बातचीत के दौरान एक झूठ का सहारा लेकर इजराइल और अमेरिका ने जिस तरह से ईरान पर हमला किया, उसी वक्त तनाव के बीच का संघर्ष मानों बेलगाम युद्ध में तब्दील हो गया। अब पश्चिम एशिया में चल रहा युद्ध केवल मिसाइलों और बमों तक सीमित नहीं रह गया है, इसके समानांतर एक और खतरनाक युद्ध लड़ा जा रहा है, वह है सूचना और दुष्प्रचार की जंग। जब युद्ध के मैदान में धुआँ उठता है, तब अक्सर सच्चाई धुंध में छिप जाती है और अफवाहें, आधे-अधूरे तथ्य तथा झूठी खबरें जंगल में लगी आग की तरह तेजी से फैलने लगती हैं। भीड़ या समूह को भड़काने में इसका बेजा इस्तेमाल किया जाता है। दरअसल हाल ही में एक अमेरिकी समाचार चैनल द्वारा यह दावा किया गया कि ईरान पर हमले के लिए अमेरिकी नौसेना भारतीय बंदरगाहों का उपयोग कर रही है। भारत के विदेश मंत्रालय ने तुरंत इस खबर का खंडन करते हुए इसे पूरी तरह झूठा और निराधार बताया। यह घटना बताती है कि युद्ध के समय भ्रामक सूचनाएँ किस प्रकार देशों के बीच अनावश्यक तनाव पैदा कर सकती हैं। दरअसल, अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ता संघर्ष पहले ही बेहद संवेदनशील मोड़ पर पहुंच चुका है। हजारों लोगों की जान जा चुकी है और युद्धविराम की संभावना फिलहाल दूर-दूर तक नजर नहीं आ रही है। ऐसे माहौल में अगर किसी तीसरे देश को बिना किसी प्रमाण के युद्ध से जोड़ दिया जाए, तो उसके गंभीर कूटनीतिक और रणनीतिक परिणाम हो सकते हैं। भारत के संदर्भ में यह और भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत लंबे समय से पश्चिम एशिया में संतुलित और स्वतंत्र विदेश नीति अपनाता रहा है। भारत के ईरान, इजरायल और अमेरिका तीनों ही देशों से महत्वपूर्ण संबंध हैं। ऐसे में इस प्रकार के निराधार दावे भारत की तटस्थ और संतुलित नीति को नुकसान पहुंचाने का प्रयास भी हो सकते हैं। खासतौर पर तब जबकि ईरान पर हमले से पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के इजराइल दौरे को लेकर तरह-तरह के भ्रामक दावे किए गए, बाद में इस पर भी स्पष्टीकरण आया और सभी दावे अफवाहें साबित हो गए। बहरहाल युद्ध के दौरान दुष्प्रचार का इस्तेमाल करना कोई नई बात नहीं है। इतिहास गवाह है कि युद्ध के समय प्रचार और मनोवैज्ञानिक रणनीतियाँ सैन्य हथियारों जितनी ही महत्वपूर्ण मानी जाती रही हैं। आज डिजिटल युग में यह प्रवृत्ति और अधिक खतरनाक हो गई है, क्योंकि सोशल मीडिया और 24 घंटे चलने वाले कुछ समाचार चैनलों के कारण गलत जानकारी पलक झपकते ही दुनिया भर में फैल जाती है। कई बार तो ये खबरें बिना तथ्य के जांचे-परखे प्रसारित कर दी जाती हैं, जिससे भ्रम और अविश्वास का माहौल बन जाता है। वर्तमान संघर्ष के संदर्भ में भी यही स्थिति दिखाई दे रही है। अमेरिकी नेतृत्व ने दावा किया है कि उसके सैन्य अभियान ने ईरान की सैन्य क्षमता को गंभीर रूप से कमजोर कर दिया है और ईरान द्वारा किए जा रहे मिसाइल और ड्रोन हमलों में भारी कमी आई है। वहीं दूसरी ओर ईरान भी लगातार जवाबी कार्रवाई कर रहा है और क्षेत्र में तनाव बढ़ता जा रहा है। इस पूरे परिदृश्य में सच्चाई का सही आकलन करना कठिन हो गया है, क्योंकि हर पक्ष अपनी-अपनी रणनीतिक कथा प्रस्तुत कर रहा है। इस युद्ध के व्यापक भू-राजनीतिक प्रभाव भी सामने आने लगे हैं। पश्चिम एशिया की अस्थिरता का असर वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था पर पड़ना स्वाभाविक है। ऊर्जा आपूर्ति, तेल और गैस के व्यापार तथा समुद्री मार्गों की सुरक्षा को लेकर दुनिया भर में चिंता बढ़ रही है। चीन और रूस जैसे देश भी इस स्थिति को लेकर सतर्क दिखाई दे रहे हैं। चीन द्वारा रक्षा बजट में वृद्धि का निर्णय इसी व्यापक रणनीतिक अस्थिरता की ओर संकेत करता है। इसका अर्थ तो यही हुआ कि यह संघर्ष केवल क्षेत्रीय नहीं रहा, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन को भी प्रभावित करने की क्षमता रखता है। अमेरिका के भीतर भी इस युद्ध को लेकर बहस तेज हो गई है। एक तरफ कुछ आलोचकों का मानना है कि बिना कांग्रेस की अनुमति के सैन्य कार्रवाई करना संवैधानिक सीमाओं को चुनौती देने जैसा है, वहीं दूसरी तरफ कुछ ने इसे सही कदम बताया है। यह विवाद दर्शाता है कि आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में युद्ध केवल सैन्य या कूटनीतिक मुद्दा नहीं होता, बल्कि राजनीतिक और कानूनी विमर्श का भी विषय बन जाता है। इन सबके बीच सबसे बड़ी चुनौती यह है कि सूचना की विश्वसनीयता कैसे सुनिश्चित की जाए। जब समाचार और दुष्प्रचार के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है, तब जनता के लिए सही और गलत में फर्क करना कठिन हो जाता है। इसलिए सरकारों, मीडिया संस्थानों और नागरिकों, तीनों की जिम्मेदारी है कि वे तथ्यों की पुष्टि के बिना किसी भी सूचना को स्वीकार न करें। भारत के विदेश मंत्रालय द्वारा झूठे दावों का तुरंत खंडन करना इस दिशा में एक सकारात्मक कदम है। यह दर्शाता है कि आज के दौर में केवल सैन्य या कूटनीतिक तैयारी ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि सूचना युद्ध से निपटने के लिए भी सतर्क और सक्रिय रहना आवश्यक है। अंततः यह समझना होगा कि युद्ध का सबसे बड़ा शिकार केवल सैनिक या नागरिक नहीं होते, बल्कि सच भी होता है। जब झूठ और दुष्प्रचार को हथियार बना लिया जाता है, तब वैश्विक शांति और स्थिरता पर गंभीर खतरा मंडराने लगता है। इसलिए आवश्यक है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय न केवल युद्ध को रोकने के प्रयास करे, बल्कि सूचना के क्षेत्र में भी जिम्मेदारी और पारदर्शिता को बढ़ावा दे। तभी दुनिया को झूठ पर गढ़े गए युद्धों और उनके खतरनाक परिणामों से बचाया जा सकेगा। ईएमएस / 05 मार्च 26