नई दिल्ली (ईएमएस)। होली का त्यौहार हो और गुजिया की खुशबू न हो, ऐसा हो नहीं सकता। सुनहरी, घी में तली कुरकुरी परत और भीतर इलायची की महक वाला मावा सदियों की परंपरा को अपने अंदर समेटे हुए है। आधे चांद जैसी नजर आने वाली यह मिठाई आज भले ही उत्तर भारत की पहचान बन चुकी हो, लेकिन इतिहासकार इसके तार तुर्की से होने का दावा करते हैं। इतिहास के पन्नों के मुताबिक 13वीं शताब्दी के ग्रंथों में ‘गूंझा’ नामक पकवान का उल्लेख मिलता है, जिसे गुजिया का प्रारंभिक रूप माना जाता है। उस दौर में गुड़ और शहद के मिश्रण को आटे में भरकर सुखाने या तलने की परंपरा थी। भारतीय खाद्य इतिहासकार ने अपनी पुस्तकों में भरवां और तली हुई पेस्ट्री की भारतीय परंपरा का विस्तृत उल्लेख किया है। उनके अनुसार, त्यौहारों से जुड़ी ऐसी मिठाइयां सदियों से अलग-अलग क्षेत्रों में विकसित होती रही हैं। कुछ फूड हिस्टोरियंस गुजिया की अवधारणा को तुर्की की प्रसिद्ध डिश बकलावा से जोड़ते हैं, जो परतदार, मीठी और मेवों से भरी पेस्ट्री है। माना जाता है कि मध्य एशिया के व्यापारी जब भारत आए, तब वे समोसा और बकलावा जैसी डिशें साथ लाए। समय के साथ भारतीय रसोइयों ने मैदे की परतों और ड्राईफ्रूट्स वाली तकनीक को अपनाते हुए उसमें मावा (खोया) और स्थानीय स्वाद जोड़ा, जिससे गुजिया का नया रूप सामने आया। इतिहासकार बुंदेलखंड को गुजिया का गढ़ मानते हैं। मध्यकाल में यहां के शाही रसोइयों ने ‘चंद्रकला’ नामक गोल गुजिया तैयार की, जो धीरे-धीरे ब्रज और फिर उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश व बिहार तक फैल गई। 16वीं सदी में ब्रज क्षेत्र में भगवान कृष्ण को प्रसाद के रूप में चढ़ाया जाने लगा। भक्ति काल में 56 भोग की परंपरा में गुजिया और चंद्रकला जैसे पकवान शामिल थे। समय के साथ गुजिया का स्वरूप भी बदला। 13वीं सदी में सादा मीठा पकवान, 15वीं-16वीं सदी में मध्य एशियाई प्रभाव से मावा और मेवे की भरावन, मुगल काल में केसर और महंगे मेवों का शाही अंदाज और आज चॉकलेट, केसर व शुगर-फ्री जैसे आधुनिक संस्करण—गुजिया ने हर दौर में खुद को ढाला है। क्षेत्र के अनुसार इसके नाम और स्वाद भी बदलते गए। महाराष्ट्र और गुजरात में ‘करंजी’, बिहार-झारखंड में ‘पिड़किया’ और कर्नाटक में ‘कर्जीकाई’ के रूप में यह अलग-अलग पहचान के साथ लोकप्रिय है। इतिहास चाहे तुर्की से जुड़ा हो या बुंदेलखंड से, गुजिया की असली पहचान उसका स्वाद और खुशबू है, जो हर त्योहार में मिठास घोल देती है। आशीष दुबे / 03 मार्च 2026