सागर (ईएमएस)। नारी शक्ति केवल एक शब्द नहीं है, बल्कि सृजन,संवेदनशीलता, साहस और नेतृत्व का जीवंत प्रतीक स्वरूप है। भारतीय संस्कृति में नारी को आदिकाल से ही पूजनीय माना गया है। उसे देवी, जननी एवं शक्ति का रूप कहा गया है। यह मान्यता केवल धार्मिक भावनाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और सांस्कृतिक क्षेत्रों में महिलाओं की महत्वपूर्ण भूमिका को भी दर्शाती है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस प्रत्येक वर्ष 8 मार्च को विश्व भर में मनाया जाता है। यह दिन महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक उपलब्धियों का सम्मान करने के साथ-साथ लैंगिक समानता के लिए चल रहे संघर्षों को भी रेखांकित करता है। यह केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि जागरूकता, सम्मान और बदलाव का प्रतीक है। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस की शुरुआत बीसवीं शताब्दी में हुई थी। वर्ष 1910 में डेनमार्क की राजधानी कोपनहेगन में आयोजित अंतरराष्ट्रीय समाजवादी महिला सम्मेलन में जर्मन समाजवादी नेता क्लारा जेटकिन ने महिलाओं के लिए एक विशेष दिवस मनाने का प्रस्ताव रखा था। इसके बाद 1911 में कई देशों में महिला दिवस मनाया जाने लगा। संयुक्त राष्ट्र ने 1975 में, जिसे अंतरराष्ट्रीय महिला वर्ष घोषित किया गया था, उसे 8 मार्च 1975 को आधिकारिक रूप से महिला दिवस मनाना शुरु किया। आज यह दिन विश्व भर में अलग-अलग थीम के साथ मनाया जाता है, जो महिलाओं के अधिकार, सम्मान, समान अवसर और सशक्तीकरण पर केन्द्रित होते हैं।महिला दिवस हमें यह याद दिलाता है कि महिलाओं को शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य और निर्णय-निर्माण के क्षेत्र में समान अवसर मिलना चाहिए। आज भी कई समाजों में महिलाओं को भेदभाव का सामना करना पड़ता है। यह दिन उन महिलाओं को सम्मानित करने का अवसर है, जिन्होंने विभिन्न क्षेत्रों-विज्ञान, राजनीति, खेल, कला और साहित्य में उल्लेखनीय योगदान दिया है। महिला दिवस युवा पीढ़ी को प्रेरित करता है कि वे समाज में समानता को बढ़ावा दें और सकारात्मक परिवर्तन लायें। आज की महिलायें हर क्षेत्र में अपनी पहचान बना रही हैं-चाहे वह विज्ञान और तकनीक हो, राजनीति, सेना, खेल या उद्यमिता। डिजिटल युग ने महिलाओं को नए अवसर प्रदान किये है। सरकार और सामाजिक संगठन भी बेटियों की शिक्षा एवं सुरक्षा के लिए अनेक योजनायें चला रही है, फिर भी समाज में कई चुनौतियाँ अभी भी मौजूद हैं जैसे-वेतन अंतर, घरेलू हिंसा, बाल विवाह और शिक्षा में असमानता। इन समस्याओं को समाप्त करने के लिए सामूहिक प्रयास आवश्यक है।नारी परिवार की आधारशिला होती है। वह एक बेटी, बहिन, पत्नि और माँ के रूप में समाज को संस्कार देती है। उसके बिना परिवार और समाज की कल्पना अधूरी है। आज महिलायें केवल गृहकार्य तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे आर्थिक रूप से भी परिवार को सशक्त बनाती है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिलायें आत्मनिर्भर बन रही हैं। शहरी क्षेत्रों में महिलायें उच्च शिक्षा प्राप्त कर विभिन्न पेशों में अग्रणीय भूमिका निभा रही हैं। हालाँकि प्रगति के बावजूद महिलाओं को अभी भी कई कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है-जैसे