लेख
25-Feb-2026
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- नाम परिवर्तन के फैसले के लाभ-हानि, चुनावी असर और भाजपा के संभावित फायदे की पड़ताल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय कैबिनेट बैठक में केरल का नाम बदलकर ‘केरलम’ करने के प्रस्ताव को मंजूरी मिलना केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि सांस्कृतिक, राजनीतिक और संवैधानिक बहस का विषय बन गया है। यह फैसला उस प्रस्ताव की अगली कड़ी है जिसे राज्य विधानसभा पहले ही पारित कर चुकी थी। अब प्रश्न यह है कि इस नाम परिवर्तन से राज्य को वास्तविक लाभ क्या होंगे, संभावित हानियां क्या हो सकती हैं, इसका चुनावी राजनीति पर क्या असर पड़ेगा और क्या इससे भारतीय जनता पार्टी को कोई राजनीतिक फायदा मिल सकता है। सबसे पहले लाभ की बात करें तो समर्थकों का तर्क है कि ‘केरलम’ नाम राज्य की भाषाई और सांस्कृतिक पहचान के अधिक अनुरूप है। मलयालम भाषा में राज्य को ‘केरलम’ कहा जाता है, इसलिए यह परिवर्तन स्थानीय अस्मिता और आत्मसम्मान को मजबूती देता है। भारत में पहले भी कई राज्यों ने अपनी ऐतिहासिक या भाषाई पहचान के अनुरूप नाम बदले हैं—जैसे ओडिशा (पूर्व नाम उड़ीसा) और उत्तराखंड (पूर्व नाम उत्तरांचल)। इन उदाहरणों से यह तर्क दिया जाता है कि नाम परिवर्तन कोई असामान्य कदम नहीं, बल्कि समय के साथ पहचान के परिष्कार की प्रक्रिया है। दूसरा संभावित लाभ सांस्कृतिक ब्रांडिंग का है। ‘केरलम’ नाम पर्यटन, आयुर्वेद, बैकवाटर्स और पारंपरिक कला रूपों की वैश्विक पहचान को स्थानीय भाषा से जोड़ सकता है। जब कोई राज्य अपनी मूल सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को आधिकारिक रूप देता है तो वह अपने नागरिकों में गौरव की भावना उत्पन्न करता है। इससे प्रवासी समुदाय, विशेषकर खाड़ी देशों में काम कर रहे लाखों मलयाली लोगों के बीच भावनात्मक जुड़ाव भी मजबूत हो सकता है। यह मनोवैज्ञानिक लाभ सीधे आर्थिक लाभ में बदले या न बदले, लेकिन सामाजिक आत्मविश्वास को बढ़ाने में भूमिका निभा सकता है। हालांकि, इसके साथ कुछ व्यावहारिक चुनौतियां और संभावित हानियां भी जुड़ी हैं। नाम बदलने की प्रक्रिया में प्रशासनिक दस्तावेजों, शैक्षणिक प्रमाणपत्रों, सरकारी वेबसाइटों, कानूनी अभिलेखों और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय समझौतों में संशोधन की आवश्यकता होगी। यह प्रक्रिया समय और संसाधन दोनों लेती है। आलोचकों का कहना है कि जब राज्य बेरोजगारी, बाढ़ प्रबंधन, कर्ज बोझ और बुनियादी ढांचे जैसी चुनौतियों से जूझ रहा हो, तब नाम परिवर्तन प्राथमिकता नहीं होना चाहिए। उनका तर्क है कि इससे प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ सीमित हैं, जबकि प्रशासनिक लागत वास्तविक है। चुनावी असर के संदर्भ में यह निर्णय दिलचस्प है। केरल में लंबे समय से वामपंथी दलों और कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन का वर्चस्व रहा है। भाजपा यहां अब तक सीमित प्रभाव ही बना पाई है। ऐसे में यदि नाम परिवर्तन का निर्णय केंद्र सरकार की मंजूरी से आगे बढ़ता है, तो भाजपा इसे “संस्कृति के सम्मान” और “संविधान सम्मत