अमेरिका के नॉर्थ कैरोलिना राज्य के शार्लोट स्थित सेंट्रल चर्च के वरिष्ठ पादरी लोरन लिविंगस्टन ने अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भाषा और उनके सार्वजनिक आचरण को लेकर कड़ी आपत्ति जताई है। हालिया धर्मोपदेश में उन्होंने कहा, देश के सर्वोच्च पद पर आसीन व्यक्ति को संयमित, शालीन और मर्यादित भाषा का प्रयोग करना चाहिए। उनका कहना था, नेतृत्व केवल नीतियों और निर्णयों से नहीं होता है। बल्कि स्वयं के चरित्र, व्यवहार और वाणी से व्यक्ति की पहचान होती है। हर सफल व्यक्ति के पीछे उसका चरित्र, व्यवहार और उसकी कही हुई बातें ही महत्व रखती हैं। अमेरिका में अब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को लेकर राजनीति के साथ-साथ धार्मिक क्षेत्र में भी बड़े पैमाने पर विरोध होने लगा है। पादरी लिविंगस्टन ने कहा, कि सार्वजनिक जीवन में अपमानजनक और अशोभनीय शब्दों का प्रयोग पूरे समाज को गलत संदेश देता है। उन्होंने पवित्र बाइबिल का हवाला देते हुए कहा, हृदय की प्रचुरता एवं संवेदनशीलता से ही मुख से बातें निकलती हैं। उन्होंने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को सीख देते हुए समझाया, व्यक्ति की भाषा ही उसके भीतर के विचारों और चारित्रिक मूल्यों को दर्शाती है। यदि नेता की वाणी कटु और अपमानजनक है, तो यह उसके आंतरिक दृष्टिकोण को प्रकट करती है। उन्होंने स्पष्ट किया, राजनीतिक विचारधारा और ईसाई आस्था को एक-दूसरे के समान नहीं माना जा सकता है। डोनाल्ड ट्रंप अपने आप को ‘रूढ़िवादी’, ‘जीवन समर्थक’ या ‘बाइबिल आधारित परिवार का समर्थक’ बताना उन्हें सच्चा ईसाई नहीं बनाता है। उन्होंने नस्लीय आधार पर धर्म को विभाजित करने की प्रवृत्ति पर भी भारी नाराजगी व्यक्त की है। उन्होंने कहा, मसीही समुदाय में श्वेत ओर अश्वेत जैसी अलग पहचान नहीं है। बिना किसी भेदभाव के जो व्यक्ति ईसा मसीह पर विश्वास करता है, यह विश्वास ही उन्हें सच्चा मसीही बनाता है। सभी में मसीह हैं और मसीह एक ही है। उनके इस बयान के बाद अमेरिका में राजनीतिक, धार्मिक, सामाजिक एवं राजनीतिक मुद्दों पर बहस तेज हो गई है। पादरी के इस बयान की बड़ी तीव्र प्रतिक्रिया अमेरिका में हो रही है। पादरी के इस बयान के बाद अमेरिका में ट्रंप के खिलाफ संसद से लेकर सड़क तक एक नाराजगी देखने को मिल रही है। अमेरिका के नागरिक और धर्म समर्थकों के बीच इसकी बड़ी तीव्र प्रक्रिया हुई है। अमेरिका के नागरिक पादरी के बयान को नैतिक मूल्यों की रक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण नसीहत मान रहे हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप जिस तरह से विभिन्न राज्यों के नागरिकों के साथ अलग व्यवहार कर रहे हैं, अमेरिकी समाज को उन्होंने कई हिस्सों में बांट दिया है। मानों सब एक-दूसरे के खिलाफ खड़े हुए हैं। यह अमेरिका की संस्कृति और सामाजिक व्यवस्था के कहीं से भी अनुकूल नहीं है। ईसाई धर्म में जिस तरह की वैमनस्यता आपस में फैलाई जा रही है। उसका अमेरिका जैसे स्वतंत्र और लोकतांत्रिक देश में कोई स्थान नहीं है। लोग महंगाई और बेरोजगारी से परेशान हैं। उनके पास रहने को अपना घर नहीं, खाने को भोजन नहीं है। अमेरिका की आधी से ज्यादा आबादी अपना जीवन-यापन नहीं कर पा रही है। ऐसी स्थिति में अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का बड़बोलापन, लगातार बढ़ते टैक्स, शासकीय और प्रशासकीय प्रताड़ना अब अमेरिका के लोगों को बर्दाश्त नहीं हो रही हैं। जिस तरह की अभद्र भाषा का उपयोग ट्रंप करते हैं, बात-बात में जिस तरीके की धमकियां देते हैं, उसको लेकर आज अमेरिका ऐसी स्थिति में खड़ा हो गया है। जहां से बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा है। ऐसी स्थिति में पादरी का यह कहना, राष्ट्रपति का व्यवहार आम नागरिकों के साथ कैसा हो, यह समय की मांग है। डोनाल्ड ट्रंप यदि पादरी की नसीहत को नहीं समझ पाए, ऐसी स्थिति में उन्हें अपने पद पर बने रहना मुश्किल हो सकता है। क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। पादरी के बयान की ट्रंप समर्थक आलोचना कर ट्रंप का बचाव करने की कोशिश कर रहे हैं। ट्रंप समर्थक और आलोचक इसे एक राजनीतिक टिप्पणी मान रहे हैं। किंतु पादरी ने जिस मुखरता और नाराजगी के साथ धर्म का पक्ष रखते हुए ट्रंप को नसीहत दी है, उसकी प्रतिक्रिया अमेरिका के राजनेताओं एवं आम जनता के बीच देखने को मिल रही है। जब बड़े-बड़े धर्मगुरु ही सत्ता के विरोध में खड़े हो जाएं, ऐसी स्थिति में सत्ता को बचाए रखना आसान नहीं होता है। ईएमएस / 25 फरवरी 26