लेख
01-Mar-2026
...


दिल्ली की राउज़ एवेन्यू कोर्ट ने पिछले दिनों विवादित दिल्ली आबकारी नीति मामले में अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया समेत सभी 23 आरोपियों को बरी कर दिया। अदालत ने सीबीआई द्वारा अदालत में पेश किये गये सबूतों को कमज़ोर और अपर्याप्त बताया और कहा कि आरोपियों की कोई आपराधिक साज़िश या इरादा साबित नहीं हुआ। अदालत ने कहा कि केवल दावे पर्याप्त नहीं होते बल्कि ठोस सबूत होने भी ज़रूरी हैं। अदालत ने कहा कि चार्जशीट में ख़ामियां हैं और कोई साक्ष्य भी नहीं मिला। इस अदालती फ़ैसले के बाद राजनैतिक हल्क़ों में हलचल तेज़ हो गयी है। ग़ौरतलब है कि दिल्ली की केजरीवाल सरकार ने नवंबर 2021 में नई आबकारी नीति लागू की थी। इस नीति का उद्देश्य शराब की बिक्री का निजीकरण कर ग्राहक सुविधा बढ़ाना और शराब की काला बाज़ारी रोकना बताया गया था। परन्तु जुलाई 2022 में मुख्य सचिव की रिपोर्ट में प्रक्रियागत ख़ामियां , मनमाने फ़ैसले और 500 करोड़ से अधिक का नुक़्सान बताते हुए दिल्ली के तत्कालीन एल जी, वी के सक्सेना ने सीबीआई जांच की सिफ़ारिश की। उस समय केंद्र सरकार की अधीनस्थ संस्थाओं सीबीआई और ईडी द्वारा यह आरोप लगाया गया कि दिल्ली सरकार के तत्कालीन आबकारी मंत्री मनीष सिसोदिया द्वारा इस नयी आबकारी नीति को निजी शराब कंपनियों को फ़ायदा पहुंचाने के लिए तैयार किया गया था। जिसमें 100 करोड़ के कैशबैक आम आदमी पार्टी के कई नेताओं को मिले। तत्कालीन मुख्य मंत्री अरविन्द केजरीवाल को इस पूरे मामले का मुख्य साज़िशकर्ता बताया गया। इसके बाद जुलाई 2022 में एलजी की सिफ़ारिश से ही अगस्त में सीबीआई व ईडी द्वारा केस रजिस्टर्ड किया गया तथा सितंबर में नयी आबकारी नीति रद्द कर दी गयी । इसी के बाद फ़रवरी 2023 में मनीष सिसोदिया को और मार्च 2024 में केजरीवाल को गिरफ़्तार कर लिया गया। अब जहाँ संबंधित अदालत द्वारा केजरीवाल व सिसोदिया समेत सभी 23 आरोपियों को बरी कर दिया गया हैं वहीं ख़बर यह भी है कि निचली अदालत के इस फ़ैसले को चुनौती देने हेतु सी बी आई संभवतः हाई कोर्ट का रुख़ कर सकती है। बहरहाल इस अदालती फ़ैसले के बाद विपक्ष एक बार फिर केंद्र सरकार पर हमलावर है। क्योंकि मोदी सरकार के दौरान ही अरविंद केजरीवाल के अलावा और भी कई विपक्षी दलों के मुख्यमंत्रियों और नेताओं पर ईडी, सीबीआई जैसी एजेंसियों ने कार्रवाई करने की कोशिश की। इनमें गिरफ़्तारियां भी हुईं, परन्तु अधिकांश मामलों में या तो ज़मानत मिली या मामले डिस्चार्ज हुये या फिर उन्हें अदालत से राहत मिली। उदाहरण स्वरूप झारखंड के मुख्यमंत्री पद पर आसीन हेमंत सोरेन को 2024 में ईडी द्वारा लैंड स्कैम और मनी लॉन्ड्रिंग जैसे मामलों में गिरफ़्तार किया गया। उन्हें सीएम पद से इस्तीफ़ा देकर जेल जाना पड़ा। उसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने 2026 में ईडी की कार्यवाही पर स्टे लगा दिया और वे रिहा होने के बाद पुनः मुख्यमंत्री बने। इसी तरह कर्नाटक की कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के विरुद्ध ईडी ने MUDA स्कैम में हाईकोर्ट ने जांच की मंज़ूरी तो दे दी परन्तु लोकायुक्त ने उन्हें क्लीन चिट दे दी। यूँही कभी केरल के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन को ईडी द्वारा 466 करोड़ रूपये का FEMA नोटिस जारी किया गया व कई कारण बताओ नोटिस