राष्ट्रीय
27-Feb-2026
...


नई दिल्ली (ईएमएस)। अनेक परंपराओं और विशिष्टता के कारण मंदिर भारतीय संस्कृति की विविधता और आध्यात्मिक गहराई को और अधिक रोचक बनाते हैं। इन परंपराओं का आधार न तो सामाजिक विवाद है और न ही किसी प्रकार का भेदभाव, बल्कि ये सभी रीति-रिवाज देवी-उपासना, प्रतीकात्मकता और आध्यात्मिक मान्यताओं पर आधारित हैं। केरल का प्रसिद्ध अट्टुकल भगवती मंदिर, जिसे अक्सर महिलाओं का सबरीमाला भी कहा जाता है, इसका सबसे प्रमुख उदाहरण है। यहां हर साल आयोजित होने वाले अट्टुकल पोंगल उत्सव में लाखों महिलाएं देवी की आराधना करने के लिए एकत्र होती हैं। इस दौरान पुरुषों का प्रवेश प्रतिबंधित रहता है, क्योंकि यह अनुष्ठान देवी के उग्र, रक्षात्मक और स्त्री शक्ति के सामूहिक रूप का प्रतीक माना जाता है। इसी तरह केरल का चक्कुलाथुकावु मंदिर अपनी अनोखी नारी पूजा के लिए जाना जाता है, जहां महिलाओं को देवी का स्वरूप मानकर पूजा की जाती है और मंच पर स्त्री ऊर्जा ही प्रमुख रहती है। राजस्थान के पुष्कर में स्थित ब्रह्मा मंदिर में भी कुछ विशेष पूजा स्थलों पर विवाहित पुरुषों का प्रवेश वर्जित है। यह परंपरा पौराणिक घटनाओं से जुड़ी है और सदियों से चली आ रही आस्था के कारण आज भी निभाई जाती है। वहीं असम का मां कामाख्या मंदिर स्त्री-शक्ति और प्रजनन क्षमता के प्रतीक के रूप में पूरे विश्व में अद्वितीय माना जाता है। अंबुबाची मेले के दौरान मंदिर तीन दिनों के लिए बंद रहता है, जिसे देवी के मासिक धर्म का संकेत माना जाता है और इस दौरान पुरुषों के प्रवेश पर भी रोक रहती है। वृंदावन का संतोषी माता मंदिर भी ऐसी ही धार्मिक मान्यता का केंद्र है, जहां कुछ अवसरों पर पुरुषों को गर्भगृह में प्रवेश नहीं दिया जाता और पूजा का पूरा महत्व महिलाओं को ही दिया जाता है। तमिलनाडु के कुछ भगवती मंदिरों में भी विशेष अनुष्ठानों के समय पुरुषों के प्रवेश पर पारंपरिक रोक रहती है, क्योंकि यहां देवी को कुंवारी रूप में पूजा जाता है, जिसका संबंध पवित्रता और स्वतंत्र स्त्री शक्ति से है। इन मंदिरों की परंपराएं भारत की धार्मिक विविधता को दर्शाती हैं, जहां आस्था और आध्यात्मिकता का हर रंग अपनी अनूठी मान्यता के साथ मौजूद है। मालूम हो कि भारत के धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरों में जहां एक ओर कुछ मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध की चर्चा होती है, वहीं दूसरी ओर देश में कई ऐसे मंदिर भी हैं जहां पुरुषों को विशेष अवसरों पर या मंदिर के कुछ हिस्सों में प्रवेश की अनुमति नहीं होती। सुदामा/ईएमएस 27 फरवरी 2026