फाल्गुन मास की पूर्णिमा का पावन पर्व होली भारतीय संस्कृति में उल्लास, आस्था और नवजीवन का प्रतीक माना जाता है। रंगों और उमंगों से भरा यह त्योहार केवल सामाजिक उत्सव नहीं, बल्कि प्रकृति, कृषि और आध्यात्मिक चेतना से गहराई से जुड़ा हुआ है। इसी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपरा को पर्यावरणीय चेतना के साथ जोड़ते हुए गुजरात के प्रभास पाटण स्थित श्री सोमनाथ ट्रस्ट द्वारा 2 मार्च को वैदिक पद्धति से होलिका दहन का अनूठा आयोजन किया जा रहा है। देश के प्रथम ज्योतिर्लिंग सोमनाथ मंदिर के सानिध्य में आयोजित यह आयोजन परंपरा और प्रकृति के संरक्षण का सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करेगा। जब देशभर में होलिका दहन के लिए बड़ी मात्रा में लकड़ियों का उपयोग किया जाता है, तब प्रभास पाटण के चौपाटी मैदान में होने वाला यह वैदिक होलिका दहन पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी का संदेश देगा। वैदिक मंत्रोच्चार के साथ संपन्न होने वाले इस अनुष्ठान में केवल पारंपरिक और वैदिक सामग्री का उपयोग किया जाएगा। ट्रस्ट के अनुसार इसमें गौशाला की गौमाता के सूखे गोबर से बने उपले, गिर नस्ल की गाय का घी, समिधा काष्ठ, सात प्रकार के अनाज, कपूर तथा विभिन्न औषधीय द्रव्यों को आहुति के रूप में अर्पित किया जाएगा। इस प्रकार यह आयोजन न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र होगा, बल्कि आयुर्वेदिक और वैज्ञानिक दृष्टि से भी लाभकारी सिद्ध होगा। यह पहल देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा प्रतिपादित पर्यावरण अनुकूल जीवन शैली के विचार से प्रेरित है। प्रकृति के संरक्षण और संतुलन को जीवन का आधार मानते हुए ट्रस्ट निरंतर ऐसे उपक्रम चला रहा है, जिनसे समाज में जागरूकता बढ़े। होली जैसे लोकपर्व को भी पर्यावरण के अनुकूल बनाना उसी दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम है। रासायनिक रंगों और अंधाधुंध लकड़ी के उपयोग से होने वाली हानि को देखते हुए वैदिक पद्धति का यह आयोजन समाज को नई दिशा देने का प्रयास है। वैदिक होली को नवसस्येष्टि पर्व भी कहा जाता है। इसका अर्थ है नई फसल को अग्नि में अर्पित कर ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करना। भारतीय कृषक परंपरा में यह पर्व विशेष महत्व रखता है। खेतों में लहलहाती जौ और गेहूं की बालियां जब पककर तैयार होती हैं, तब किसान उन्हें होलिका की अग्नि में समर्पित कर समृद्धि और उर्वरता की कामना करते हैं। यह केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, बल्कि प्रकृति और मानव के बीच सामंजस्य का प्रतीक है। पलाश के फूलों से बने प्राकृतिक रंग, हल्दी और अन्य जड़ी-बूटियों का प्रयोग शरीर और पर्यावरण दोनों के लिए हितकारी माना गया है। होलिका दहन का पौराणिक आधार भी अत्यंत प्रेरक है। असुर राजा हिरण्यकश्यप के अत्याचार और उसके पुत्र प्रह्लाद की अटूट भक्ति की कथा भारतीय जनमानस में गहराई से रची-बसी है। जब अहंकार से अंधे हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र को दंडित करने के लिए बहन होलिका की सहायता ली, तब ईश्वर की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित बच गए और होलिका दहन हो गई। यह प्रसंग बुराई