लेख
01-Mar-2026
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- मतदाता सूची शुद्धिकरण में सुप्रीम कोर्ट की साख? पश्चिम बंगाल के इलेक्शन कमीशन द्वारा 28 फरवरी को जारी की गई फाइनल वोटर लिस्ट ने राज्य की सियासत में हलचल मचा दी है। स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) के बाद प्रकाशित इस सूची में कई जिलों से लाखों नाम हटा दिए गए हैं। मतदाता सूची से नाम कटने के बाद राजनीतिक दलों, सामाजिक संगठनों और आम मतदाताओं के बीच भारी प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। बड़े पैमाने पर पश्चिम बंगाल में विरोध शुरू हो गया है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार पश्चिम बंगाल के 7 करोड़ से अधिक मतदाताओं का सत्यापन चुनाव आयोग द्वारा कराया गया है। बांकुरा जिले में पहले लगभग 30.33 लाख मतदाता दर्ज थे। ड्राफ्ट रोल के बाद मतदाताओं की संख्या घटकर करीब 29 लाख रह गई। अंतिम सूची में लगभग सवा लाख नाम और कम हो गए हैं। वहीं सीमावर्ती नाडिया जिले में भी लाखों मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से अलग कर दिए गए हैं। यह मतदाता पिछले कई चुनाव से मतदान करते आ रहे थे। पश्चिम बंगाल की मतदाता सूची में करोड़ों नाम हटाए जा रहे हैं। मतदाता सूची के इन आंकड़ों ने सवाल खड़ा कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा समय पर जो निर्देश चुनाव आयोग को दिए गए थे, उनका पालन चुनाव आयोग के अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा क्यों नहीं किया गया? जिन दस्तावेजों को स्वीकार किया जाना था, वह स्वीकार नहीं किए गए। सॉफ्टवेयर की सहायता और माइक्रो ऑब्जाबर की रिपोर्ट पर मतदाता सूची से मतदाताओं के नाम हटा दिए गए हैं। एक विशेष वर्ग के मतदाताओं के नाम सबसे ज्यादा हटाए गए हैं। इस तरह के भी आरोप लगाए जा रहे हैं। केंद्रीय चुनाव आयोग के सेंट्रल सिस्टम के सॉफ्टवेयर से नाम हटाए जा रहे हैं। पश्चिम बंगाल में एसआईआर को लेकर फिर से एक नया विवाद शुरू हो गया है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर न्यायिक अधिकारी इस मामले की जांच कर रहे हैं, लेकिन जिस तरह से मतदाता सूची को लेकर विवाद बना हुआ है, इसी बीच चुनाव आयोग द्वारा पश्चिम बंगाल के चुनाव की तैयारी शुरू कर दी गई है। चुनाव आयोग की इस कार्यवाही से पश्चिम बंगाल में राजनीतिक दलों और मतदाताओं में तीव्र उग्र प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है। बिहार विधानसभा चुनाव के पहले से एसआईआर का यह मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है। अभी तक इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में अंतिम फैसला नहीं हो पाया है। चुनाव आयोग को एसएसआई करने का या नागरिकता तय करने का संवैधानिक अधिकार है,या नहीं। इस बात का आज तक फैसला नहीं हुआ। इसके बाद भी बिहार में विधानसभा के चुनाव हो गए। केंद्रीय चुनाव आयोग जिस तरह से चुनाव कराना चाहता था, उस तरह से वह चुनाव कराने में सफल रहा। चुनाव के दौरान कोई भी निष्पक्षता और पारदर्शिता का पालन चुनाव आयोग द्वारा नहीं किया गया। यह भी कई सुनवाई में साबित हो गया है। अब बिहार के तरह की स्थिति पश्चिम बंगाल में देखने को मिल रही है। जो मतदाता सूची प्रकाशित हुई है। इसके राजनीतिक प्रभाव भी दूरगामी होंगे। विपक्षी दलों का आरोप है, बड़े