका काम चीन ने करीब रोक दिया है। पाकिस्तान में चीनी इंजीनियरों पर हो रहे आतंकी हमले और पाकिस्तान की कंगाली ने चीन को यह समझा दिया है कि एक फर्जी और असफल देश के कंधे पर बंदूक रखकर वह एशिया का चौधरी नहीं बन सकता। रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका और यूरोप पहले ही चाइनीज एआई और सेमीकंडक्टर कंपनियों पर कड़े प्रतिबंध लगा चुके हैं। चीन जानता है कि अगर वह भारत की अगुवाई वाले इस ग्लोबल एआई 88 से बाहर रहा, तो वह दुनिया की भविष्य की तकनीक की मुख्यधारा से कट जाएगा। चीन एक व्यापारी देश है। वह उसी की इज्जत करता है जिसके पास पैसा और बाजार है। आज भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था है। चीन को समझ आ गया है कि भारत से अड़कर या उसे नजरअंदाज करके वह ग्लोबल सप्लाई चेन में अपनी गिरती साख को नहीं बचा सकता। इस घोषणा-पत्र का समर्थन करने वालों में बांग्लादेश का नाम आना भारत के लिए कूटनीतिक रूप से बहुत मायने रखता है। आपको याद होगा कि पिछले कुछ समय से बांग्लादेश में राजनीतिक उथल-पुथल रही है। कई बार ऐसी रिपोर्ट्स भी आईं कि वहां की सियासत में कुछ भारत-विरोधी सुर उठ रहे हैं या विदेशी ताकतें जैसे चीन या अमेरिका वहां अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रही हैं, लेकिन जब बात भविष्य की आई, जब बात ‘एआई’ के विकास और अपनी अर्थव्यवस्था को बचाने की आई, तो बांग्लादेश को समझ आ गया कि उसका सच्चा और भरोसेमंद साथी नई दिल्ली ही है। यह दिखाता है कि दक्षिण एशिया में भारत की ‘नेबरहुड फर्स्ट’ नीति मजबूती से काम कर रही है। बांग्लादेश जानता है कि अगर उसे अपने युवाओं को नौकरियां देनी हैं और एक आधुनिक इकॉनमी बनना है, तो उसे भारत के डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे यूपीआई और एआई फ्रेमवर्क का हिस्सा बनना ही होगा। भारत का विजन ऐसा है, जो छोटे देशों की सॉवरेनिटी का सम्मान करता है। बांग्‍लादेश को यह बात समझ आ रही है। सिराज/ईएमएस 23फरवरी26 -----------------------------------