नई दिल्ली (ईएमएस)। आपने कभी सोचा है कि ट्रैक्टर के पीछे के पहिए आगे की तुलना में काफी बड़े क्यों होते हैं? आमतौर पर लोग इसे सिर्फ डिजाइन का हिस्सा समझते हैं, जबकि इसके पीछे वैज्ञानिक और तकनीकी दोनों कारण छिपे होते हैं। सबसे पहले बात करते हैं स्थिरता और ताकत की। ट्रैक्टर भारी मशीनरी है और खेतों की कठिन परिस्थितियों में काम करता है। ऐसे में आवश्यक होता है कि वह न सिर्फ मजबूत हो, बल्कि संतुलित भी रहे। बड़े पीछे के पहिए ट्रैक्टर के वजन को समान रूप से बांटने में मदद करते हैं। यह मशीन को अतिरिक्त स्थिरता देते हैं, खासकर तब जब ट्रैक्टर पर हल, रोटावेटर या ट्रॉली जैसी भारी चीजें लगी होती हैं। बड़े पहिए जमीन पर बेहतर पकड़ बनाते हैं, जिससे ट्रैक्टर फिसलता नहीं और नरम या कीचड़ भरी मिट्टी में धंसता भी नहीं। खेतों की सतह आम तौर पर ऊबड़-खाबड़ होती है। छोटे पहिए ऐसी सतहों पर चलते समय अधिक धंस सकते हैं या फंस सकते हैं। वहीं बड़े पहिए ज्यादा सतह क्षेत्र के कारण जमीन को समान रूप से दबाते हैं, जिससे ट्रैक्टर आसानी से आगे बढ़ पाता है। यह पहिए मशीन के पावर आउटपुट को भी बेहतर तरीके से उपयोग में लाते हैं, और इंजन द्वारा बनाई गई ऊर्जा सीधे पहियों की पकड़ में बदल जाती है। ट्रैक्टर में आगे और पीछे के पहियों का आकार अलग होना मोड़ लेने की क्षमता भी बढ़ाता है। छोटे आगे वाले पहिए ट्रैक्टर को आसानी से घुमाने में मदद करते हैं, जिससे खेतों की सीमित जगहों में भी ट्रैक्टर को मोड़ना सरल हो जाता है। वहीं बड़े पीछे के पहिए मोड़ लेते समय स्थिरता बनाए रखते हैं और मशीन का संतुलन बिगड़ने नहीं देते। इसके अलावा, पीछे के पहियों के बड़े होने का एक और फायदा ड्राइवर को मिलता है। इनकी ऊंचाई के कारण ट्रैक्टर का पिछला हिस्सा ऊपर उठ जाता है, जिससे ड्राइविंग सीट भी ऊंची हो जाती है। इससे चालक को खेत का व्यापक और साफ दृश्य मिलता है, जो काम को अधिक सटीक और आसान बनाता है। सुदामा/ईएमएस 27 फरवरी 2026