लेख
11-Mar-2026
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अमेरिका -इजरायल-ईरान के बीच युद्व चल रहा है। ऐसे में देश के अंदर बहस छिड़ी हुई है कि ईरान का विरोध किया जाए या समर्थन । वहीं देश में ईरान के मृत पूर्व लीडर अली ख़ामेनेई की तस्वीर लेकर एक वर्ग समुदाय अपना दुख प्रगट कर रहा है। ऐसे में भारत ने भी ईरान के दूतावास जाकर कुछ दिन बाद जाकर अपनी श्रंद्वाजलि दुख प्रगट कर आया है। भारत और ईरान के संबंधों को यदि सरल शब्दों में समझा जाए, तो यह कहना अधिक उचित होगा कि ईरान न तो भारत का शत्रु है और न ही पारंपरिक अर्थों में सैन्य सहयोगी मित्र। बल्कि दोनों देशों के संबंध हितों, इतिहास और कूटनीति पर आधारित रणनीतिक साझेदारी के रूप में विकसित हुए हैं। ईरान भारत का शत्रु नहीं है, लेकिन पारंपरिक सैन्य मित्र भी नहीं है। वहीं संसद में भी विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी स्पष्ट कर दिया कि हमारी सरकार की प्रत्येक गतिविधियों पर नजर जारी है ताकि वर्तमान हालात पर नियंत्रण रहें। लेकिन सरकार अभी तक यह नहीं बता पाई कि इस युद्व के पनपने वाली मंहगाई से कैसे निपटेगी। वर्तमान में कर्मशियल गैस पर अंकुश लग चुका है। घरेलू गैस पर संकट न आये तो सरका र क्या क्या कार्य रही है। अगर हम ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध के बारे में पड़ताल करें तो पायेंगे कि भारत और ईरान के संबंध हजारों वर्षों पुराने हैं। प्राचीन काल से ही दोनों क्षेत्रों के बीच व्यापार, संस्कृति और भाषा का आदान-प्रदान होता आया है। फ़ारसी भाषा का प्रभाव भी मध्यकालीन भारत की प्रशासनिक और सांस्कृतिक परंपराओं में भी दिखाई देता है। हमें ईतिहास में जाकर यह भी भूलना न होगा कि संघर्ष भी हुए, जैसे 1739 में ईरानी शासक नाडेर शाह ने भारत पर आक्रमण कर बैटल ऑफ करनाल में मुग़लों को हराया था। लेकिन आधुनिक दौर में दोनों देशों के संबंध मुख्यत: सहयोग और कूटनीति पर आधारित रहे हैं। अगर हम ऊर्जा और व्यापार में साझेदारी की बात करें तो भारत एक बड़ा ऊर्जा उपभोक्ता देश है और ईरान तेल-गैस का बड़ा स्रोत रहा है। भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए ईरान महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी संदर्भ में भारत ने ईरान के चाबाहार पोर्ट के विकास में निवेश किया है, जिससे भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुँच मिलती है और पाकिस्तान को बाईपास करने का रास्ता मिलता है। ज्ञात रहे कि भारत -ईरान का रणनीतिक सहयोग रहा है और भारत और ईरान कई क्षेत्रों में सहयोग करते आये हैं। जैसे कि आतंकवाद और ड्रग तस्करी के खिलाफ सहयोग। अफगानिस्तान की स्थिरता में साझा हित, व्यापार और क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाएं सहित अन्य कारणों से ईरान भारत के लिए रणनीतिक रूप से उपयोगी साझेदार माना जाता रहा है। आज की अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत की नीति स्पष्ट है कि सभी देशों से संबंध रखना। किसी एक गुट में पूरी तरह शामिल न होना। अपने राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देना। इसलिए ईरान-इजऱायल या ईरान-अमेरिका तनाव में भारत अक्सर तटस्थ रुख अपनाता है और शांति की अपील करता है। वहीं पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और वैश्विक राजनीति के बदलते समीकरणों के बीच यह सवाल बार-बार उठता है कि क्या ईरान भारत का मित्र है या शत्रु। दरअसल अंतरराष्ट्रीय राजनीति में रिश्ते स्थायी दोस्ती या दुश्मनी के आधार पर नहीं बल्कि राष्ट्रीय हितों के आधार पर तय होते हैं। भारत और ईरान के संबंध भी इसी सिद्धांत पर चलते रहे हैं। पश्चिम एशिया की राजनीति में ईरान लंबे समय से एक महत्वपूर्ण और प्रभावशाली देश रहा है। हाल के वर्षों में क्षेत्रीय संघर्ष, प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय दबावों के कारण ईरान वैश्विक चर्चा के केंद्र में बना हुआ है। खासकर अमेरिका और इजऱाइल के साथ उसके तनावपूर्ण संबंधों ने पूरे पश्चिम एशिया की स्थिरता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। ईरान की विदेश नीति हमेशा से पश्चिमी देशों के प्रभाव का विरोध करने वाली रही है। 1979 की इस्लामी क्रांति के बाद से ही अमेरिका और ईरान के रिश्तों में कड़वाहट बनी हुई है। अमेरिका द्वारा लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों ने ईरान की अर्थव्यवस्था को काफी प्रभावित किया है, लेकिन इसके बावजूद ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रभाव को बनाए रखने की कोशिश जारी रखी है।इजऱाइल और ईरान के बीच बढ़ता तनाव भी वैश्विक चिंता का विषय बन चुका है। दोनों देशों के बीच सीधे युद्ध की स्थिति न होते हुए भी छद्म युद्ध और सैन्य गतिविधियाँ लगातार जारी हैं। यदि यह तनाव खुली लड़ाई में बदलता है तो इसका असर केवल पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था, ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा पर भी पड़ेगा। भारत के लिए भी ईरान का महत्व कम नहीं है। भारत और ईरान के बीच ऊर्जा, व्यापार और रणनीतिक सहयोग के संबंध रहे हैं। विशेष रूप से चाबहार बंदरगाह परियोजना भारत के लिए मध्य एशिया और अफगानिस्तान तक पहुंच का एक महत्वपूर्ण मार्ग है। हालांकि अमेरिका के प्रतिबंधों के कारण भारत को ईरान के साथ अपने संबंधों में संतुलन बनाए रखना पड़ता है। आज के समय में आवश्यकता इस बात की है कि ईरान और पश्चिमी देशों के बीच संवाद और कूटनीति को बढ़ावा दिया जाए। युद्ध और टकराव किसी भी समस्या का समाधान नहीं होते। यदि कूटनीतिक प्रयास सफल होते हैं तो न केवल पश्चिम एशिया में शांति स्थापित हो सकती है, बल्कि वैश्विक आर्थिक स्थिरता भी मजबूत हो सकती है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार है, समाचार पत्र व पत्रिकाओं में समसमायिक विषयों पर चिंतक, राजनीतिक विचारक है।) (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 11 मार्च /2026