जैसे ही आर्टिफिशल इंटेलीजेंट यानि कृत्रिम बुद्धिमता का प्रवेश हुआ वैसे ही युद्ध का दायरा इस कदर बढ़ा की अब परमाणु हमले की नौबत आ गईं ईरान को अमेरिका से क्या लेना देना था लेकिन जबरन कूद गया विज्ञान की प्रगति के साथ विश्वभर में चारों ओर विकास ने नई करवट ली है। विकास के नित नये आयामों से सभी देश अपनी समृद्धि को तीव्र वेग से आगे बढ़ाने में जुट गये हैं। जिसके कई सुखद परिणाम भी सामने आये हैं। विज्ञान ने चिकित्सा स्वास्थ्य, कृषि, उद्योग, यातायात, दूरसंचार, युद्ध उपकरणों इत्यादि सभी क्षेत्रों में आशातीत प्रगति की है और इस ओर अभी भी वैज्ञानिकों का प्रयास जारी है। इस कारण आधुनिक भौतिक साधनों ने इन्सानों का जीवन ही बदल दिया है। सभी देश विज्ञान के आधार पर अपने देश को प्रगतिशील,समृद्धशाली, शक्तिशाली बनाने की होड़ में लगे हुए हैं। इस होड़ अर्थात् प्रतिस्पर्धा को लेकर सभी देश अपनी सुरक्षा के लिए अस्त्रा-शस्त्रों का उत्पादन करने में जुट गये हैं।अमेरिका और ईरान के युद्ध में निर्दाेष नागरिकों की बहुत अधिक संख्या में जान जा रही है अस्त्र-शस्त्रों की बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण सम्पूर्ण विश्व चिंतन के सागर में डूबा हुआ है। इससे बचने के लिये सभी देश, जो स्वयं अपनी सुरक्षा के लिये चिंतित होने पर भी अस्त्रा-शस्त्रा के भंडारण में जुटे हुए होने के बाद भी विश्व शान्ति के लिये निःशस्त्रीकरण का राग अलापते थकनहीं रहे हैं।विध्वंशकारी अस्त्र-शस्त्रों से विनाश की स्थिति को जानते हुए भी कई देशों ने एक-दूसरे देश पर आक्रमण कर विनाश लीला का खुला तांडव खेला है। जिसके दुष्परिणामों ने असंख्य इन्सानों की जान ली है। वहाँ अनगिनत देश की समृद्धि की झलक दिखाने वाले निर्माण कार्यों को विध्वंश कर दिया है। चारों ओर तबाही मचाने में किसी प्रकार की कमी नहीं रखी है। विकास को विनाश में बदल दिया है। इस आक्रमणकारी नीति से बचने के लिये सभी अपने देश में शान्ति, खुशहाली, समृद्धि के पक्ष में निःशस्त्रीकरण की फिराक में रहते हैं और इसके लिए सभी देशों का जन समर्थन जुटाने में कटिबद्ध हैं। क्योंकि सभी को विनाश का खतरा सामने दिखाई देता है। आज दुनिया परमाणु युद्ध की तरफ बढ़ रहा है इसके परिणाम हम सभी जानते हैं 76 साल पहले 6 अगस्त 1945 को अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा शहर पर दुनिया का पहला परमाणु बम हमला किया था. इसके तीन दिन बाद जापान के ही नागासाकी शहर पर दूसरा परमाणु बम गिराया गया. दोनों शहर लगभग पूरी तरह तबाह हो गए. डेढ लाख से अधिक लोगों की पल भर में जान चली गई और जो बच गए वो अपंग हो गए और आज भी जो बच्चे जन्म लेते हैं वे अपंगता के शिकार होते हैं क्योंकि रेडिएशन का खतरा 100वर्षों य़ा इससे भी अधिक रहता है व जिसकी मार मासूम लोगों को भुगतना पड़ता है इसके लिये सभी देशों को निर्दाेष इन्सानों की रक्षा हेतु परमाणु निःशस्त्रीकरण का संकल्प लेने पर जोर दिया है ताकि कभी भी किसी देश पर आक्रमण करने की स्थिति ही नहीं बने। विश्व में अस्त्र-शस्त्रों की होड़ ही आक्रमणकारी बनाने का माध्यम बनती है। वहाँ इन्सान भी आवेश, आक्रोश,गुस्से, बदले की भावना, किसी को प्रताड़ित करने के उद्देश्य से, किसी का तिरस्कार करने, किसी को दंडित करने के लिये आक्रामक रुख अपनाते हुए