दुनिया की नज़रें इस वक्त मध्य पूर्व के उस सुलगते बारूद पर टिकी हैं, जहाँ एक चिंगारी ने पूरे वैश्विक अमन-चैन को स्वाहा करने की ठान ली है। ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई की एक भीषण सैन्य हमले में हुई मृत्यु ने इस पूरे क्षेत्र को श्मशान में बदलने की कगार पर खड़ा कर दिया है। इस घटना के बाद ईरान के नए राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान ने जिस तरह से प्रतिशोध का बिगुल फूंका है, उससे साफ है कि अब यह केवल दो देशों की आपसी रंजिश नहीं रही। पेज़ेश्कियान का यह रुख कि वे अपने नेतृत्व की हत्या का बदला लेने के लिए अंतिम विकल्प तक जा सकते हैं, पूरी मानव सभ्यता के लिए एक प्रलयंकारी संकेत है। अगर हम निष्पक्ष होकर इस महासंकट का विश्लेषण करें, तो समझ आता है कि चंद शक्तिशाली नेताओं के अहंकारी फैसलों और व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं ने आज अरबों लोगों की सांसों को गिरवी रख दिया है। इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को यह गंभीरता से सोचना होगा कि क्या केवल मिसाइलों और लक्षित हत्याओं से इज़रायल कभी सुरक्षित हो पाएगा? इतिहास गवाह है कि रक्तपात हमेशा नई और अधिक भयानक नफरत को जन्म देता है। नेतन्याहू पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह आरोप लगता है कि वे अपने घरेलू राजनीतिक संकट और सत्ता की कुर्सी बचाने के लिए इस युद्ध की आग को जानबूझकर बुझने नहीं दे रहे हैं। उन्हें यह समझना चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय कानूनों की धज्जियाँ उड़ाकर और संप्रभु देशों के शीर्ष नेतृत्व को निशाना बनाकर हासिल की गई जीत असल में एक नैतिक हार है। इज़रायल की असली ताकत पड़ोसियों के साथ विश्वास की दीवार खड़ी करने में है, न कि डर का साम्राज्य फैलाने में। बेगुनाह बच्चों और आम नागरिकों की चीखें किसी भी आधुनिक राष्ट्र के लिए विजय का गान नहीं हो सकतीं। दूसरी ओर, डोनाल्ड ट्रम्प और उनकी आक्रामक विदेश नीति इस पूरे विवाद की जड़ में बारूद बिछाने का काम कर रही है। ट्रम्प के शासनकाल में लिए गए कठोर फैसलों और अब उनके युद्ध-समर्थक बयानों ने सुलह की रही-सही गुंजाइश को भी मटियामेट कर दिया है। एक वैश्विक महाशक्ति के रूप में अमेरिका का उत्तरदायित्व शांति स्थापना का होना चाहिए था, लेकिन ट्रम्प की धौंस और दबाव वाली नीति अक्सर समाधान के बजाय संकट को अधिक गहरा कर देती है। अमेरिका को यह समझना होगा कि दुनिया अब उनके एकतरफा आदेशों का दास नहीं है। हथियारों का बाजार गर्म करने और सैन्य गठबंधनों को उकसाने की होड़ ने कूटनीति की मेज को धराशायी कर दिया है। अगर अमेरिका ने एक पक्षपाती खिलाड़ी की भूमिका नहीं छोड़ी, तो वह इतिहास में एक शांति रक्षक नहीं बल्कि एक वैश्विक गृहयुद्ध के सूत्रधार के रूप में दर्ज होगा। ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान के लिए भी यह गहरे आत्ममंथन का समय है। एक राष्ट्र के रूप में अपने सर्वोच्च मार्गदर्शक को खोना निस्संदेह एक अपूरणीय क्षति है, लेकिन प्रतिशोध के आवेश में आकर पूरी दुनिया को परमाणु विभीषिका की धमकी देना किसी भी तर्क से उचित नहीं है। पेज़ेश्कियान को चाहिए कि वे कट्टरपंथियों के दबाव में आकर अपनी जनता को मौत की भट्टी में न झोंकें। ईरान को यह समझना होगा कि प्रॉक्सि वार और अस्थिरता फैलाने वाली नीतियां अंततः उसे ही दुनिया में अलग-अलग कर देंगी। युद्ध की हुंकार भरना आसान है, लेकिन जर्जर अर्थव्यवस्था और उजड़े हुए परिवारों को फिर से खड़ा करना असंभव होता है। उन्हें आक्रोश के बजाय संयम और कूटनीति के कठिन मार्ग को चुनना चाहिए ताकि ईरान का अस्तित्व बचा रह सके। इस संघर्ष का वैश्विक असर अब केवल तेल की कीमतों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हर इंसान की थाली तक पहुँच चुका है। होर्मुज जलडमरूमध्य और लाल सागर जैसे व्यापारिक मार्गों के बंद होने के डर ने दुनिया भर की सप्लाई चेन को पंगु बना दिया है। यदि यह तनाव पूर्ण युद्ध में बदलता है और रूस-चीन जैसे देश इसमें कूदते हैं, तो यह आधिकारिक रूप से तृतीय विश्व युद्ध का आगाज होगा। परमाणु युग में लड़ा जाने वाला यह युद्ध किसी को विजेता नहीं बनाएगा, बल्कि धरती पर केवल राख के ढेर और सन्नाटा छोड़ जाएगा। भारत का पक्ष इस पूरे विवाद में दुनिया के लिए एक मिसाल है। भारत की नीति हमेशा से संतुलित और मानवीय रही है। प्रधानमंत्री मोदी ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर बार-बार चेतावनी दी है कि यह युग युद्ध का नहीं है। भारत के लिए यह स्थिति किसी अग्निपरीक्षा से कम नहीं है क्योंकि हमारी ऊर्जा सुरक्षा और खाड़ी देशों में रहने वाले लगभग 90 लाख भारतीयों की जान सीधे इस खतरे की जद में है। भारत आज दुनिया का वह विरल देश है जो इज़रायल और ईरान, दोनों से संवाद करने का हौसला रखता है। निष्कर्ष यही है कि आज दुनिया को हथियारों की नुमाइश की नहीं, बल्कि संवेदनशील और दूरदर्शी नेतृत्व की जरूरत है। यदि इन तीनों देशों ने अपना अहंकार नहीं त्यागा, तो आने वाली पीढ़ियाँ इन्हें मानवता के हत्यारों के रूप में याद रखेंगी। (लेखक पत्रकार हैं ) ईएमएस / 02 मार्च 25