पर अच्छाई, अहंकार पर श्रद्धा और अन्याय पर सत्य की विजय का प्रतीक बन गया। इसी कारण होलिका दहन को केवल अग्नि प्रज्वलन नहीं, बल्कि अपने भीतर के अहंकार, ईर्ष्या और नकारात्मक प्रवृत्तियों को जलाने का प्रतीकात्मक अवसर माना जाता है। वेदों में अग्नि को पवित्रता और ऊर्जा का स्रोत माना गया है। अग्नि देवता को यज्ञ का वाहक और देवताओं तक आहुति पहुंचाने वाला कहा गया है। ऋतु परिवर्तन के समय जब वातावरण में अनेक प्रकार के जीवाणु और विषाणु सक्रिय होते हैं, तब यज्ञीय अग्नि और उसमें डाली जाने वाली औषधीय सामग्री से उत्पन्न धुआं वातावरण को शुद्ध करने में सहायक माना गया है। अरण्ड जैसे औषधीय गुणों वाले वृक्ष की लकड़ी तथा गाय के गोबर से बने उपलों के धुएं को भी कीटाणुनाशक बताया गया है। इस प्रकार होली का पर्व केवल धार्मिक भावना तक सीमित नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और पर्यावरण की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। हिन्दू पंचांग के अनुसार फाल्गुन शुक्ल पूर्णिमा के प्रदोष काल में होलिका दहन किया जाता है। बसंत पंचमी से इसकी तैयारी प्रारंभ होती है। गांवों और नगरों में खुले स्थान पर अरण्ड का वृक्ष स्थापित कर उसके चारों ओर लकड़ियां एकत्र की जाती हैं। बच्चे और युवा मिलकर इस प्रक्रिया में भाग लेते हैं, जिससे सामूहिकता और सहयोग की भावना विकसित होती है। दूसरे दिन रंगों के साथ होली खेली जाती है, जो जीवन में रंग, ऊर्जा और आनंद के महत्व को रेखांकित करती है। प्रभास पाटण में आयोजित होने वाला यह वैदिक होलिका दहन भक्तों को घर बैठे आहुति अर्पित करने की सुविधा भी प्रदान करेगा। श्रद्धालु न्यूनतम अर्पण राशि के माध्यम से अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर सकेंगे और अनुष्ठान के दर्शन भी कर पाएंगे। इससे देश-विदेश में बसे श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक रूप से जुड़ने का अवसर मिलेगा। आज जब पर्यावरण संकट और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियां विश्व के सामने खड़ी हैं, तब पारंपरिक पर्वों को प्रकृति के अनुकूल स्वरूप में मनाने की आवश्यकता और भी बढ़ जाती है। श्री सोमनाथ ट्रस्ट का यह प्रयास समाज को यह संदेश देता है कि आस्था और पर्यावरण संरक्षण परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं। यदि त्योहारों को विवेकपूर्ण ढंग से मनाया जाए तो वे सामाजिक समरसता, स्वास्थ्य और पर्यावरण संतुलन के संवाहक बन सकते हैं। होलिका दहन का यह वैदिक आयोजन न केवल प्रभास पाटण की धार्मिक गरिमा को और ऊंचा करेगा, बल्कि पूरे देश के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगा। यह पहल दर्शाती है कि परंपराओं का सम्मान करते हुए भी समय की आवश्यकता के अनुसार उनमें सकारात्मक परिवर्तन संभव है। जब आस्था के साथ जागरूकता जुड़ जाती है, तब पर्व केवल उत्सव नहीं रहते, बल्कि समाज निर्माण का माध्यम बन जाते हैं। इसी भावना के साथ इस वर्ष की होली पर्यावरण संरक्षण, आध्यात्मिक शुद्धि और नवजीवन का संदेश लेकर आएगी। (L 103 जलवंत टाऊनशिप पूणा बॉम्बे मार्केट रोड नियर नन्दालय हवेली सूरत मो 99749 40424 वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार स्तम्भकार) ईएमएस / 01 मार्च 26