आक्रमणकारी होता है तो उसके सामने, सामने वाले के विनाश के अलावा कुछ दिखाई नहीं देता है। आक्रमणकारी की चाह रहती है कि वह जो आक्रमण कर रहा है वह विफल न हो जावे व परमाणु बम के हमला की आशंका बढ़ जाती है । इस कारण इन्सान-इन्सान में घृणा, द्वेषभाव, ईर्ष्या, दुश्मनी आदि उत्पन्न होती है जो इन्सानों की सुख-शांति, अमनचैन छीनती है। ऐसी आक्रमणकारी नीति से बचने के लिये और विश्व में शान्ति स्थापित करने हेतु परमाणु निःशस्त्रीकरण पर अधिक बल देना चाहिए। इसी सुख-शान्ति अमन-चैन के साथ एक-दूसरे के प्रति भाईचारे के भाव बनाने के लिए इन्सान को अन्य किसी इन्सान पर आक्रमणकारी नहीं बल्कि सहयोगी बन कर रहने में ही भलाई है। इससे आक्रमणकारी को भी शांति और संतोष मिलता है। बुरे विचार इसके दिल और दिमाग से हट जाते हैं। ऐसी मानसिक शांति पाने के लिये आक्रमणकारी नहीं बनने की जरूरत है भगवान बुद्ध ने अहिंसा प्रमोधर्म का नारा देकर विश्व को युद्ध मेँ झूलसने से बचाने हेतु एक नई दिशा दी। मानवता के आधार पर इन्सान यह सोचे कि मैं आक्रमणकारी नहीं बनूं और न ही सहयोग दूंगा। इस दृढ़ संकल्प द्वारा वह शांति का शंखनाद करने में कदापि पीछे नहीं रहेगा। वर्तमान में इसकी महत्ती आवश्यकता है। इसी प्रकार एक-दूसरे देश पर आक्रमण करता है तब अन्य देश आपस में लड़ने वाले किसी एक देश की आक्रामक नीति में भागीदार बनता है, उसे मदद देता है, सहयोगी के रूप से दुश्मन समझने वाले देश से युद्ध करता है तब वहाँ सर्वत्र विनाश ही विनाश होने की संभावना बढ़ती है। ऐसी विषम स्थिति में विश्व शांति को कभी भी खतरा उत्पन्न हो सकता है।इस कारण इन्सान-इन्सान में घृणा, द्वेषभाव, ईर्ष्या, दुश्मनी आदि उत्पन्न होती है जो इन्सानों की सुख-शांति, अमनचैन छीनती है। ऐसी आक्रमणकारी नीति से बचने के लिये और विश्व में शान्ति स्थापित करने हेतु परमाणु निःशस्त्रीकरण पर अधिक बल देना चाहिए। इसी सुख-शान्ति अमन-चैन के साथ एक-दूसरे के प्रति भाईचारे के भाव बनाने के लिए इन्सान को अन्य किसी इन्सान पर आक्रमणकारी नहीं बल्कि सहयोगी बन कर रहने में ही भलाई है। इससे आक्रमणकारी को भी शांति और संतोष मिलता है। बुरे विचार इसके दिल और दिमाग से हट जाते हैं। ऐसी मानसिक शांति पाने के लिये आक्रमणकारी नहीं बनने की सीख आचार्य तुलसी ने देश की आजादी के बाद मानवता आंदोलन चलाकर विश्व को एक नई दिशा दी। मानवता के आधार पर इन्सान यह सोचे कि मैं आक्रमणकारी नहीं बनूं और न ही सहयोग दूंगा। इस दृढ़ संकल्प द्वारा वह शांति का शंखनाद करने में कदापि पीछे नहीं रहेगा। वर्तमान में इसकी महत्ती आवश्यकता है। इसी प्रकार एक-दूसरे देश पर आक्रमण करता है तब अन्य देश आपस में लड़ने वाले किसी एक देश की आक्रामक नीति में भागीदार बनता है, उसे ममदद देता है, सहयोगी के रूप से दुश्मन समझने वाले देश से युद्ध करता है तब वहाँ सर्वत्रा विनाश ही विनाश होने की संभावना बढ़ती है। ऐसी विषम स्थिति में विश्व शांति को कभी भी खतरा उत्पन्न होता है पूर्ण विश्व ही इस युद्ध की मार झेलता है कहीं क़ोई खाड़ी देश में भारतीय भी मारा गया है और अब महंगा होगा जरुरत की हर चीज व हजारों यात्रियों में अफरा तफरी का माहौल है जबकी दूसरे अन्य देशों से इसका क़ोई लेना देना नहीं है अतः इसे जल्द से जल्द ख़त्म करना चाहिए। ईएमएस / 05 मार्च 26