ज़रा हटके
01-Mar-2026
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टोक्यो (ईएमएस)। वैज्ञानिकों ने जापान के घने जंगलों में अनोखी चींटी की खोज की है। वैज्ञानिकों की इस ताजा खोज ने कीट जगत के स्थापित नियमों को पूरी तरह चुनौती दे दी है। चींटियों का समाज आमतौर पर बेहद अनुशासित होता है जहां रानी अंडे देती है, मजदूर भोजन जुटाते हैं और नर प्रजनन में भाग लेते हैं। लेकिन ‘टेम्नोथोरैक्स किनोमुराई’ नाम की यह दुर्लभ प्रजाति इन सभी परंपरागत नियमों को तोड़ते हुए केवल रानियों से बनी एक अनोखी कॉलोनी का निर्माण करती है, जिसमें न तो कोई नर होता है और न ही मेहनत करने वाले मजदूर। वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस प्रजाति की सबसे बड़ी खासियत इसका प्रजनन तरीका है। यूनिवर्सिटी ऑफ रेगेन्सबर्ग के शोधकर्ताओं ने जब लैब में इन चींटियों का विश्लेषण किया, तो वे यह देखकर हैरान रह गए कि एक भी नर चींटी मौजूद नहीं थी। रिसर्च में सामने आया कि ये रानियां ‘पार्थेनोजेनेसिस’ नामक प्रक्रिया के जरिए प्रजनन करती हैं, जिसमें बिना नर के ही अंडों से संतति पैदा होती है। यानी ये रानियां अपनी ही तरह का क्लोन तैयार करती हैं। माइक्रोस्कोपिक जांच में यह भी पता चला कि इनके शरीर में मौजूद प्रजनन अंग कभी इस्तेमाल ही नहीं किए गए, जो इस तथ्य को और मजबूत करता है कि उनकी पूरी वंशावली बिना नरों के ही चल रही है। लेकिन इस प्रजाति का व्यवहार जितना अनोखा है, उतना ही हैरान करने वाला भी। चूंकि इनके पास मजदूर वर्ग नहीं होता, इसलिए ये अपनी जरूरतों के लिए अन्य प्रजाति ‘टेम्नोथोरैक्स माकोरा’ के घोंसलों पर निर्भर रहती हैं। युवा रानियां चोरी-छिपे माकोरा प्रजाति के घोंसलों में प्रवेश करती हैं और यहां पहुंचकर या तो अपनी जहरीली डंक से असली रानी को खत्म कर देती हैं, या वहां के मजदूरों को इस कदर भ्रमित कर देती हैं कि वे खुद अपनी रानी का कत्ल कर देते हैं। इसके बाद किनोमुराई की रानियां उस घोंसले पर कब्जा कर लेती हैं और वहीं के मजदूरों को अपना गुलाम बनाकर अपनी संतानों की देखभाल करवाती हैं। ‘करंट बायोलॉजी’ जर्नल में प्रकाशित इस शोध के अनुसार, यह प्रजाति सामाजिक परजीविता के चरम स्तर पर पहुंच चुकी है। जर्मनी के वैज्ञानिक जुर्गन हेंज के अनुसार, किनोमुराई का विकास कीट जगत में एक बिल्कुल नया अध्याय जोड़ता है। आम रानियों की संततियों में मजदूर और नर दोनों शामिल होते हैं, लेकिन इस प्रजाति की रानी की सभी संततियां रानी ही बनती हैं। इस वजह से इनके पास नए घोंसलों पर कब्जा करने और अपनी आबादी बढ़ाने के अधिक अवसर होते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह का विकासात्मक लचीलापन इन चींटियों को बेहद शक्तिशाली बनाता है। सुदामा/ईएमएस 01 मार्च 2026