लेख
03-Mar-2026
...


(वैश्विक राजनीति में नैतिकता, हस्तक्षेप और उत्तरदायित्व का प्रश्न) बीसवीं सदी का मध्य मानव इतिहास का एक निर्णायक मोड़ था। जब संयुक्त राज्य अमेरिका ने अगस्त 1945 में जापान के नगर हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराए, तब केवल दो नगर नष्ट नहीं हुए, बल्कि पूरी मानव सभ्यता ने अपनी ही निर्मित विनाशकारी शक्ति का भयावह स्वरूप देखा। लाखों लोग तत्काल मारे गए और असंख्य लोग विकिरण के दीर्घकालिक प्रभाव से वर्षों तक पीड़ित रहे। इस घटना ने द्वितीय विश्व युद्ध को समाप्त करने में भूमिका निभाई, किंतु साथ ही यह प्रश्न भी छोड़ गई कि क्या किसी भी परिस्थिति में इतना व्यापक संहार उचित ठहराया जा सकता है। इसके बाद विश्व राजनीति ने एक नया रूप धारण किया। एक ओर संयुक्त राज्य अमेरिका था और दूसरी ओर सोवियत संघ। वैचारिक संघर्ष ने संसार को दो गुटों में विभाजित कर दिया। इसी पृष्ठभूमि में 1950 से 1953 तक चला कोरियाई युद्ध केवल कोरिया की भूमि का संघर्ष नहीं था, बल्कि दो विचारधाराओं की टकराहट था। इस युद्ध ने कोरियाई प्रायद्वीप को स्थायी रूप से दो भागों में बाँट दिया और असंख्य परिवारों को पीड़ा दी। इसके कुछ वर्षों बाद 1955 से 1975 तक चला वियतनाम युद्ध विश्व इतिहास के अत्यंत विवादास्पद संघर्षों में गिना जाता है। व्यापक बमवर्षा, रासायनिक पदार्थों का प्रयोग और ग्रामीण अंचलों का विध्वंस इस युद्ध की पहचान बन गए। इस संघर्ष ने न केवल वियतनाम को गहरी क्षति पहुँचाई, बल्कि संयुक्त राज्य अमेरिका के भीतर भी व्यापक जनविरोध और नैतिक मंथन को जन्म दिया। इक्कीसवीं सदी के प्रारंभ में 2003 में आरंभ हुआ इराक युद्ध इस तर्क के साथ प्रारंभ किया गया कि वहाँ व्यापक विनाश के हथियार मौजूद हैं और विश्व सुरक्षा को गंभीर खतरा है। किंतु समय के साथ ऐसे हथियारों के स्पष्ट प्रमाण सामने नहीं आए। परिणामस्वरूप इराक की राजनीतिक संरचना अस्थिर हो गई, सांप्रदायिक हिंसा में वृद्धि हुई और पूरे क्षेत्र में असुरक्षा का वातावरण फैल गया। 2001 से 2021 तक चला अफगानिस्तान का युद्ध आतंकवाद के विरुद्ध अभियान के रूप में प्रारंभ हुआ। उद्देश्य था उन शक्तियों को समाप्त करना जिन्हें वैश्विक शांति और सुरक्षा के लिए खतरा माना गया। परंतु दो दशकों के लंबे संघर्ष, भारी आर्थिक व्यय और असंख्य जनहानि के उपरांत भी स्थायी शांति स्थापित नहीं हो सकी। अंततः विदेशी सेनाओं की वापसी के बाद वही संगठन पुनः सत्ता में आ गया जिसे हटाने के लिए यह अभियान आरंभ किया गया था। मध्य और पश्चिम एशिया में उभरे उग्रवादी संगठन केवल किसी एक राष्ट्र की नीतियों का परिणाम नहीं थे। उनके उदय के पीछे क्षेत्रीय अस्थिरता, धार्मिक कट्टरता, आर्थिक विषमता, बाहरी हस्तक्षेप और सत्ता का रिक्त स्थान जैसे अनेक कारण रहे। फिर भी यह धारणा व्यापक है कि महाशक्तियों की नीतियों और युद्धों ने ऐसी परिस्थितियाँ निर्मित कीं जिनमें उग्रवाद को पनपने का अवसर मिला। लैटिन अमेरिका के अनेक देशों में भी बीसवीं सदी के दौरान राजनीतिक उथल-पुथल देखी गई। विभिन्न समयों पर बाहरी प्रभावों और गुप्त हस्तक्षेपों के आरोप लगे। कुछ स्थानों पर सैन्य शासन स्थापित हुए, तो कहीं लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ कमजोर पड़ीं। इन घटनाओं ने यह धारणा सुदृढ़ की कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में आदर्शों की अपेक्षा सामरिक और आर्थिक हितों को अधिक प्राथमिकता दी जाती है। तेल, प्राकृतिक संसाधन, व्यापार मार्ग और सामरिक ठिकाने आधुनिक विश्व व्यवस्था के महत्वपूर्ण घटक हैं। आलोचकों का मत है कि कई बार जनतंत्र, मानवाधिकार और शांति की भाषा इन हितों को वैध ठहराने का माध्यम बन जाती है। समर्थकों का तर्क है कि वैश्विक सुरक्षा, आतंकवाद-निरोध और सहयोगी राष्ट्रों की रक्षा भी समान रूप से आवश्यक चिंताएँ हैं। सत्य संभवतः इन दोनों दृष्टिकोणों के मध्य स्थित है। किसी भी राष्ट्र की विदेश नीति पूर्णतः नैतिक या पूर्णतः स्वार्थप्रधान नहीं होती; वह परिस्थितियों, आशंकाओं, अवसरों और रणनीतिक विचारों का सम्मिलित परिणाम होती है। फिर भी यह प्रश्न बार-बार उभरता है कि क्या राष्ट्रीय हित की रक्षा के नाम पर व्यापक जनसंहार और दीर्घकालिक अस्थिरता को स्वीकार किया जा सकता है। जनतंत्र और मानवाधिकार केवल औपचारिक शब्द नहीं होने चाहिए, बल्कि वे ऐसे सार्वभौमिक मूल्य बनें जिनका पालन मित्र और विरोधी—दोनों के प्रति समान रूप से किया जाए। यदि शक्ति का प्रयोग चयनात्मक नैतिकता के आधार पर किया जाएगा, तो विश्व समुदाय में अविश्वास, असंतोष और वैमनस्य की भावना प्रबल होगी। इतिहास यह शिक्षा देता है कि सैन्य विजय स्थायी समाधान प्रदान नहीं करती। स्थायी शांति संवाद, सहयोग, आर्थिक न्याय और सांस्कृतिक सम्मान से ही संभव होती है। किसी भी महाशक्ति की वास्तविक परीक्षा रणभूमि में नहीं, बल्कि इस तथ्य में निहित है कि वह अपनी शक्ति का उपयोग कितनी जिम्मेदारी, पारदर्शिता और मानवीय संवेदनशीलता के साथ करती है। आज का विश्व अब भी संघर्षों, प्रतिस्पर्धा और असुरक्षा से घिरा हुआ है। ऐसे समय में आवश्यक है कि अतीत की त्रासदियों से सीख लेकर भविष्य की नीतियों का निर्माण किया जाए। यदि मानव जीवन को सर्वोच्च मूल्य माना जाए और शक्ति को उत्तरदायित्व के साथ जोड़ा जाए, तभी एक अधिक न्यायपूर्ण, संतुलित और शांतिपूर्ण विश्व व्यवस्था की कल्पना साकार हो सकती है। (डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।) ईएमएस, 03 मार्च, 2026