भेदभाव, अशिक्षा, दहेज प्रथा और सुरक्षा सम्बन्धी समस्यायें। इन समस्याओं के समाधान के लिए शिक्षा का प्रसार, समान अवसर और सामाजिक जागरूकता अत्यन्त आवश्यक है। शासन द्वारा चलाये जा रहे विभिन्न अभियान जैसे-बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, महिलाओं के सशक्तीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। साथ ही समाज को अपनी मानसिकता में परिवर्तन लाना होगा और महिलाओं को सम्मान तथा समान अधिकार देने होंगे। नारी शक्ति समाज की वास्तविक शक्ति है। वह केवल घर की शोभा नहीं है, बल्कि राष्ट्र निर्माण की आधारशिला है। जब महिलायें शिक्षित, सुरक्षित एवं आत्मनिर्भर होंगी, तभी देश सच्चे अर्थों में प्रगति करेगा। इसलिए आवश्यक है कि हम नारी का सम्मान करें, उसे समान अवसर दें और उसके सपनों को साकार करने में सहयोग करें। नारी शक्ति का उत्थान ही राष्ट्र की उन्नति का मार्ग है। आत्मनिर्भर नारी ही सशक्त समाज की नींव है। नारी का अर्थ है ऐसी महिला जो आर्थिक, सामाजिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से स्वयं पर विश्वास करते हुए अपने निर्णय स्वयं लेने में समक्षम हो। आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह आत्मविश्वास, शिक्षा, कौशल और अधिकारों की समझ से भी जुड़ी हुई है। जब नारी आत्मनिर्भर बनती है, तब परिवार, समाज और राष्ट्र तीनों सशक्त होते हैं।आर्थिक स्वतंत्रता, आत्मनिर्भरता का सबसे महत्वपूर्ण आधार है। जब महिला स्वयं आय अर्जित करती है, तो वह न केवल अपने परिवार की सहायता करती है, बल्कि अपने जीवन से जुड़े निर्णय भी स्वतंत्र रूप से ले पाती है। शहरी क्षेत्रों में महिलायें, स्टार्टअप, आई.टी., बैंकिंग, शिक्षा और चिकित्सा जैसे क्षेत्रों में अपनी पहचान बना रही है। शासन की कई ग्रामीण योजनायें, महिलाओं को स्वरोजगार के अवसर प्रदान कर रही है। आर्थिक आत्मनिर्भरता महिलाओं को सम्मान और आत्मविश्वास प्रदान करती है। शिक्षा एवं साक्षरता ही आत्मनिर्भरता का एक प्रमुख उपाय है। शिक्षित महिला अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होती है और समाज में सकारात्मक परिवर्तन ला सकती है। डिजिटल साक्षरता और व्यवसायिक प्रशिक्षण महिलाओं को नए अवसरों से जोड़ रहे है। ऑनलाइन प्लेटफार्म और कौशल विकास कार्यक्रम महिलाओं को घर बैठे सीखने और कमाने का अवसर दे रही है। आत्मनिर्भर नारी मानसिक रूप से भी मजबूत होती है। वह अपने अधिकारों और कर्तव्यों को समझती है तथा अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने में सक्षम होती है। आत्मनिर्भरता का एक महत्वपूर्ण पहलू आत्म-सम्मान है-जब महिला स्वयं को कमजोर नहीं, बल्कि सक्षम समझती है। इसलिए आवश्यक है कि हम महिलाओं को शिक्षा के अवसर और सम्मान प्रदान करें, ताकि वे आत्मनिर्भर बनकर राष्ट्र-निर्माण में अग्रणी भूमिका निभा सकें। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस हमें यह सिखाता है कि जब महिलाएं सशक्त होती हैं, तो परिवार, समाज एवं राष्ट्र प्रगति करते हैं। यह दिन केवल एक तारीख नहीं, बल्कि समानता, सम्मान और अधिकारों की निरन्तर यात्रा का प्रतीक है। आईये, इस महिला दिवस पर हम संकल्प लें, कि हम एक ऐसे समाज का निर्माण करें, जहाँ हर महिला को अपने सपनों को साकार करने का अवसर मिले। निखिल सोधिया/ईएमएस/07/03/2026