-ईरान पर हमला.चीन तक धमक 21वीं सदी की वैश्विक राजनीति का केंद्रीय अक्ष आज अमेरिका और चीन के बीच बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा है। यह प्रतिस्पर्धा केवल सैन्य शक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि तकनीक, व्यापार, आपूर्ति-श्रृंखला, समुद्री मार्गों और वैश्विक संस्थानों के प्रभाव तक फैली हुई है। ऐसे समय में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए इस टकराव से कैसे अवसर भी निकाले। सबसे पहले, यह समझना आवश्यक है कि अमेरिका-चीन संबंध “प्रत्यक्ष युद्ध” की दिशा में नहीं, बल्कि “रणनीतिक प्रतिस्पर्धा” की दिशा में बढ़ रहे हैं। इंडो-पैसिफिक क्षेत्र, दक्षिण चीन सागर और ताइवान जलडमरूमध्य जैसे मुद्दे तनाव के केंद्र हैं। अमेरिका अपने सहयोगी देशों के साथ मिलकर क्षेत्रीय संतुलन बनाए रखना चाहता है, जबकि चीन आर्थिक और सैन्य शक्ति के आधार पर अपना प्रभाव बढ़ा रहा है। इसी संदर्भ में Quad (भारत, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया) जैसे मंच उभरे हैं, जिनका उद्देश्य मुक्त और समावेशी इंडो-पैसिफिक की अवधारणा को मजबूत करना है। भारत के लिए यह स्थिति एक दोधारी तलवार है। एक ओर, चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर तनाव ने भारत को सुरक्षा दृष्टि से अधिक सतर्क बना दिया है। रक्षा सहयोग, संयुक्त सैन्य अभ्यास और तकनीकी साझेदारी के माध्यम से अमेरिका के साथ संबंधों में गहराई आई है। इससे भारत की सामरिक क्षमता और समुद्री सुरक्षा मजबूत हुई है। दूसरी ओर, भारत को यह भी सुनिश्चित करना है कि वह पूरी तरह किसी एक ध्रुव में न बंधे, क्योंकि उसकी विदेश नीति की आधारशिला “रणनीतिक स्वायत्तता” रही है। आर्थिक दृष्टि से देखें तो अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा भारत के लिए अवसरों का द्वार भी खोलती है। “चाइना+1” रणनीति के तहत कई बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ अपनी आपूर्ति-श्रृंखला का विविधीकरण कर रही हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमीकंडक्टर, रक्षा विनिर्माण और हरित ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में भारत निवेश आकर्षित कर सकता है। उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (PLI) योजनाएँ इसी दिशा में एक प्रयास हैं। यदि भारत बुनियादी ढाँचे, श्रम-कौशल और लॉजिस्टिक्स में सुधार करता है, तो वह वैश्विक विनिर्माण का महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है। तकनीकी क्षेत्र में भी प्रतिस्पर्धा स्पष्ट है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, 5G, चिप निर्माण और साइबर सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में नियम और मानक तय करने की होड़ है। भारत ने डिजिटल सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए कुछ चीनी ऐप्स पर प्रतिबंध तो लगाया है और डेटा संप्रभुता पर जोर दिया है। किंतु यह भी सच है कि भारत का पूरा डाटा संसार एनड्रॉयड के आंगन में खेल रहा है।हम अभी भी 35-40 साल पुराने विनडोज और माईक्रोसाफ्ट पर निर्भर हैं। किसी भी दिन हमें फ्रीज किया जा सकता है। हालांकि उन्नत तकनीक में पश्चिमी देशों के साथ सहयोग के नए अवसर भी सामने आए हैं। परंतु भारत को आत्मनिर्भर तकनीकी आधार विकसित करने की दिशा में निरंतर निवेश करना होगा, ताकि वह केवल उपभोक्ता न रहे, बल्कि आत्मनिर्भर नवाचार का केंद्र भी बने। प्रति्परधी देशों की ऊर्जा नाकेबंदी,ईधन की सप्लाई में अवरोध और परिवहन पर नियंत्रण इस युद्ध का एक संभावित लक्ष्य हो सकता है।भारतीय नेतृत्व भी इस दबाव का शिकार हो सकता है। ऊर्जा और समुद्री मार्गों का प्रश्न भी महत्वपूर्ण है। खाड़ी क्षेत्र और दक्षिण चीन सागर में किसी भी प्रकार का तनाव भारत के व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा को प्रभावित कर सकता है। इसलिए भारत के लिए समुद्री सुरक्षा सहयोग, ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण और रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार की मजबूती आवश्यक है। अंततः, अमेरिका–चीन की प्रतिस्पर्धा भारत के लिए केवल चुनौती नहीं, बल्कि अवसर भी है। यदि भारत संतुलित कूटनीति, आर्थिक सुधार और तकनीकी क्षमता निर्माण पर ध्यान दे, तो वह इस वैश्विक शक्ति-संतुलन में एक स्वतंत्र और प्रभावशाली ध्रुव के रूप में उभर सकता है। भारत की ताकत उसकी बहु-संरेखीय विदेश नीति, लोकतांत्रिक मूल्यों और बढ़ती आर्थिक क्षमता में निहित है। यही संतुलन भविष्य में उसे वैश्विक राजनीति के इस जटिल दौर में स्थिर और सशक्त बना सकता है।तटस्थ और निर्गुट नीति से ही यह हासिल हो सकता है।क्या हम कायम रह सकते हैं। (लेखक स्वतंत्र विश्लेषक हैं) ईएमएस/01मार्च2026