पैमाने पर नाम हटाए जाने से नागरिकों के मत का संवैधानिक अधिकार खत्म हो रहा है। चुनाव आयोग की कार्य प्रणाली में पारदर्शिता की कमी है। सुप्रीम कोर्ट में दायर की गई कुछ याचिकाओं में स्पष्ट रूप से सबूत के साथ गड़बड़ियों का उल्लेख भी किया गया है। सुप्रीम कोर्ट के आदेशों और निर्देशों का पालन चुनाव आयोग द्वारा नहीं किया गया है। चुनाव आयोग का कहना है, एसआईआर का उद्देश्य फर्जी, दोहरे या अपात्र मतदाताओं के नामों को हटाकर मतदाता सूची को शुद्ध और विश्वसनीय बनाना है। पश्चिम बंगाल के कई हिस्सों में विरोध प्रदर्शन और राजनीतिक बयानबाज़ी शुरू हो गई है। जो इस बात का संकेत है, मामला केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि जनभावना और नागरिकता के मौलिक अधिकार से जुड़ा हुआ है। चुनाव आयोग द्वारा जल्द विधानसभा चुनाव की अधिसूचना जारी करने की चर्चा तेज है। चुनाव आयोग ने जिस तरह से बिहार में एसआईआर प्रक्रिया के बीच चुनाव अधिसूचना जारी कर चुनाव करा दिए, यदि यही प्रक्रिया चुनाव आयोग पश्चिम बंगाल मैं अपनाएगा, तो इसके भीषण परिणाम भी देखने को मिले सकते हैं। तब से अब तक काफी पानी बह गया है। लोकतंत्र की बुनियाद मतदाता सूची की शुद्धता पर टिकी होती है। यदि सूची में त्रुटि है, जिन नागरिकों के नाम मतदाता सूची में थे, उनके नाम जबरिया हटा दिए जाते हैं तो इससे चुनाव की विश्वसनीयता प्रभावित होती है। मतदाता सूची में सुधार की प्रक्रिया पारदर्शी नहीं होगी, तो मतदाताओं और राजनीतिक दलों का विश्वास डगमगाता है। आवश्यक है, जिन मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं, उन्हें दावा-आपत्ति की स्पष्ट और सुलभ प्रक्रिया उपलब्ध कराई जाए। अधिकांश मतदाता रोज कमाने और खाने वाले होते हैं। वे पढ़े-लिखे भी नहीं होते हैं। ऐसी स्थिति में छोटी मोटी स्पेलिंग की त्रुटि या निवास स्थान में परिवर्तन इत्यादि को लेकर यदि नाम काटे जाते हैं, तो संविधान ने आम आदमी को बिना भेदभाव के मतदान का जो अधिकार दिया है, वह संवैधानिक अधिकार खत्म होता है। होना तो यह चाहिए था, चुनाव आयोग को एसआईआर कराने का अधिकार है, या नहीं। सुप्रीम कोर्ट को सबसे पहले इसका फैसला करना चाहिए था। सुप्रीम कोर्ट ने अभी तक इस पर कोई फैसला नहीं दिया है। पश्चिम बंगाल के आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग को गंभीरता के साथ विचार करना होगा। लोकतंत्र केवल मतदान का दिन नहीं, मतदाता को अपना प्रतिनिधि चुनने का अधिकार भी है। इस अधिकार को खत्म नहीं किया जा सकता है। यही लोकतंत्र का मूल आधार है। अब देखना यह है, संशोधित मतदाता सूची राज्य की राजनीति में कितना और किस तरह का प्रभाव डालती है। क्या इससे चुनावी समीकरणों में कोई बड़ा बदलाव लाने की तैयारी की जा रही है। इसको लेकर तरह-तरह की आशंकाएं एवं जन-रोष देखने को मिल रहा है। जो कानून व्यवस्था और नागरिक अधिकारों के लिए कहीं से भी अच्छा नहीं कहा जा सकता है। इस बात की गंभीरता को इसी बात से समझा जा सकता है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को स्वयं सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखना पड़ा। सुप्रीम कोर्ट ने जो दिशा निर्देश जारी किए थे, उसका भी पालन चुनाव आयोग के अधिकारियों-कर्मचारियों द्वारा नहीं किया गया। जिसके कारण सुप्रीम कोर्ट की साख भी दांव पर लगी हुई है। ईएमएस / 01 मार्च 26