जारी किये गये। परन्तु अभी तक कोई गिरफ़्तारी नहीं हो सकी। इसी तरह तेलंगाना के पूर्व मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव,डी शिवकुमार,पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी जैसे और भी कई नेताओं से ई डी व सी बी आई पूछताछ कर चुकी है। पिछले दिनों हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा को भी पंचकूला के एजेएल ज़मीन आवंटन मामले में पंजाब‑हरियाणा हाईकोर्ट से बड़ी राहत मिली है। अदालत ने सीबीआई की विशेष अदालत द्वारा हुड्डा के ख़िलाफ़ आरोप तय किए जाने के आदेश को रद्द कर दिया है और उन्हें “क्लीन चिट” दे दी। इसके आधार पर आरोप तय करने के सीबीआई कोर्ट के आदेश को ख़ारिज कर दिया गया। परन्तु केंद्र सरकार के अधीनस्थ कार्यरत ईडी, सी बी आई या आयकर जैसे विभाग विपक्षी नेताओं पर कोई न कोई आरोप मढ़कर उन्हें न केवल परेशानियों में डाल देते हैं बल्कि इस तरह के आरोपों से उनके राजनैतिक चरित्र को भी दाग़दार बनाने की पूरी कोशिश करते हैं। और सही मायने में जो वास्तव में भ्रष्ट होते हैं वे तो आनन् फ़ानन में दल बदल कर भजपाई वाशिंग मशीन से गुज़रकर चरित्रवान होने का प्रमाण पत्र हासिल कर लेते हैं। और भय वश उपजी इस प्रीत के बदले में उन्हें कहीं मुख्य मंत्री तो कहीं उपमुख्यमंत्री,मंत्री,सांसद या अन्य उच्च पदों पर सुशोभित कर दिया जाता है। आंकड़े यूँही नहीं बताते कि ईडी ने 2014 से लेकर अब तक क़रीब 121 प्रमुख नेताओं पर मामले रजिस्टर्ड किये इन में 95% विपक्षी नेता थे। और 2015 से 2025 तक ईडी द्वारा दर्ज 193 मामलों में केवल 2 ही दोष सिद्धियां हुईं। शेष अधिकांश मामलों में या तो अदालत ने आरोपियों को राहत दी या फिर सुबूतों के अभाव में मामले कमज़ोर पड़ गये। जहाँ तक केजरीवाल संबंधी अदालती निर्णय के बाद उपजी सियासत का सवाल है तो जहां अदालती फ़ैसला आते ही विपक्ष एकजुट होकर केजरीवाल के साथ खड़ा नज़र आ रहा था वहीँ केजरीवाल का बिलख बिलख कर रोते हुये मीडिया के सामने पेश होकर अपनी बेगुनाही का सुबूत देना चाह रहे थे। और हद तो तब हो गयी जबकि उसी दिन बुलाई गयी एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में वे उन्हें जेल भेजने वाली भाजपा से भी ज़्यादा कांग्रेस पर ही निशाना साधते नज़र आये। सत्ता से सवाल पूछने के बजाये वे यह कहते सुनाई दिये कि केजरीवाल जेल गया, क्या रॉबर्ट वाड्रा जेल गए? संजय सिंह जेल गए, क्या राहुल गांधी जेल गए? मनीष सिसोदिया जेल गए, क्या सोनिया गांधी जी जेल गईं? कांग्रेस किस मुंह से बात करती है, शर्म नहीं आती? ज़ाहिर है यह केजरीवाल की राजनीतिक बयानबाज़ी का ही एक हिस्सा था जिससे विपक्षी एकता कमज़ोर हुई। क्योंकि अब कांग्रेस भी पूछ रही है कि 30 से अधिक मामलों से जूझने वाले राहुल की आँखों में कभी आंसू नहीं आये तो केवल एक मामले का सामना करने में केजरीवाल का इसतरह मीडिया के सामने रोने का क्या अर्थ है? केजरीवाल के कांग्रेस विरोधी बयान को राजनैतिक विश्लेषक पंजाब, उत्तराखंड, गोवा व गुजरात में होने वाले आगामी चुनावों से जोड़कर भी देख रहे हैं। और इसे आप व भाजपा की कांग्रेस विरोधी संयुक्त रणनीति का हिस्सा बता रहे हैं। यही वजह है कि केजरीवाल संबंधी अदालती निर्णय के संकेत इसके सन्देश और इसके पीछे की सियासत आदि सभी पहलुओं को बहुत बारीकी से समझने की ज़रूरत है। तनवीर जाफ़री / 01 मार्च 26