प्रक्रिया” के रूप में प्रस्तुत कर सकती है। यह संदेश देने की कोशिश हो सकती है कि केंद्र क्षेत्रीय पहचान के खिलाफ नहीं, बल्कि उसके साथ है। इससे भाजपा को यह नैरेटिव गढ़ने का अवसर मिल सकता है कि वह केवल हिंदी पट्टी की पार्टी नहीं, बल्कि दक्षिण भारत की आकांक्षाओं को भी समझती है। लेकिन यह भी ध्यान रखना होगा कि केरल की राजनीति अत्यंत जागरूक और वैचारिक रूप से परिपक्व मानी जाती है। यहां मतदाता केवल प्रतीकात्मक मुद्दों पर वोट नहीं देते, बल्कि सामाजिक न्याय, शिक्षा, स्वास्थ्य और धर्मनिरपेक्षता जैसे मुद्दों को प्राथमिकता देते हैं। इसलिए केवल नाम परिवर्तन से चुनावी समीकरणों में बड़ा बदलाव आ जाए, यह मान लेना जल्दबाजी होगी। हां, यह भाजपा के लिए एक संवाद का द्वार खोल सकता है, जिससे वह राज्य की सांस्कृतिक भावनाओं के प्रति संवेदनशील दिखे। भाजपा के संभावित फायदे पर यदि विस्तार से विचार करें तो यह निर्णय उसे दक्षिण भारत में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने का अवसर दे सकता है। पार्टी यह तर्क रख सकती है कि उसने राज्य विधानसभा की इच्छा का सम्मान किया और संवैधानिक प्रक्रिया के तहत कदम उठाया। इससे वह उन मतदाताओं को आकर्षित करने की कोशिश कर सकती है जो क्षेत्रीय पहचान और राष्ट्रीय एकता के बीच संतुलन चाहते हैं। साथ ही, यह विपक्ष के उस आरोप को भी कमजोर कर सकता है कि केंद्र सरकार राज्यों की स्वायत्तता की अनदेखी करती है। दूसरी ओर, विपक्ष इसे “प्रतीकात्मक राजनीति” बताकर जनता के वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाने का आरोप लगा सकता है। यदि राज्य में आर्थिक या सामाजिक समस्याएं बनी रहती हैं, तो नाम परिवर्तन का मुद्दा जल्दी ही पृष्ठभूमि में चला जाएगा। इसलिए चुनावी लाभ तभी संभव है जब इसे व्यापक विकास और सुशासन के एजेंडे के साथ जोड़ा जाए। एक और महत्वपूर्ण पहलू राष्ट्रीय स्तर का है। यदि संसद में यह विधेयक पारित होता है, तो यह संदेश जाएगा कि भारत की संघीय संरचना में राज्यों की सांस्कृतिक पहचान को मान्यता देने की परंपरा जारी है। इससे अन्य राज्यों में भी समान मांगें तेज हो सकती हैं, जैसा कि पश्चिम बंगाल द्वारा ‘बांग्ला’ नाम के प्रस्ताव के मामले में देखा गया था। हालांकि हर प्रस्ताव का मूल्यांकन अलग राजनीतिक और कूटनीतिक संदर्भ में होगा। अंततः यह कहा जा सकता है कि ‘केरल’ से ‘केरलम’ का नाम परिवर्तन भावनात्मक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन इसके आर्थिक और प्रशासनिक प्रभाव सीमित और मिश्रित रहेंगे। चुनावी राजनीति में इसका असर परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।यदि इसे क्षेत्रीय सम्मान और विकास के व्यापक विमर्श से जोड़ा गया तो भाजपा को सीमित लेकिन प्रतीकात्मक लाभ मिल सकता है; यदि यह केवल नाम तक सीमित रहा तो इसका प्रभाव भी प्रतीकात्मक ही रहेगा। लोकतंत्र में नाम केवल पहचान का माध्यम है, असली कसौटी नीतियों और उनके परिणामों से तय होती है। (L 103 जलवंत टाऊनशिप पूणा बॉम्बे मार्केट रोड, नीयर नन्दालय हवेली सूरत मो 99749 40324 वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार स्तम्भकार) ईएमएस / 25 फरवरी 26